गिरीश उपाध्‍याय 
जश्‍न मना रहा हूं मैं
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तुम भी आ जाओ
जश्न मना रहा हूं मैं
मौत को आंखें दिखा रहा हूं मैं
डर के आगे जीत हो ना हो
जीत की उम्मीद से
डर को डरा रहा हूं मैं
किसकी हैसियत है
झुका सके मुझे
झुक झुक कर जमीं से
तिनके उठा रहा हूं मैं
काम आएंगे किसी डूबने वाले के
तिनकों को तैरना
सिखा रहा हूं मैं
माना कि अच्छा नहीं है
इस जमाने का चलन
फिर भी रुके हुओं को
चलना सिखा रहा हूं मैं
दिल दुखाने की बात
कर रहे हैं सब
थोड़ा सा मुसकुराना
सिखा रहा हूं मैं
पछताने से नहीं होता
कभी कुछ भी हासिल
गलतियां न करने का
हुनर बता रहा हूं मैं