राघवेंद्र सिंह

मध्यप्रदेश भारतीय जनता पार्टी में नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव के बाद अनुशासन लाने की दरकार लंबे समय से थी। इस बीच भाजपा नेता प्रीतम सिंह लोधी ने जाने-अनजाने में नाम लिए बिना कथित ब्राह्मणों राम रहीम, आसाराम और मिर्ची बाबा को केंद्र में रख कटाक्ष कर दिया। विवादित कटाक्ष सार्वजनिक कार्यक्रम में किया था सो प्रतिक्रिया काफी व्यापक है। बयान पर आह निकली और निष्कासन पर वाह वाही भी। लेकिन सियासत में आह-वाह के नतीजे दूर तक जाते हैं। इसकी गूंज देर तक सुनाई भी देती है।

प्रदेश भाजपा संगठन पर प्रीतम लोधी पर कठोर कार्रवाई करने का दबाव बना था क्योंकि बयान सार्वजनिक था। इसलिए जवाब-तलब के बाद भी मामला ना तो हल्का हुआ और ना ही ठंडा पड़ा। बढ़ते दबाव के चलते प्रदेश भाजपा ने उच्च स्तर पर परामर्श के बाद प्रीतम लोधी को पार्टी से निष्कासित कर दिया। अनुशासन के दृष्टिगत फैसला उचित लगा लेकिन डैमेज कंट्रोल की टीम लगता है थोड़ा पिछड़ गई। बस यहीं से शुरू होते हैं कुछ किस्से कहानी जिसमें लोग सवाल कर रहे हैं क्या भाजपा में पित्र पुरुष कुशाभाऊ ठाकरे के साथ वरिष्ठ नेता प्यारेलाल खंडेलवाल, नारायण प्रसाद गुप्ता, कैलाश जोशी, सुंदर लाल पटवा और लखीराम अग्रवाल जैसे नेताओं की सबको साथ लेकर चलने की परंपरा कमजोर पड़ गई है। जिसमें कठोर अनुशासन के साथ जिन पर कार्रवाई होती थी वह भी कुछ दिनों की नाराजगी के बाद फिर से पार्टी के कामों में लग जाते थे।

लेकिन अब उल्टा हो रहा है। कार्रवाई के दूसरे दिन से ही प्रीतम के बागी तेवर दिखने लगे हैं। भाजपा से रुखसत किए जाने के बाद वे ग्वालियर में समर्थकों के साथ आम्बेडकरवादियों की शरण मे चले गए हैं। असल में पहले इसके पीछे संगठन की सोच के साथ पूरा एक मैकेनिज्म होता था, जो प्रदेश अध्यक्ष और संगठन मंत्रियों के साथ तालमेल कर नेताओं और कार्यकर्ताओं को अनुशासित तरीके से पार्टी के काम में लगाता था।

प्रीतम लोधी का प्रकरण अपने आप मे केस स्टडी है। सेक्स स्‍कैंडल में फंसे तथाकथित बाबाओं को केंद्र में रख प्रीतम लोधी ने जो कहा उसे दोहराए बिना हम कह सकते हैं कि उसे ब्राह्मणों को अपमानित करने से भी जोड़ कर देखा गया। प्रथमदृष्टया ऐसा लगा भी। लेकिन इस इस मुद्दे की नजाकत को देखते हुए प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा ने तत्काल एक्शन लिया। लोधी को नोटिस दिया, भोपाल बुलाया और दबाव के चलते तुरत-फुरत में पार्टी से निष्कासित कर दिया।

प्रदेश अध्यक्ष शर्मा की कार्रवाई अनुशासन के नजरिये से एकदम सटीक थी लेकिन इसके साथ ही संगठन की डैमेज कंट्रोल वाली टीम को भी सक्रिय होने की जरूरत थी। जैसा ठाकरे जी के कार्यकाल में होता था। वे कार्यकर्ताओं को सजा भी देते थे और साथ में उनकी एक टीम कार्यकर्ताओं को टूटने भी नहीं देती थी। संगठन से जुड़े कुछ लोगों और वरिष्ठ पत्रकारों से जब इस तरह के मामले में बातचीत हुई तो उनका साफ कहना था जब कभी अनुशासन की कार्रवाई होती थी तो ठाकरे जी के संकेत पर प्यारेलाल खंडेलवाल और नाना गुप्ता जैसे वरिष्ठ नेता, अनुशासन की कार्रवाई के दायरे में आए नेता से संपर्क कर पार्टी की स्थिति को बताते थे साथ ही कुछ दिनों बाद सब कुछ ठीक हो जाने की सांत्वना भी देते थे।

वे यह नसीहत भी देते थे कि अभी पार्टी ने कार्रवाई की है संगठन के हित में काम करते रहिए आगे पीछे पार्टी में वापसी हो जाएगी और सम्मान भी लौट आएगा। यही वजह है कि जनसंघ से लेकर भाजपा तक पार्टी कार्यकर्ता संगठन से उपेक्षित और कई दफा अनुशासन की कार्रवाई में मुख्यधारा से बाहर होने के बाद भी पार्टी के खिलाफ काम नहीं करते थे। बल्कि अवसर आने पर वे ज्यादा वफादारी के साथ पार्टी का हित संरक्षण करते थे ताकि उनकी वापसी हो जाए। लेकिन लगता है प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा इस मामले में थोड़ा अकेले पड़ गए। उनके अच्छे फैसले भी कभी-कभी दूर से देखने पर उचित प्रतीत नहीं होते।

प्रीतम लोधी का मामला भी कुछ इसी श्रेणी में आता है। यदि संगठन के नेता उन्हें पहले ही यह बता देते कि आप पर निष्कासन तक की कार्रवाई हो सकती है और ऐसा करना फिलहाल पार्टी के भीतर और बाहर यह संदेश देने के लिए जरूरी है कि कोई भी व्यक्ति समाज के किसी वर्ग को सार्वजनिक रूप से टारगेट करेगा तो नेतृत्व उस पर कार्रवाई करेगा। पहले तो यह भी बताया जाता था कि जो गलती हो गई है उसका प्रायश्चित कैसे होगा और संगठन में वापसी का रास्ता कितने दिनों में और किस तरह निकलेगा।

जैसे कुम्हार घड़े को ऊपर से चोट मारकर और भीतर हथेली लगाकर गढ़ता है उसी तरह से संगठन को काम करने की जरूरत होती है। प्रीतम पर अनुशासन की चोट तो पड़ गई लेकिन उसे भीतर से हथेली लगाकर गढ़ने के काम में थोड़ी चूक हो गई। अभी लगता है पार्टी में अध्यक्ष शर्मा के साथ ऐसे परिपक्व सहयोगियों और प्रभारियों की जरूरत है जो संगठन के मुखिया के तौर पर उनके फैसले को औचित्यपूर्ण करार दें और साथ में उस पर सहमति भी बनाएं। यह भी समझाएं कि पार्टी जातियों और वर्ग को आहत करने के किसी भी काम को स्वीकार नहीं करेगी।

पार्टी ने जिस प्रीतम लोधी को विधायक का उम्मीदवार बनाया था, अब वह पार्टी के खिलाफ पार्टी विरोधियों के हाथों में जा रहा है। सभी दलों के लिए इस तरह के घटनाक्रम सबक की तरह होते हैं। भाजपा अनुभवी संगठन है, इसलिए लगता है विधानसभा चुनाव के पहले तक इस तरह की घटनाओं को संभाल लेगी।

फिलहाल प्रीतम आक्रामक कदम उठाते हुए आंबेडकरवादियों के कैंप में चले गए हैं। आगे पीछे भाजपा विरोधी इस घटना का लाभ लेंगे और प्रीतम को ओबीसी के साथ कमजोर वर्ग का चेहरा बनाकर भाजपा को नुकसान पहुंचाएंगे। बस यहीं से शुरू होती है भाजपा के डैमेज कंट्रोल मैनेजमेंट की परीक्षा। देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में इस तरह के मुद्दों को पार्टी कैसे हैंडल करती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि टीम वीडी शर्मा का रुख पॉजिटिव ही होगा।
(लेखक मध्‍यप्रदेश के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।)
(मध्यमत)
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