अजय बोकिल

अगर चुनाव नतीजों को जनमत के मूड का पैमाना मानें तो देश की राजधानी दिल्ली में चरम पर पहुंचे किसान आंदोलन के बीच राजस्थान में पंचायत चुनाव के नतीजों को किस आईने में देखा जाए? कृषि कानूनों के पक्ष में या फिर विपक्ष में? क्या पंजाब और ‍हरियाणा से सटे राजस्थान के किसानों तक पंजाब-हरियाणा के आंदोलनकारी किसानों की आवाज नहीं पहुंची या फिर उन्होंने सुनकर भी उसे ज्यादा तवज्जो नहीं दी? या यह माना जाए कि किसानों के मुद्दे अभी भी मुख्‍य चुनावी मुद्दे नहीं बन पाते, भले ही यह चुनाव ग्रामीण क्षेत्रों में क्यों न हों?

बहरहाल इन चुनाव नतीजों से राज्य में दो साल से विपक्ष में बैठी भाजपा की बांछें खिल गई हैं। लिहाजा केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने यह दावा करने में जरा भी देर नहीं कि राजस्थान का फैसला कृषि कानूनों पर किसानों की मोहर है। इस दावे को एकदम नकारा नहीं जा सकता, क्योंकि कृषि कानून विवादों के दर्मियान देश में जहां भी चुनाव हुए हैं, भाजपा का खाता प्लस ही हुआ है, घटा नहीं है।

यूं राजस्थान में अशोक गहलोत सरकार का आधा कार्यकाल भी पूरा नहीं हुआ है, लेकिन प्रदेश के मतदाताओं ने उनकी सरकार के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। जबकि पिछले ही साल राज्य में हुए नगरीय निकाय चुनाव में सत्तासीन कांग्रेस ने जीत का डंका बजाया था। लेकिन तब कांग्रेस राज्य में एकजुट दिख रही थी। अब वह हर दिन ऑक्‍सीमीटर के भरोसे है।

चुनावी नतीजों के बरक्स इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि अर्से बाद अन्नदाता की मुश्किलें चर्चा के केन्द्र में हैं। समर्थन और विरोध दोनों ही दृष्टि से। एक वर्ग इसे ‘किसान क्रांति’ के रूप में देखने और दिखाने की कोशिश कर रहा है तो विरोधी इसे मोदी सरकार के खिलाफ एक और ‘प्रायोजित अभियान’ के रूप में चित्रित कर रहे हैं। इन आरोप-प्रत्यारोपों से हटकर जमीनी स्तर पर देखें तो राजस्थान के पंचायत चुनाव नतीजे सत्ता विरोधी मानस का संकेत देते हैं।

किसानों ने उनके आंदोलन के प्रति कांग्रेस द्वारा जताई जा रही हमदर्दी के बजाए उसके द्वारा प्रदेश में ठीक से और एकजुट रहकर सरकार न चला पाने को ज्यादा तवज्जो दी लगती है। मंत्री प्रकाश जावडेकर का यह दावा नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि ‘यह बीजेपी के पक्ष में किसानों का फैसला है।‘ मीडिया से चर्चा में जावडेकर ने कहा कि इन चुनावों में ढाई करोड़ वोटर थे, जिनमें ज्यादातर किसान हैं।

चुनावो में जिला पंचायत परिषदों की 636 सीटों में से आधी से ज्यादा यानी 353 सीटें बीजेपी ने जीती हैं, जबकि पंचायत समितियों की 4371 सीटों में से बीजेपी ने 1990 सीटों पर भगवा लहराया है। हालांकि पंचायतों में भाजपा की तुलना में कांग्रेस ने ज्यादा सीटें जीती हैं। भाजपा ने राज्य की 21 जिला पंचायत परिषदों में से 14 पर कब्जा किया, जबकि कांग्रेस 5 पर जीती।

ब्लॉक पंचायत में 222 सीटों के चुनाव में से 93 पर बीजेपी को बहुमत मिला है। दो माह पहले पार्टी में बगावत का बिगुल बजाने वाले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट के गृह जिले टोंक में जिला परिषद पर भाजपा ने कब्जा किया। अमूमन होता यह है कि राज्य में जिस पार्टी की सरकार होती है, पंचायत व स्थानीय निकाय चुनावों में भी उसी का बोलबाला होता है।

ध्यान रहे कि देश में तीनों विवादित कृषि कानून संसद में विपक्ष के विरोध के बावजूद इस साल सितंबर में पारित हुए। इसके बाद ही पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इनका विरोध शुरू हो गया था। तब तक आम धारणा थी कि इन तीन राज्यों के किसानों के हित ही नए कृषि कानूनों से ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। लेकिन दिसंबर आते-आते किसानों का आंदोलन व्यापक हो गया और उन्होंने दिल्ली घेर ली। कई विपक्षी पार्टियों ने उसे खुलकर समर्थन दे दिया। इससे आंदोलन ने राजनीतिक रूप ले लिया।

संदेश गया कि कृषि कानूनों से पूरे देश के किसान भयंकर उद्वेलित हैं। कहा गया ये काले कानून हैं और यदि सरकार ने इन्हें वापस नहीं लिया तो हर खेत जल उठेगा। बेशक, किसानों की चिंताएं वाजिब हैं और सरकार को उसका समाधान करना ही चाहिए, लेकिन देश के अन्नदाता की यह चिंता या उबाल हाल के चुनाव नतीजों में परिलक्षित नहीं हुआ, ऐसा क्यों?

मंडी एक्ट में संशोधन, एमएसपी की अनिवार्यता खत्म करने, जमाखोरी सीमा समाप्त करने तथा कांट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा देने सम्बन्धी ये कानून सितंबर में लागू हो चुकने के बाद देश ने कुछ अहम विधानसभा चुनाव और उपचुनाव देखे। उधर किसानों में असंतोष की चिंगारी भी सुलग रही थी, इधर वोटों का खेल भी जारी था। माना जा रहा था कि कृषि कानूनों से नाराज किसान जहां भी चुनाव होंगे, वहां भाजपा को सबक सिखाने का मौका नहीं छोड़ेगा, क्योंकि ये कानून मोदी सरकार ने किसानों को भरोसे में लिए बिना ही बनाए हैं।

हालांकि सरकार लगातार ये कहती रही है कि ये कानून किसानों के हित में ही हैं। इन कृषि कानूनों की छाया में पहला बड़ा चुनाव बिहार विधानसभा का था। समझा जा रहा था कि रोजगार और किसी हद तक किसानों का ज्वलंत मुद्दा वहां नीतीश सरकार को उलट देगा, भाजपा भी घाटे में रहेगी। लेकिन जो नतीजा आया, उसमें न सिर्फ नीतीश कुमार की मुख्यमंत्री की कुर्सी बची बल्कि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी।

तर्क‍ दिया गया कि कृषि कानूनों का मुद्दा बिहार में इसलिए जोर नहीं पकड़ पाया, क्योंकि राज्य में कृषि मंडियां 14 साल पहले ही तिरोहित हो चुकी हैं और एमएसपी (न्यूनतम कृषि उपज मूल्य) पर फसलों की खरीद वहां तुलनात्मक रूप से बहुत कम होती है। इस बीच मप्र सहित कुछ राज्यों में विधानसभा उपचुनाव भी हुए, जहां बीजेपी का पलड़ा ही भारी रहा। राज्य में किसानों की सफल कर्जमाफी के कांग्रेसी दावे को किसानों ने ही एक तरह से नकार दिया।

कृषि कानून विरोधी लहर के दौरान एक और अहम चुनाव हैदराबाद नगर निगम का हुआ। वहां भाजपा ने पूरी ताकत झोंकी। नतीजा यह रहा कि भाजपा वहां दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। दलील दी गई कि चूंकि हैदराबाद शहरी इलाका है और वहां साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के आधार पर मतदान हुआ, इसका किसानों की नाराजी से कोई ताल्लुक नहीं है।

अब राजस्थान में तो पंचायत चुनावों में 80 फीसदी मतदाता किसान या खेती के कारोबार से जुड़े लोग हैं। राजनीतिक रूप से जो माहौल देश में बना है, उसके हिसाब से कम से कम इन चुनावों में तो भाजपा को मुंह की खानी थी। लेकिन परिणाम इस संभावना के विपरीत हैं। ऐसे में तर्क दिया जा सकता है कि कृषि कानूनों के बजाए प्रदेश में सत्तारूढ़ कांग्रेस की अंतर्कलह का मतदाता में गलत संदेश गया है।

यह संयोग नहीं है कि पंचायत चुनाव नतीजों के एक दिन पहले ही मुख्‍यमंत्री गेहलोत ने आशंका जताई थी कि उनकी सरकार गिराने का खेल फिर शुरू हो सकता है। पिछली बार तो गेहलोत ने जैसे-तैसे सरकार बचा ली थी, लेकिन ऐसा वो कब तक कर पाएंगे?

इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि किसानों की मांगों को सरकार अनदेखा करे, उसे कम आंके या केवल प्रायोजित कहकर बदनाम करने की कोशिश करे। किसानों की समस्या अपनी जगह जायज है। पर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी के किसानों के लिए वह जितना जीवन-मरण का प्रश्न है, वैसा शायद देश के बाकी हिस्से के किसानों के लिए नहीं है। इसका एक कारण यह है कि इन तीन राज्यों में ही सबसे ज्यादा एमएसपी पर फसल खरीद होती है। बाकी राज्यों के किसान ज्यादातर व्यापारियों के भरोसे ही हैं। अलबत्ता कृषि उपज मंडियां कुछ हद तक उन्हें राहत देती हैं।

यहां बुनियादी प्रश्न ये है कि जब कोई भी आंदोलन खड़ा होता है या किया जाता है, तो जनमानस में उसकी तीव्रता और प्रभाव को नापने का पैमाना क्या है? सरकार पर दबाव बनाने की कूवत, संगठित रह कर सौदेबाजी करने की क्षमता या फिर चुनाव के जरिए लोकतां‍त्रिक तरीके से अपनी नाराजी जताने का संकल्प? यद्यपि चुनाव अब मैनेजमेंट की विधा ज्यादा हैं, बावजूद इसके नतीजों के विश्लेषण में सिलेक्टिव नहीं हुआ जा सकता।

अगर तीसरा पैमाना सही मानें तो निष्कर्ष निकलता है कि कृषि कानून किसानों के लिए चिंता का विषय हैं जरूर, लेकिन उतना भी नहीं कि पूरे देश के किसान सड़क पर आ उतरें। बावजूद इसके इन चुनाव नतीजों का यह अर्थ निकाल लेना कि भाजपा की यह जीत कृषि कानूनों पर किसान की मोहर है, थोड़ी राजनीतिक जल्दबाजी है। ऐसा होता तो सरकार किसान आंदोलन को लेकर इतनी परेशान नजर नहीं आती।