शैलेन्द्र शरण

खंडवा। साहित्यिक नगरी खंडवा गत दिवस वरिष्ठ पत्रकार अजय बोकिल की महत्वपूर्ण कृति ‘कोरोना काल की दंश कथाएं’ तथा युवा कवि नीरज पराशर के काव्य संग्रह ‘कब तक माफ करेगी अम्मा’ के लोकार्पण की साक्षी बनी। इस आयोजन में अजय बोकिल की पुस्तक पर सारगर्भित टिप्पणी करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार, कवि एवं पत्रकार डॉ. सुधीर सक्सेना ने कहा कि संग्रह के पत्रकारीय आलेख ‘दंत कथाएं’ न होकर अपने समय की ‘दंश कथाएं’ हैं, जो कोरोना काल की पीड़ा को कई कोणों से अभिव्यक्त करती हैं। अजय बोकिल के सभी आलेख जहां अपने समय को पूरी ताकत और प्रामाणिकता से प्रकट करते हैं, वहीं भविष्य की ओर भी गंभीर इशारा करते हैं।

इस गरिमामय कार्यक्रम का आयोजन साहित्यिक संस्था ‘अनवरत’ ने किया था, जिसमें पुस्तक की प्रकाशक संस्था शिवना प्रकाशन की भी भागीदारी थी। कोरोना काल में बिखरती सामाजिकता के बीच यह आयोजन अपने आप में एक आ‍श्वस्ति भी था। लोकार्पण समारोह में अजय बोकिल की ‘पुस्तक कोरोना काल की दंश कथाएं’ पर व्यापक चर्चा हुई। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. सुधीर सक्सेना ने कहा कि अजय बोकिल के आलेखों में गहराई और विविधता है। पुस्तक में संग्रहीत सभी आलेख कोरोना काल की उस त्रासदी का आईना हैं, जिसे पूरी दुनिया ने भोगा है।

उन्होंने कहा कि कोरोना की पहली लहर के दौरान काफी कुछ घटा, जिसे अजय बोकिल ने अपने आलेखों में समेटने का सफल और प्रामाणिक प्रयास किया है। इस मायने में ये सभी आलेख अपने समय का दस्तावेज बन गए हैं। वर्तमान में भोपाल निवासी अजय बोकिल के इस संग्रह का खंडवा में लोकार्पण इस बात को सिद्ध करता है कि उनका अपनी जमीन से जुड़ाव कितना है। अजय बोकिल के सभी आलेख मनुष्यता और मानवीय संवेदनाओं के पक्षधर हैं। कवि धूमिल की पंक्तियां उद्धृत करते हुए उन्‍होंने कहा कि ‘कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है।‘

शिवना साहित्यिकी के सह-संपादक, कवि, साहित्यकार शैलेन्द्र शरण ने कहा कि पत्रकार को अपने लेखन में पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं होना चाहिए। एक पत्रकार की किताब इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसकी दृष्टि भविष्य के परिवर्तनों का सूक्ष्म विश्लेषण करती है। अजय बोकिल इस किताब के माध्यम से निडर पत्रकार के रूप में सामने आते हैं। उनकी भाषा जहाँ किसी सच को कहने में कठोर हो जाती है ‍तो वहीं किसी लेख में उनकी अभिव्यक्ति सरल और बालसुलभ प्रतीत होती है। वो कभी मन को गुदगुदाते हैं तो कभी तीखे कटाक्ष करना भी जानते हैं। साथ ही वैश्विक फलक पर संवेदनाओं के लगातार मरते जाने से व्यथित भी दिखाई पड़ते हैं। यह उनकी पत्रकारिता का ऐसा उजला पक्ष है जो पत्रकारिता को साहित्य के समकक्ष लाकर खडा कर देता है।

मुंबई के वरिष्ठ व्यंग्यकार एवं पत्रकार वागीश सारस्वत ने कहा कि “कोरोना काल की दंश कथाएँ” सच्ची पत्रकारिता हैं। इस किताब के लेखों से हमें सीखना चाहिए कि पत्रकारिता कैसी होनी चाहिए, विषयों को कैसे पकड़ा जाना चाहिए, विषय पर केंद्रित होकर कैसे लिखा जाना चाहिए। नियमित लेखन करने के नाते मुझे पता है कि रोज लिखना कितना कठिन है। यह वर्तमान दौर की महत्वपूर्ण किताब है। लेखक, कवि एवं विज्ञान पत्रिका ‘इलेक्‍ट्रॉनिकी’ के संपादक मोहन सगोरिया ने कहा कि अजय बोकिल की किताब कोरोना काल की भयावहता और सामाजिक बिखराव का पत्रकारीय लेखों के माध्यम से सटीक चित्रण करती हैं। उन्‍होंने कहा कि पुस्तक में समाचार पत्रों में पत्र संपादक के नाम लेखकों के पितृपुरुष अन्थोनी पाराकल पर अजय बोकिल का अद्भुत लेख है, जो किसी भी पत्रकार का मस्तक गर्व से ऊँचा उठा देने में सक्षम है। अजयजी के लेखन की अनेक विशेषताएं हैं। वो किसी भी लेख को कमजोर नहीं छोड़ते तथा किसी भी क्षेत्र का कोई भी विषय उनसे अछूता नहीं रह जाता। इस मायने में वे विलक्षण लेखनी के धनी पत्रकार हैं। मोहन सगोरिया ने नीरज पाराशर की कविताओं की भी सराहना की।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ लेखक कथाकार एवं ‘शिवना साहित्यिकी’ के संपादक पंकज सुबीर ने कहा कि जब मैं पत्रकार था, तब मेरे आदर्शों में अजय बोकिल भी रहे हैं। तब वो ‘नई दुनिया’ इंदौर के संपादन मंडल में थे। उन्‍हें पढ़कर मैंने सीखा कि भाषा को हथियार कैसे बनाया जाता है। आज के दौर में अजय बोकिल जैसे पत्रकार का होना इस बात की आश्वस्ति है कि अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। उनके जैसे प्रखर पत्रकार जगमगाती हुई रोशनियां हैं जिनके सहारे हम अँधेरी रात काट सकते हैं। “कवि होने के पहले अच्छा इंसान होना जरुरी है। कविता अपने आप आपको अपने पास बुला लेगी। शिवना प्रकाशन परिवार निरंतर बढ़ रहा है। नीरज पराशर के रूप में ‍कवि की पहली किताब ‘कब तक माफ करेगी अम्मा’ का स्वागत किया जाना चाहिए।

आरंभ में ‘कोरोना काल की दंश कथाएं’ के लेखक तथा वरिष्ठ पत्रकार अजय बोकिल ने अपनी किताब और लेखन प्रक्रिया पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मुझे लेखन के संस्कार अपने गुरु स्व. श्रीकांत जोशी से मिले। लेकिन सुविधानुसार लिखना और प्रतिदिन एक नए विषय पर पूरी गहराई के साथ लिखना दो अलग-अलग बातें हैं। रोज लिखना शिव धनुष उठाने जैसा है। मित्रों के आग्रह पर मैंने 6 वर्ष पूर्व यह जोखिम उठाया। पुस्तक में संग्रहित आलेख भोपाल से प्रकाशित दैनिक ‘सुबह सवेरे’ में नियमित प्रकाशित हुए हैं।

उन्‍होंने कहा- मेरे प्रधान संपादक एवं अग्रज समान वरिष्ठ पत्रकार उमेश त्रिवेदी जी ने मुझे लिखने की पूरी स्वतंत्रता दी। ये आलेख उसी का सुपरिणाम हैं। इसके पहले मैंने उन्हीं के कहने पर भोपाली जबान में ‘बतोलेबाज’ लिखने की चुनौती सफलतापूर्वक स्वीकार की थी। हिंदी प‍त्रकारिता में रोज और अलग-अलग विषयों पर लिखने वाले गिनती के ही हैं। क्योंकि प्रतिदिन लेखन के लिए विषय का चयन और उस पर साधिकार लेखन दोनों ही कठिन काम हैं। ‍दैनिक लेखन का विचार इस आवश्यकता से उपजा क्योंकि अब सोशल मीडिया पर हर सूचना तत्काल मिल जाती है। ऐसे में पाठकों की भी यह अपेक्षा रहती है कि वो अखबार में सम सामयिक घटनाक्रम पर त्वरित, सार्थक और प्रामाणिक टिप्पणी पढ़ सकें।

मैंने इस चुनौती को स्वीकार किया और अपने लेखन के साथ न्याय करने का पूरा प्रयास किया है। यह काम इंटरनेट की मदद के बगैर नहीं हो सकता था। मैंने इस माध्यम का भरपूर उपयोग किया है। मुझे आत्मिक संतोष है कि मेरी पहली किताब का लोकार्पण कार्यक्रम मेरे अपने शहर में आप सबके बीच खण्डवा में हो रहा है। उन्होंने घोषणा की कि कोरोना काल पर उनकी दूसरी किताब भी जल्द ही आने वाली है।

इसी कार्यक्रम में युवा कवि एवं प्रशासनिक अधिकारी नीरज पराशर के काव्य संग्रह ‘कब तक माफ करेगी अम्मा’ का भी लोकार्पण हुआ। कार्यक्रम संचालन करते हुए कवि डॉ. प्रतापराव कदम ने कहा कि रचनाकार बिरादरी में कोई शामिल होता है तो कुनबा बढ़ता है। सृजनधर्मी अन्धकार-अन्धकार नहीं चिल्लाता बल्कि दीया जलाकर रोशनी करता है। डॉ. कदम ने अपनी चर्चित कविता ‘एक तीली बची रहेगी’ का वाचन भी किया। लोकार्पण समारोह में खंडवा के साहित्य जगत की कई हस्तियां यथा कैलाश मंडलेकर, रघुवीर शर्मा, शिवना प्रकाशन के शहरयार खान तथा कई साहित्य प्रेमी मौजूद थे। इस अवसर पर शिवना प्रकाशन के खण्डवा कार्यालय के संपादक तथा शिवना साहित्यिकी के सह-संपादक शैलेन्द्र शरण ने लोकार्पित कृतियों के लेखकों का शाल, श्रीफल से सम्मान किया। अंत में आभार प्रदर्शन विवेक पाण्डेय आयुक्त जनजातीय कार्य विभाग खण्डवा ने किया।