सतीश जोशी

सुमित्रा कास्‍डेकर का कांग्रेस छोड़ना
क्‍या यह महज एक विधायक का इधर से उधर जाना भर है? क्या यह उस श्रृंखला का हिस्सा है जो ज्योतिराादित सिंधिया के बाद विधायकों के कांग्रेस से इस्तीफा देने से शुरू हुई थी। या इसके कुछ और संकेत हैं। कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व का पुराने वरिष्ठ नेताओं से मोह तो एक कारण नहीं है? क्या कोई आपराधिक मामला है, इसकी पृष्ठभूमि में?

बेटों के लिए…
पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजयसिह और कमलनाथ भाजपा से जिस संग्राम को लड़ रहे हैं वह सिर्फ कांग्रेस को बचाने की जंग है या कोशिश इस बात की है कि कांग्रेस को अपने सामने इतना मजबूत कर और अपने अधीन कर लिया जाए कि बड़े नेताओं के बेटे कमान संभाल लें। नकुल नाथ के भविष्य के लिए कमलनाथ सत्ता जाने के बाद भी भोपाल नहीं छोड़ रहे हैं। दिग्विजयसिंह जयवर्धनसिंह के लिए जमीन तैयार कर रहे हैं यह किसी से छिपा है क्या? जयवर्धन पूर्व कमलनाथ सरकार में मंत्री भी तो इसीलिये बन गये थे।

अरुण यादव की खासमखास है
अरुण यादव केन्द्रीय मंत्री बने फिर हटा भी दिए गये। उनके पिता सुभाष यादव दूसरे नंबर पर ही रहे। उप-मुख्यमंत्री रहते उनका दर्द कई बार सार्वजनिक हुआ। अरुण यादव की खासमखास सुमित्रा कास्‍‍‍‍डेकर ने कांग्रेस का त्याग करते समय अपने नेता अरुण यादव से कोई सलाह ली थी या नहीं? अरुण यादव के पिता दो नंबर से एक नंबर नहीं बन सके, अरुण यादव तो वहां तक भी नहीं पहुंचे। अजय सिंह अर्जुनसिंह के सुपुत्र इसी नंबर गेम के शिकार हैं। क्या अरुण यादव कुछ नया सोच रहे हैं। यदि सुमित्रा का जाना पार्टी के लिए कोई संदेश है, तो फिर और भी कुछ होने वाला है… इंतजार ही कर सकते हैं।

सिलसिला जारी है?
तो विधायकों के जाने का सिलसिला रुकने वाला नहीं है। कांग्रेस से भाजपा में आए और मंत्री बने गोविन्दसिंह राजपूत ने दावा भी किया है कि अभी तो और भी विधायक कांग्रेस छोड़ेंगे। कांग्रेस के भीतर नेताओं की यह बेचैनी कांग्रेस के लिए आत्मावलोकन का अवसर तो है ही, यदि वह करना चाहे तो…।

114 से घटकर 90 हुई
बुरहानपुर जिले में नेपानगर विधानसभा सीट की कांग्रेस विधायक सुमित्रा कास्‍‍‍‍डेकर के इस्तीफे के बाद विधानसभा में कांग्रेस की सदस्य संख्या और घट गयी है। कास्‍‍‍‍डेकर के इस्तीफे के बाद अब तक 24 विधायकों ने विधायकी छोड़ी है और दो विधायकों का निधन हुआ है। इस तरह 26 विधानसभा सीटें रिक्त हो गई हैं जिन पर अब उपचुनाव होंगे।
मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव 2018 में कांग्रेस को 114 सीटें मिली थीं जिसके कारण कमल नाथ सरकार बनी थी। इसके बाद 19 महीने में परिस्थितियां इस तरह बदलीं कि सरकार तो रही नहीं, साथ ही विधायकों ने लगातार झटके दिए। पहली बार सरकार गिराने के लिए 22 विधायकों ने इस्तीफे दिए थे तो दूसरी बार बड़ा मलहरा के कुंवर प्रद्युम्न सिंह लोधी ने इस्तीफा दिया और फिर सुमित्रा कास्‍‍‍‍डेकर ने त्याग पत्र देकर कांग्रेस को तीसरा झटका दिया है। इस तरह एक सप्ताह में दूसरे विधायक के इस्तीफे से कांग्रेस पार्टी के खाते में 90 विधायक बचे हैं। विधानसभा में भाजपा के 107, बसपा के दो, सपा का एक और चार निर्दलीय विधायक हैं।