प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल ‘एक पेड़ माँ के न

ममता की जड़ों से उगता हरित भारत

सुयश त्यागी

माँ केवल जन्म नहीं देती, वह जीवन को पोषित भी करती है। ठीक इसी प्रकार प्रकृति भी हमें वायु, जल, अन्न और जीवन के लिए आवश्यक हर संसाधन प्रदान करती है। भारतीय संस्कृति में इसलिए धरती को ‘धरती माता’ और प्रकृति को ‘जननी’ कहा गया है। जब माँ और प्रकृति जैसे दो सबसे पवित्र भाव एक सूत्र में बंध जाएँ, तो वह केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं रहता, बल्कि एक सांस्कृतिक आंदोलन का रूप ले लेता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रारंभ किया गया ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान इसी सोच का परिणाम है। यह केवल वृक्षारोपण का कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक ऐसा भावनात्मक आह्वान है जो लोगों को अपनी माँ के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए पृथ्वी के भविष्य को सुरक्षित बनाने का अवसर देता है।

विश्व पर्यावरण दिवस, 5 जून 2024 को दिल्ली के बुद्ध जयंती पार्क में पीपल का पौधा लगाकर प्रधानमंत्री मोदी ने इस अभियान की शुरुआत की थी। उस समय उन्होंने कहा था कि माँ हमें जीवन देती हैं और वृक्ष जीवन को बनाए रखते हैं। इसलिए हर नागरिक अपनी माँ के नाम पर एक पौधा लगाए और उसकी देखभाल की जिम्मेदारी भी निभाए।

यह विचार जितना सरल था, उसका प्रभाव उतना ही व्यापक सिद्ध हुआ। कुछ ही महीनों में यह अभियान सरकारी कार्यक्रम की सीमाओं से बाहर निकलकर जनभागीदारी का राष्ट्रीय अभियान बन गया। गांवों से लेकर महानगरों तक, विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों तक, सामाजिक संगठनों से लेकर कॉर्पोरेट संस्थानों तक और आम नागरिकों से लेकर जनप्रतिनिधियों तक लाखों लोगों ने इसमें भागीदारी की। आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, जल संकट और प्रदूषण जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, तब वृक्षारोपण केवल पर्यावरणीय गतिविधि नहीं, बल्कि अस्तित्व की आवश्यकता बन गया है। संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न रिपोर्टें बताती हैं कि वैश्विक तापमान में वृद्धि को नियंत्रित करने और कार्बन उत्सर्जन को संतुलित करने में वृक्ष सबसे प्रभावी प्राकृतिक साधनों में से एक हैं। एक परिपक्व वृक्ष अपने जीवनकाल में बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर वातावरण को संतुलित रखने में सहायता करता है। वृक्ष भूजल संरक्षण, जैव विविधता, मिट्टी की उर्वरता और स्थानीय जलवायु के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

यही कारण है कि ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान को केवल वृक्षारोपण तक सीमित न रखकर ‘मिशन लाइफ’, हरित विकास और विकसित भारत-2047 की व्यापक दृष्टि से जोड़ा गया। यह अभियान नागरिकों को यह संदेश देता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारों का दायित्व नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की व्यक्तिगत जिम्मेदारी भी है।

अभियान के पहले चरण में 80 करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था, जिसे निर्धारित समय से पहले ही पूरा कर लिया गया। इसके बाद देशभर में वृक्षारोपण की गति और तेज हुई तथा विभिन्न राज्यों, मंत्रालयों, शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक संगठनों ने इसे जनआंदोलन का स्वरूप प्रदान किया। वर्ष 2024 में देशभर में 100 करोड़ से अधिक पौधारोपण की जानकारी दर्ज की गई, जो जनभागीदारी का अभूतपूर्व उदाहरण माना गया।

अभियान के दूसरे चरण में विशेष रूप से विद्यार्थियों और युवा पीढ़ी को जोड़ा गया। विद्यालयों और महाविद्यालयों में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित किए गए। बच्चों को अपनी माँ के साथ पौधा लगाकर उसकी तस्वीर साझा करने के लिए प्रेरित किया गया। इससे वृक्ष केवल पर्यावरणीय संपत्ति नहीं रहे, बल्कि परिवार की भावनात्मक स्मृति का हिस्सा भी बन गए।

वर्ष 2026 में भी यह अभियान निरंतर विस्तार प्राप्त कर रहा है। विभिन्न राज्यों, स्थानीय निकायों, स्वयंसेवी संस्थाओं, एनसीसी, एनएसएस, माय भारत वालंटियर्स और नागरिक समूहों ने व्यापक स्तर पर वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित किए हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म और मोबाइल एप के माध्यम से पौधों की जियो-टैगिंग, निगरानी और जनसहभागिता को भी बढ़ावा दिया गया है।

हालांकि किसी भी वृक्षारोपण अभियान की सफलता केवल पौधे लगाने की संख्या से नहीं मापी जा सकती। वास्तविक सफलता तब होगी जब लगाए गए पौधे जीवित रहें, विकसित हों और आने वाले वर्षों में छायादार वृक्ष बनकर पर्यावरण को समृद्ध करें। भारत में अनेक बार बड़े स्तर पर पौधारोपण तो हुआ, लेकिन पौधों के संरक्षण और रखरखाव पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। इस दृष्टि से ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान की सबसे बड़ी शक्ति इसका भावनात्मक आधार है। जिस पौधे को व्यक्ति अपनी माँ से जोड़कर लगाएगा, उसके संरक्षण की संभावना भी उतनी ही अधिक होगी।

भारतीय परंपरा में वृक्ष केवल जैविक इकाई नहीं, बल्कि जीवन और संस्कृति के प्रतीक रहे हैं। पीपल, बरगद, नीम, आंवला, तुलसी और कल्पवृक्ष जैसी अवधारणाएँ हमारी सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा हैं। यह अभियान उसी सांस्कृतिक चेतना को आधुनिक पर्यावरणीय जरूरतों से जोड़ता है।

आज आवश्यकता केवल अधिक पेड़ लगाने की नहीं, बल्कि ऐसी जीवनशैली विकसित करने की है जो प्रकृति के साथ संतुलित संबंध स्थापित करे। यदि प्रत्येक नागरिक अपनी माँ के नाम पर लगाया गया पौधा जीवित रखने का संकल्प ले, तो यह अभियान आने वाले वर्षों में भारत के पर्यावरणीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय बन सकता है।

‘एक पेड़ माँ के नाम’ वास्तव में एक पौधा लगाने का अभियान भर नहीं है। यह कृतज्ञता का उत्सव है, प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व का संदेश है और विकसित भारत की हरित नींव रखने का राष्ट्रीय संकल्प भी है। जब ममत्व और पर्यावरण संरक्षण का संगम होता है, तब वृक्ष केवल पेड़ नहीं रहते, वे भविष्य की सांसें बन जाते हैं। (लेखक मध्यप्रदेश भाजपा के सोशल मीडिया विभाग के प्रदेश संयोजक हैं।)