मीम क्रांति या युवा आक्रोश: 'कॉकरोच' के बहाने सुलगते सवाल
गिरीश उपाध्याय
भारत में इन दिनों चर्चा में आया ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का मामला सिर्फ किसी न्यायिक टिप्पणी पर उपजी एक आम भावनात्मक प्रतिक्रिया भर नहीं है। असल में यह आज के जनसंचार, सोशल मीडिया की ताकत और युवाओं के बदलते मनोविज्ञान को समझने का एक बेहद अहम उदाहरण है। मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि इस डिजिटल अभियान की शुरुआत सुप्रीम कोर्ट के माननीय मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की एक टिप्पणी के बाद हुई। इस टिप्पणी को बेरोजगार युवाओं, सोशल मीडिया यूजर्स, आरटीआई कार्यकर्ताओं और मीडिया जगत से जुड़े लोगों ने अपने लिए ‘कॉकरोच’ जैसी अपमानजनक तुलना के रूप में लिया। हालांकि, बाद में इस टिप्पणी को लेकर स्पष्टीकरण आने और इसे वापस लेने की बातें भी सामने आईं, पर तब तक देर हो चुकी थी और यह शब्द सोशल मीडिया पर विरोध का एक बड़ा प्रतीक बन चुका था।
इस पूरी घटना का सबसे दिलचस्प और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि युवाओं ने जिस शब्द को अपने अपमान के तौर पर महसूस किया, उसी को अपनी ताकत बना लिया। उन्होंने इसे एक तीखे व्यंग्य और प्रतिरोध की नई पहचान में बदल दिया। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ ने खुद को ‘आलसी और बेरोजगारों की आवाज’ जैसे चुटीले और व्यंग्यात्मक नारे के साथ लोगों के सामने रखा। सुनने में यह नाम भले ही अजीब या हास्यास्पद लगे, लेकिन इसके पीछे बेरोजगारी, कमरतोड़ महंगाई, भविष्य की असुरक्षा, मीडिया की आजादी, लैंगिक समानता और राजनीति में अपनी हिस्सेदारी जैसे बेहद गंभीर व बुनियादी सवाल छिपे हैं। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह अभियान महज कुछ ही दिनों के भीतर लाखों-करोड़ों डिजिटल यूजर्स तक पहुंच गया। इसके संस्थापक अभिजीत दीपके का कहना है कि यह पूरी तरह से एक शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक कोशिश है, जिसका मकसद राजनीतिक विमर्श के तौर-तरीकों को बदलना है। रिपोर्ट में यह भी साफ किया गया है कि इस अभियान से जुड़े लगभग 70 फीसदी लोग 19 से 25 साल के नौजवान हैं।
यह पूरा घटनाक्रम हमें दिखाता है कि आज जनसंचार (कम्युनिकेशन) का तरीका पूरी तरह बदल चुका है; अब यह ऊपर से नीचे की तरफ नहीं चलता। एक दौर था जब बड़े मीडिया घराने, राजनीतिक दल या सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग तय करते थे कि देश में किस मुद्दे पर बहस होगी। लेकिन आज के दौर में किसी का बोला गया महज एक वाक्य, एक मीम, एक हैशटैग या फोन से बनाया गया एक छोटा सा वीडियो भी पूरी बहस का रुख मोड़ने का माद्दा रखता है। सोशल मीडिया ने देश के आम नागरिक को सिर्फ मूकदर्शक बने रहने से रोक दिया है; आज का आम इंसान खुद ही कंटेंट का निर्माता है, खुद ही उसका प्रसारक है और खुद ही उस पर अपनी आपत्ति दर्ज कराने वाला प्रतिवादी भी है।
इस पूरे मामले में ‘कॉकरोच’ शब्द को पलटवार की तरह इस्तेमाल करना गहराई से समझने और अध्ययन करने का विषय है। किसी अपमानजनक प्रतीक को अपने आंदोलन का हथियार बना लेना, दरअसल आज की नई पीढ़ी की अपनी डिजिटल भाषा की एक बड़ी खासियत है। पुराने दौर के आंदोलनों में जहाँ पोस्टर, नारे, पर्चे और बड़ी-बड़ी जनसभाएं सबसे मुख्य जरिया हुआ करती थीं वहीं आज के दौर में मीम, इंस्टाग्राम रील, एक्स (ट्विटर) पोस्ट, इंस्टाग्राम हैंडल्स, लाइव स्ट्रीम और डिजिटल मेंबरशिप ही नए जमाने के पर्चे और पोस्टर बन चुके हैं।
मगर इस असीम डिजिटल ताकत के साथ कुछ गहरे खतरे भी जुड़े हुए हैं। हिसार पुलिस और उसकी साइबर सेल ने आगाह किया है कि इस अभियान की बढ़ती लोकप्रियता का फायदा उठाकर कुछ शरारती तत्व फर्जी मेंबरशिप लिंक और फिशिंग मैसेज भेज रहे हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि इंटरनेट पर वायरल होने वाली कोई भी भावुक लहर बहुत आसानी से साइबर ठगी, डेटा चोरी और वित्तीय धोखाधड़ी का जरिया बन सकती है।
यही वजह है कि ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को सिर्फ एक मजाक या कुछ दिनों का अस्थाई वायरल ट्रेंड मान लेना बहुत बड़ी भूल होगी। असल में यह डिजिटल युग में आत्मसम्मान, असंतोष और अपनी बात रखने की एक बिल्कुल नई भाषा का शुरुआती संकेत है।
क्या यह भारत में जेन-जी (Gen-Z) की राजनीतिक प्रतिक्रिया है?
इस सवाल का जवाब हमें बहुत सोच-समझकर और सावधानी से ढूंढना होगा। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को सीधे-सीधे कोई बड़ी राजनीतिक क्रांति कह देना शायद जल्दबाजी या अतिशयोक्ति होगी, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि यह आज की युवा पीढ़ी (जेन-जी) के भीतर पनप रही बेचैनी, हताशा और उनकी प्रतीकात्मक प्रतिक्रिया का एक जीवंत रूप है। जेन-जी (Gen-Z) का मतलब उस पीढ़ी से है जो इंटरनेट, स्मार्टफोन, मीम संस्कृति, तुरंत फीडबैक देने और दृश्यों (विजुअल्स) के जरिए बात करने के माहौल में ही पली-बढ़ी है। यह पीढ़ी विचारधाराओं से भरी लंबी-चौड़ी किताबें पढ़ने के बजाय छोटे, मारक और प्रतीकों से भरे संदेशों को ज्यादा पसंद करती है और उनसे तुरंत जुड़ जाती है।
रॉयटर्स की रिपोर्ट में भी इस अभियान को सीधे तौर पर भारत के युवाओं की चिंताओं से जोड़कर देखा गया है, जिसमें बेरोजगारी, आर्थिक तनाव और करियर व जीवन से जुड़े बड़े फैसलों में हो रही देरी जैसे गंभीर मुद्दों का जिक्र है। रिपोर्ट के अनुसार, 15 से 29 साल के उम्र वर्ग में पसरी बेरोजगारी और आर्थिक दबावों की चिंता इस पूरे आंदोलन की असली पृष्ठभूमि है।
अगर हम भारत के पड़ोसी देशों पर नजर डालें, तो पिछले कुछ सालों में वहाँ हुए युवा आंदोलनों ने सत्ता और समाज की चूलें हिलाकर रख दी हैं। बांग्लादेश में साल 2024 का छात्र आंदोलन महज सरकारी नौकरियों में कोटा व्यवस्था के विरोध से शुरू हुआ था, लेकिन देखते ही देखते वह सरकार के खिलाफ एक बहुत बड़े राजनीतिक असंतोष में बदल गया। ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट बताती है कि इसी भारी जनाक्रोश के दबाव में आकर 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देकर देश छोड़ना पड़ा था।
इसी तरह, साल 2025 में नेपाल के भीतर सोशल मीडिया पर लगाए गए प्रतिबंधों के खिलाफ वहां की युवा पीढ़ी (जेन-जी) का गुस्सा भड़क उठा। रॉयटर्स और द गार्डियन की रिपोर्ट्स के मुताबिक, जब वहां की सरकार ने कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पाबंदी लगाई, तो युवाओं में भारी नाराजगी फैल गई। प्रदर्शन इतने उग्र और हिंसक हो गए कि कुछ लोगों को अपनी जान तक गंवानी पड़ी और आखिरकार तत्कालीन प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को अपने पद से इस्तीफा देना ही पड़ा।
श्रीलंका में साल 2022 का ‘अरगलया’ (Aragalaya) आंदोलन भी इसी संदर्भ में एक बहुत बड़ा उदाहरण है। कार्नेगी एंडोवमेंट के एक अध्ययन से पता चलता है कि यह आंदोलन किसी खास राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित नहीं था, बल्कि यह देश की बदहाल आर्थिक स्थिति, गहरे भ्रष्टाचार और शासन के पूरी तरह फेल हो जाने की वजह से उपजे आम जनता के गुस्से का नतीजा था। फ्रीडम हाउस ने भी अपनी रिपोर्ट में लिखा कि श्रीलंका में आए भयंकर आर्थिक संकट के बाद लोग सोशल मीडिया के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़े और देखते ही देखते यह आंदोलन पूरे देश में राजनीतिक सुधारों की मांग का मुख्य जरिया बन गया।
इन तमाम पड़ोसी देशों के उदाहरणों को सामने रखकर ही हमें भारत की मौजूदा स्थिति को परखना होगा। भारत का लोकतंत्र इन देशों के मुकाबले बहुत बड़ा, बेहद मजबूत, संस्थागत और कई स्तरों में बंटा हुआ है। हमारे यहाँ चुनावी राजनीति, एक स्वतंत्र न्यायपालिका, जागरूक मीडिया, मजबूत संघीय ढांचा और नागरिक समाज (सिविल सोसायटी) के पास अपनी बात रखने के कई लोकतांत्रिक मंच मौजूद हैं। इसलिए इंटरनेट पर चलने वाले किसी भी वायरल अभियान की तुलना सीधे नेपाल, बांग्लादेश या श्रीलंका के हालातों से करना तार्किक नहीं होगा। इसके बावजूद, यह इस बात का साफ इशारा जरूर है कि आज का नौजवान अपने सम्मान, रोजगार, बेहतर अवसरों, अभिव्यक्ति की आजादी और राजनीति में अपनी हिस्सेदारी को लेकर पहले से कहीं ज्यादा संवेदनशील हो चुका है।
‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की अहमियत इसलिए है क्योंकि यह आज के युवाओं (जेन-जी) की अपनी खास जुबान में किया गया एक तीखा राजनीतिक व्यंग्य है। यह नेताओं के पारंपरिक और उबाऊ भाषणों जैसा नहीं है, बल्कि मीम्स पर टिकी हुई एक आधुनिक राजनीतिक प्रतिक्रिया है। इसमें व्यवस्था के प्रति नाराजगी भी है, थोड़ा सा मजाक भी है, एक गहरा अविश्वास भी छिपा है और साथ ही सरकार से संवाद करने की एक तड़प भी है।
क्या इसके पीछे देश को अस्थिर करने वाली ताकतें सक्रिय हैं?
इस बेहद संवेदनशील सवाल पर बहुत ही संतुलित और निष्पक्ष नजरिया रखना जरूरी है। सच यह है कि इंटरनेट पर जब भी कोई डिजिटल अभियान बहुत तेजी से फैलता है, तो उसमें बाहरी ताकतों के दखल, बॉट नेटवर्क्स (Bot Networks), फर्जी प्रोफाइल्स, डेटा की हेराफेरी और साइबर स्पेस के गलत इस्तेमाल की आशंका हमेशा बनी रहती है और इससे इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन इसके साथ ही, बिना किसी ठोस और पुख्ता सबूत के किसी भी युवा आंदोलन या डिजिटल अभियान को सीधे 'राष्ट्रविरोधी साजिश' करार दे देना भी बेहद खतरनाक रुख है। ऐसा करने से युवाओं के बीच और ज्यादा तीखी तथा उल्टी प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है।
कुछ राजनीतिक नेताओं ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के सोशल मीडिया फॉलोअर्स की लोकेशन को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। मिसाल के तौर पर, पश्चिम बंगाल भाजपा के अध्यक्ष सुकांत मजूमदार ने दावा किया कि इस अभियान से जुड़े फॉलोअर्स की एक बहुत बड़ी तादाद पाकिस्तान से है और भारत के लोग इसमें कम हैं। यद्यपि यह दावा मीडिया की सुर्खियों में रहा, लेकिन अभी तक सामने आई आधिकारिक रिपोर्ट्स में तकनीकी आधार पर या किसी स्वतंत्र एजेंसी द्वारा इस बात की कोई पुष्टि या सत्यापन नहीं हो सका है।
यहाँ यह समझना भी जरूरी है कि सोशल मीडिया पर केवल विदेशी फॉलोअर्स का होना ही अपने आप में किसी बड़ी साजिश का पक्का सबूत नहीं मान लिया जा सकता। इसके लिए हमें ऐसे संवेदनशील मामलों में सोशल मीडिया पर सक्रिय युवाओं के मानसिक नजरिए को समझना होगा। कई बार इंटरनेट के एल्गोरिदम, लोगों की उत्सुकता, ट्रेंडिंग हैशटैग्स, व्यंग्य का पुट, भाषा की समानता, राजनीतिक दिलचस्पी या विरोधी पक्ष के दुष्प्रचार की वजह से भी सरहद पार के लोग ऐसे अभियानों से जुड़ जाते हैं। हाँ, अगर इस बात के पुख्ता प्रमाण मिलते हैं कि इसके पीछे कोई संगठित बॉट नेटवर्क काम कर रहा है, संदिग्ध पैसों का लेन-देन हो रहा है, हिंसा भड़काने की कोशिश की जा रही है, कोई विदेशी फंडिंग है या संवेदनशील डेटा का गलत इस्तेमाल हो रहा है, तो निश्चित रूप से इसकी गहन जांच और सख्त कानूनी कार्रवाई दोनों बेहद जरूरी हैं।
इस पूरे परिदृश्य को हमें दो अलग-अलग स्तरों पर देखना होगा। पहला स्तर है नौजवानों के भीतर का वास्तविक और जायज असंतोष। और दूसरा स्तर है उस असंतोष का किसी शरारती तत्व द्वारा किया जाने वाला गलत इस्तेमाल। अगर देश का युवा रोजगार, महंगाई, संस्थाओं की भाषा, अपनी हिस्सेदारी और अपनी आवाज को लेकर सवाल पूछ रहा है, तो उसे सिर्फ एक 'साजिश' का नाम देकर खारिज कर देना हमारे लोकतांत्रिक विमर्श को बहुत कमजोर कर देगा। वहीं दूसरी तरफ, अगर कोई विदेशी ताकत या कोई संगठित नेटवर्क इस गुस्से की आड़ लेकर देश में अस्थिरता का माहौल पैदा करना चाहता है, तो उसकी बारीकी से जांच करना और देश को सुरक्षित रखना सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
इस पूरे मामले में साइबर सुरक्षा का पहलू सबसे ज्यादा ध्यान देने योग्य है। फर्जी मेंबरशिप लिंक को लेकर पुलिस द्वारा जारी की गई चेतावनियां साफ दिखाती हैं कि साइबर अपराधी ऐसी वायरल भावनाओं को पलक झपकते ही अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर लेते हैं। कोई भी डिजिटल आंदोलन इंटरनेट पर जितनी तेजी से रफ्तार पकड़ता है, उतनी ही तेजी से फेक लिंक्स, जाली अकाउंट्स, नकली फंडिंग, झूठी अफवाहें और लोगों को भड़काने वाली गलत जानकारियां भी समाज में फैलने लगती हैं।
इसलिए सबसे समझदारी भरी बात यही होगी कि ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को न तो आंख मूंदकर तुरंत कोई देशविरोधी साजिश मान लिया जाए और न ही इसे महज एक मासूम सा हंसने-हंसाने वाला अभियान समझकर छोड़ दिया जाए। बल्कि इसे डिजिटल युग के एक नए सामाजिक-राजनीतिक उभार के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसकी पारदर्शिता, पैसों के लेन-देन (फंडिंग), डेटा की प्राइवेसी और इसकी सार्वजनिक भाषा पर लगातार नजर रखना बेहद आवश्यक है।
सोशल मीडिया क्रांतियां: भारतीय लोकतंत्र के लिए संदेश
इक्कीसवीं सदी में आंदोलनों और क्रांतियों का पूरा स्वरूप ही बदल चुका है। एक दौर था जब किसी भी आंदोलन को खड़ा करने के लिए बड़े संगठनों, कद्दावर नेतृत्व, भारी संसाधनों और महीनों-सालों की लंबी तैयारी की जरूरत होती थी। लेकिन आज डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की बदौलत लोगों के भीतर का असंतोष महज कुछ ही घंटों में एक बहुत बड़ी सार्वजनिक ताकत बनकर सड़कों या स्क्रीन पर नजर आने लगता है। 'अरब स्प्रिंग' से लेकर हॉन्गकॉन्ग, श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल तक के वाकये गवाह हैं कि सोशल मीडिया ने जन-विरोध को एक नई ताकत, तेज रफ्तार और पूरी दुनिया में एक मजबूत नेटवर्क दिया है।
तथापि, हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि सोशल मीडिया खुद कोई क्रांति पैदा नहीं करता। वह केवल समाज में पहले से मौजूद गुस्से और असंतोष को एक मंच, एक भाषा और एक बड़ा विस्तार देने का जरिया बनता है। श्रीलंका में लोग आर्थिक तबाही से जूझ रहे थे, इसलिए सोशल मीडिया ने उसे एक ऐतिहासिक जन-आंदोलन में बदल दिया। बांग्लादेश में छात्रों के भीतर नौकरी को लेकर गुस्सा और सरकार के प्रति गहरी नाराजगी पहले से थी, डिजिटल माध्यमों ने तो बस उसे एक राष्ट्रव्यापी संकट का रूप दे दिया। नेपाल में जब सरकार ने सोशल मीडिया पर पाबंदी लगाई, तो युवाओं की अभिव्यक्ति की आजादी, भ्रष्टाचार और उनके धुंधले भविष्य की सारी चिंताएं एक साथ मिलकर ज्वालामुखी बन गईं।
इस लिहाज से देखें तो भारत में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का यह पूरा मामला हमारे लिए एक बड़ी चेतावनी भी है और एक बेहतरीन मौका भी। चेतावनी इसलिए, क्योंकि जिम्मेदार और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की भाषा अब बंद कमरों या चुनिंदा महफिलों तक सीमित नहीं रह गई है। किसी अदालत, संसद, प्रेस कॉन्फ्रेंस या सार्वजनिक मंच से निकला एक-एक शब्द पल भर में करोड़ों लोगों के मोबाइल स्क्रीन तक पहुंच जाता है। और यह एक शानदार मौका इसलिए है, क्योंकि इसके जरिए देश के युवाओं को अपनी बात पूरी तरह शांतिपूर्ण, बेहद रचनात्मक और एक तीखे व्यंग्य के साथ सामने रखने का एक नया रास्ता मिल गया है।
आज मास कम्युनिकेशन (जनसंचार) के जानकारों और विश्लेषकों के सामने यह पूरा प्रसंग कई अनुत्तरित सवाल छोड़ जाता है कि क्या सोशल मीडिया सचमुच हमारे लोकतंत्र को और मजबूत बना रहा है या फिर यह इसे 'भीड़तंत्र' की तरफ धकेल रहा है? क्या इंटरनेट पर बनने वाले मीम्स आने वाले समय में राजनीतिक चेतना जगाने का नया जरिया बनेंगे? क्या सोशल मीडिया पर उठने वाली ये अस्थाई वायरल लहरें कभी किसी मजबूत जमीन से जुड़े संगठन का रूप ले पाएंगी? क्या इंटरनेट पर मिलने वाले लाखों लाइक्स और फॉलोअर्स को सचमुच जमीन पर मिलने वाला वास्तविक जनसमर्थन माना जा सकता है? और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या ये बड़ी टेक और सोशल मीडिया कंपनियां अब हमारे लोकतांत्रिक संवाद की नई पहरेदार (गेटकीपर) बन चुकी हैं?
इन सब जटिल सवालों का कोई सीधा या एकतरफा जवाब नहीं हो सकता। सोशल मीडिया ने समाज के सबसे आखिरी पायदान पर बैठे सामान्य नागरिक को खुलकर बोलने की असाधारण ताकत तो दी है, लेकिन इसके साथ ही किसी भी खबर को शेयर करने से पहले उसकी सत्यता जांचने की जिम्मेदारी भी कई गुना बढ़ा दी है। इसने युवाओं को एक मंच पर जुड़ने का मौका दिया है, तो दूसरी तरफ एक ऐसी भीड़ भी तैयार कर दी है जो बहुत जल्दी भावनाओं में बह जाती है। इसने जनता को सत्ता के गलियारों से सीधे तीखे सवाल पूछने की हिम्मत दी है, तो वहीं दूसरी तरफ इसी मंच पर झूठी अफवाहों और साइबर अपराधों का एक काला बाजार भी खड़ा कर दिया है।
आज भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा और जरूरी संदेश यही है कि हमें अपने देश के युवाओं की इस नई बदलती भाषा को गहराई से समझना होगा। उन्हें सिर्फ ‘ट्विटर ट्रोल’, ‘आलसी’, ‘बेरोजगार’, ‘भटके हुए नौजवान’ या ‘बहकावे में आए लोग’ कहकर खारिज कर देने से इस समस्या का समाधान कभी नहीं निकलेगा। अगर आज का कोई युवा सीधे तौर पर राजनीति में न आकर, मीम्स और व्यंग्य के जरिए अपनी बात रख रहा है, तो हमें उसके इस मजाकिया अंदाज के पीछे छिपी उसकी वास्तविक पीड़ा और तड़प को महसूस करना होगा। सम्मानजनक रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, जीवन में आगे बढ़ने के बेहतर अवसर, व्यक्तिगत मान-सम्मान, डिजिटल स्पेस में आजादी और सरकारी संस्थाओं का संवेदनशील रवैया ही आज के युवा भारत के सबसे केंद्रीय और महत्वपूर्ण सवाल हैं।
सच तो यह है कि ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का यह पूरा विवाद समाज और व्यवस्था के सामने रखा एक आईना है। इस आईने में आज के युवाओं का आक्रोश भी साफ झलकता है, उनका मजाकिया अंदाज भी दिखता है, व्यवस्था के प्रति गहरा अविश्वास भी नजर आता है और साथ ही एक स्वस्थ लोकतांत्रिक संवाद के लिए उनकी तड़प भी दिखाई देती है। वक्त की मांग है कि हम इस बदलाव को गहराई से समझें, इससे डरें नहीं। अगर कोई गड़बड़ी है तो उसकी निष्पक्ष जांच जरूर करें, लेकिन युवाओं की आवाज का दमन बिल्कुल न करें। उनके साथ बैठकर एक खुला संवाद करें, उनका उपहास न उड़ाएं। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा पत्रकारीय, सामाजिक और शैक्षणिक निष्कर्ष यही है।
आग्रह- इस आलेख पर आपकी टिप्पणी का इंतजार रहेगा।