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सलवा जुडूम : नक्सलियों से आदिवासियों के संघर्ष की दास्तां, अदालत के एक फैसले ने बदली कहानी

Story of Salwa Judum : साल 2013, छत्तीसगढ़ में चुनाव सिर पर थे। कहीं भाजपा तो कहीं कांग्रेस रैली कर रही थी। पिछले कुछ सालों से एक विशेष नक्सल विरोधी अभियान ने माओवादियों की कमर तोड़ रखी थी। ऐसे में चुनावी साल में कुछ बड़ा करने की गुपचुप प्लानिंग माओवादी खेमे में जारी थी। बीते दस सालों से रमन सिंह के नेतृत्व में भाजपा सत्ता पर काबिज थी। कांग्रेस वापसी के लिए परिवर्तन यात्रा निकाल रही थी। 

मई की चिलचिलाती गर्मी में नक्सल प्रभावित क्षेत्र सुकमा में कांग्रेस ने परिवर्तन रैली की। 25 गाड़ियां में कांग्रेस के 200 नेता...माओवादियों ने जगह और मौका दोनों भांप लिया। परिवर्तन रैली ख़त्म करके कांग्रेस नेताओं का काफिला जगदलपुर को निकला। शाम के करीब 4 बजे काफिला झीरम घाटी से निकला। रास्ते में कुछ पेड़ गिरे थे। गाड़ियां आगे नहीं निकल सकती थी। एक - एक कर सभी गाड़ियां रुक गई। चारों ओर एक अजीब सा सन्नाटा था। कोई कुछ समझ पाता इसके पहले ही पेड़ों के पीछे छिपे नक्सली सामने आए और ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। 

इस काफिले में सबसे आगे थे कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल। कवासी लखमा भी उन्हीं के साथ थे। सुरक्षा गार्ड भी गाड़ी में ही मौजूद थे। इस गाड़ी के पीछे थी महेन्द्र कर्मा और मलकीत सिंह गैदू की गाड़ी। यही इन 200 नक्सलियों का टारगेट था। डेढ़ घंटे तक गोलीबारी हुई। 

जब फायरिंग करके नकस्लियों का मन भर गया तो वे गाड़ियों के करीब आए। इसके बाद गोलियों से छलनी शवों पर चाकू से वार करने लगे। झीरम घाटी खून से लाल हो चुकी थी। तभी एक गाड़ी से एक शख्स नीचे उतरा, ये कोई और नहीं बल्कि महेंद्र कर्मा थे। कुछ जिन्दा बचे लोगों को जब नक्सली बंधक बनाने लगे तो उन्होंने नक्सलियों से कहा - 'मुझे बंधक बना लो बाकियों को छोड़ दो।'

नक्सली उन्हें कुछ दूर लेकर गए और बेरहमी से उन्हें मौत के घाट उतार दिया। खौफनाक मंजर की एक झलक महेंद्र कर्मा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मिलती है। उनके शव पर 78 वार मिले, 65 गोलियों से उनका शरीर छलनी - छलनी कर दिया गया था। 

महेंद्र कर्मा समेत कांग्रेस के टॉप नेताओं का इस हमले में सफाया हो गया। सिर्फ अजीत जोगी बच पाए। 

आपके मन में सवाल होगा कि, आखिर महेंद्र कर्मा नक्सलियों का टारगेट क्यों थे। इसका जवाब है - 'एक विशेष नक्सल विरोधी अभियान'

इस अभियान को सलवा जुडूम के नाम से जानते हैं। आज सलवा जुडूम की चर्चा क्यों?तो उसका जवाब है - गृह मंत्री अमित शाह की टिप्पणी। उन्होंने उप राष्ट्रपति की रेस में दौड़ रहे INDIA ब्लॉक के उम्मीदवार पूर्व जज बी सुदर्शन रेड्डी पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि, वामपंथी दबाव में कांग्रेस ने ऐसे व्यक्ति को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया जिन्होंने नक्सल समर्थक रुख अपनाया। सलवा जुडूम को खारिज कर आदिवासियों के आत्मरक्षा के अधिकार को समाप्त किया। इस वजह से नक्सलवाद दो दशकों से अधिक समय तक देश के लिए गंभीर चुनौती बना। 

मामला तब और बढ़ा जब सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीशों के एक समूह ने वरिष्ठ वकीलों के साथ मिलकर एक संयुक्त बयान जारी किया। बयान में सलवा जुडूम मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2011 के फैसले की "गलत व्याख्या" करने के लिए गृह मंत्री अमित शाह की निंदा की गई। यह फैसला न्यायमूर्ति बी सुदर्शन रेड्डी ने लिखा था।

अब जानते हैं 'सलवा जुडूम' के बारे में... "सलवा जुडूम" गोंड भाषा का शब्द है। इसका अर्थ है  "शांति मार्च" इसकी शुरुआत कैसे हुई यह जानने के लिए कहानी को आज से 20 साल पीछे ले जाना होगा।  मई 2005, माओवादियों ने बीजापुर के कुटरू-बेद्रे मार्ग से एक पुलिस कैम्प में राशन की लूट की। संदेह के आधार पर, पुलिस ने कुछ ग्रामीणों को हिरासत में लिया। ग्रामीणों का एक समूह आगे आया और पुलिस से वादा किया कि वे असली अपराधियों को पकड़ने में मदद करेंगे। ग्रामीण वापस लौटे और एक माओवादी को पुलिस के हवाले कर दिया। जो उनके अनुसार लूटपाट की घटना में शामिल था। इसके बाद ग्रामीणों ने एक बड़ी बैठक की। इस बात पर चर्चा की कि, उन्हें माओवादियों के साथ-साथ पुलिस से भी कितनी परेशानी हो रही है। तय हुआ कि, वे अपने गांव में किसी भी नक्सली गतिविधि की अनुमति नहीं देंगे। यही सलवा जुडूम की शुरुआत थी।

आंदोलन को कुचलने के लिए नक्सलियों ने ऐसी बैठकें करने वाले नेताओं को निशाना बनाना शुरू कर दिया। एक महीने बाद, जून 2005 में ऐसी ही एक बैठक हुई। वरिष्ठ कांग्रेसी आदिवासी नेता और पूर्व मंत्री महेंद्र कर्मा को बीजापुर के नैमेड़ गांव बुलाया गया। यहां कर्मा ने इस आंदोलन को "सलवा जुडूम" नाम दिया।

"जन जागरण" के रूप में शुरू हुआ 'सलवा जुडूम', ग्रामीणों के द्वारा माओवादियों के खिलाफ एक शांतिपूर्ण आंदोलन था। इसमें प्रमुख रूप से छत्तीसगढ़ के आदवासी युवा शामिल थे। जल्द ही सलवा जुडूम एक राज्य प्रायोजित मिलिशिया के रूप में बदल गया। आदिवासी युवाओं को बस्तर क्षेत्र में माओवादी विद्रोह का मुकाबला करने के लिए संगठित और सशस्त्र किया गया था।

सलवा जुडूम जब हिंसक हुआ तो बस्तर के कई गांव और परिवार बंट गए। कई लोग राज्य सरकार द्वारा विशेष पुलिस अधिकारियों (एसपीओ) के रूप में भर्ती किए गए। सुरक्षा के लिए ग्रामीण संरक्षित राहत शिविरों में रहने को मजबूर हो गए। नक्सलियों ने विद्रोह करने वाले ग्रामीणों को निशाना बनाने के लिए इन कैम्पस को निशाना बनाया। वहीं सशस्त्र एसपीओ ने भी माओवादी समर्थकों को निशाना बनाया।

इसी कहानी का एक दूसरा पक्ष भी है। उस समय की कुछ रिपोर्ट्स यह दावा करती हैं कि, आदिवासी युवाओं को हथियार चलाने की कोई ट्रेनिंग तो दूर बेहतर हथियार भी नहीं दिए गए। इसी कारण ये एसपीओ और उनसे जुड़े लोग अक्सर नक्सलियों के हमले में मारे गए। इस बात का सबूत आंकड़े देते हैं। 

बस्तर में 2005 से 2011 तक अत्यधिक हिंसा देखी गई। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 422 माओवादी, 1019 ग्रामीण और 726 सुरक्षाकर्मी मारे गए। कई गांव जला दिए गए और कई आदिवासी पड़ोसी राज्य में विस्थापित हुए।

अब बात अदालत के उस फैसले की जिससे गृह मंत्री अमित शाह खफा हैं... साल 2011 के अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सलवा जुडूम को अवैध घोषित कर दिया। आदेश दिया कि आंदोलन को खत्म कर दिया जाए। अदालत ने छत्तीसगढ़ को किसी भी तरीके से एसपीओ का उपयोग बंद करने, एसपीओ को जारी किए गए सभी हथियारों को वापस लेने, प्रभावित समुदायों को सुरक्षा  सुरक्षा प्रदान करने और मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामलों की जांच करने और मुकदमा चलाने का भी निर्देश दिया।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला नंदिनी सुंदर, रामचंद्र गुहा और ईएएस शर्मा द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान आया था। याचिका में दंतेवाड़ा में सलवा जुडूम द्वारा व्यापक मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप लगाया गया। न्यायालय ने गांवों को जलाने, बलात्कार और हत्या सहित घोर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों पर विचार किया। सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश ने आरोप लगाया था कि तीन गांवों में 300 घर जला दिए गए, महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया और पुरुषों की हत्या कर दी गई। न्यायालय ने कहा कि इन आरोपों पर राज्य की प्रतिक्रिया अपर्याप्त थी। इसके अलावा, न्यायालय ने विशेष पुलिस अधिकारियों के प्रशिक्षण, नियंत्रण और जवाबदेही की प्रकृति पर भी सवाल उठाया। राज्य के हलफनामे के अनुसार, 1,200 SPO को निलंबित किया गया था।  22 विशेष पुलिस अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कृत्यों के लिए एफआईआर दर्ज की गई थी। ये सभी गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन की ओर इशारा करते हैं।

सलवा जुडूम नक्सलियों का अंत नहीं कर पाया लेकिन इसने कई लोगों को विस्थापन के लिए मजबूर कर दिया। यह जन जागरण आंदोलन शुरू तो अच्छे उद्देश्य से हुआ लेकिन आगे इसमें कई अनियमितताएं जुड़ गई। अदालत ने मानवाधिकार उल्लंघन के आधार पर इसे रद्द कर दिया जिसके बाद आदिवासियों ने नक्सलियों से बचने के लिए पलायन शुरू हो गया। वो दौर छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में रहने वालों के लिए किसी भयावह सपने से कम नहीं था।