'गवर्नर बहादुर' की कृपा तो आज भी चाहिए...
- गिरीश उपाध्याय
आज हिंदी पत्रकारिता दिवस के बहाने हम भारत के पहले हिंदी अखबार ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ के प्रकाशन के 200 साल पूरे होने का जश्न मना रहे हैं। लेकिन यह समय सिर्फ खुश होने का नहीं है। यह सोचने का है कि इन दो सदियों में स्वस्थ पत्रकारिता के लिए हालात कितने बदले हैं?
‘उदन्त मार्त्तण्ड’ का जिक्र करते समय हम हमेशा उसकी पहली पंक्ति को याद करके गदगद हो लेते हैं। उसकी अंतिम लाइनों का जिक्र करना या तो हम भूल जाते हैं, या फिर जानबूझकर वहां तक नहीं पहुंचते। यदि हिंदी पत्रकारिता के पिछले 200 सालों की बेबाक समीक्षा करनी है, तो हमें पंडित युगल किशोर शुक्ल की वह उद्घोषणा पूरी पढ़नी होगी। आइए, बात वहीं से शुरू करते हैं।
पंडित युगल किशोर शुक्ल ने मूल घोषणा में लिखा था-
“यह उदन्त मार्तण्ड अब पहले-पहल हिंदुस्तानियों के हित के हेत जो आज तक किसी ने नहीं चलाया। पर अंग्रेजी ओ पारसी ओ बंगाल में जो समाचार का कागज छपता है उनका सुख उन बोलियों के जानने और पढ़ने वालों को ही होता है। और सब लोग पराए सुख से सुखी होते हैं। जैसे पराए धन धनी होना और अपनी रहते परायी आंख देखना, वैसे ही जिस गुण में जिसकी पैठ न हो उसको उसके रस का मिलना कठिन ही है। और हिंदुस्तानियों में बहुतेरे ऐसे हैं। इससे सत्य समाचार हिंदुस्तानी लोग देख आप पढ़ ओ समझ लेयँ, ओ पराई अपेक्षा न करें, ओ अपने भाषे की उपज न छोड़े। इसलिए दयावान, करुणा और गुणनि के निधान, सब के कल्यान के विषय गवरनर जेनेरेल बहादुर की आयस से ऐसे साहस में चित्त लगाय के एक प्रकार से यह नया ठाट ठाटा...”
आज के हिंदी पाठकों और खासकर 'जेन-जी' (Gen-Z) पीढ़ी को समझाने के लिए इसका आसान अर्थ देना बहुत जरूरी है।
सरल शब्दों में इस घोषणा का वास्तविक मतलब यह है- "हम हिंदी बोलने और समझने वाले लोगों के भले के लिए यह समाचार पत्र शुरू कर रहे हैं। अब तक हिंदी में ऐसा कोई अखबार नहीं निकला था। अंग्रेजी, फारसी और बंगाली भाषाओं में अखबार छपते तो हैं, लेकिन उनका लाभ केवल वही लोग उठा पाते हैं जो उन भाषाओं को जानते हैं। बाकी लोग खबरों का आनंद केवल दूसरों के माध्यम से लेते हैं।
यह वैसा ही है जैसे किसी दूसरे के धन को देखकर खुद को अमीर समझ लेना, या अपनी आंखें होते हुए भी किसी और की आंखों से दुनिया देखने की कोशिश करना। जिस भाषा की समझ नहीं होती, उसके ज्ञान और रस को पाना बहुत मुश्किल होता है। हमारे देश में बहुत से लोग ऐसे हैं जो अंग्रेजी, फारसी या बंगाली नहीं जानते। इसलिए जरूरी है कि हिंदीभाषी लोग अपनी भाषा में सच्ची खबरें पढ़ें, उन्हें खुद समझें और जानकारी के लिए दूसरों पर निर्भर न रहें। वे अपनी भाषा का सम्मान करें और उससे दूरी न बनाएं।
इसी उद्देश्य से, दयालु, करुणामयी और सबका कल्याण चाहने वाले गवर्नर जनरल बहादुर (उस समय के ब्रिटिश शासक) की अनुमति प्राप्त करके, यह साहसिक प्रयास करते हुए हम यह नया समाचार पत्र शुरू कर रहे हैं।"
आकांक्षा और विवशता
200 साल पहले की गई इस उद्घोषणा को समझने के लिए हमें इसे दो हिस्सों में बांटकर देखना होगा, पहला इसकी आकांक्षा और दूसरा इसकी विवशता।
पहली लाइन: आकांक्षा और भाषाई स्वाभिमान "हिंदुस्तानियों के हित के हेत जो आज तक किसी ने नहीं चलाया।" यह वाक्य हिंदी पत्रकारिता का पहला और शाश्वत घोषणापत्र है। शुक्ल जी साफ देख रहे थे कि दूसरी भाषाओं के अखबारों के कारण आम हिंदुस्तानी "पराए सुख से सुखी" हो रहा था। उन्होंने तय किया कि हिंदी भाषियों को अपने हितों की बात अपनी भाषा में सोचने का हक मिलना चाहिए। 200 साल पहले तय किया गया यह 'जनहित' आज भी पत्रकारिता की कसौटी है।
अंतिम लाइनें: विवशता और सत्ता का प्रभुत्व स्वीकार करना घोषणा के अंत में शुक्ल जी गवर्नर जनरल लॉर्ड एम्हर्स्ट को "दयावान, करुणा और गुणनि के निधान" कहते हैं। यहाँ हमें शुक्ल जी का जबरन बचाव या महिमामंडन करने की जरूरत नहीं है। इस सच को स्वीकार करना ही होगा कि इस भाषा में पत्रकारिता का स्वाभाविक स्वाभिमान नहीं झलकता। लेकिन यह उस औपनिवेशिक दौर की कड़वी सच्चाई थी, जिसके बिना हिंदी का पहला अखबार पैदा ही नहीं हो सकता था।
1823 के कड़े प्रेस नियमों के तहत बिना सरकारी मंजूरी के प्रेस चलाना नामुमकिन था। शुक्ल जी व्यवस्था के भीतर रहकर रास्ता तलाश रहे थे। यह पंक्ति गवाही देती है कि हिंदी पत्रकारिता का जन्म आजाद हवा में नहीं, बल्कि सत्ता की सख्त निगरानी और अनुमति की बेड़ियों के बीच हुआ था।
तब की और आज की सत्ता: क्या हालात बदले हैं?
आज एक बड़ा और कड़वा यक्ष प्रश्न यह है कि क्या आज भी समय वैसा ही नहीं है? आज भी हमें 'हिंदुस्तानियों के हित के हेत' सोचना है, लेकिन क्या आज का मीडिया बगैर 'गवर्नर जनरल' (यानी आज की सरकार) की 'आयस' (कृपा) के सांस ले पा रहा है? सच्चाई यह है कि आज भी हालात बुनियादी तौर पर नहीं बदले हैं, बस नियंत्रण का चेहरा बदल गया है।
1826 (औपनिवेशिक काल) में सत्ता विदेशी थी। अखबार चलाने के लिए गवर्नर जनरल की प्रत्यक्ष अनुमति और डाक सुविधाओं जैसी रियायतों पर पूरी निर्भरता थी। जरा सी चूक पर अखबार बंद होने का खतरा था।
2026 (आज का डिजिटल काल) में सत्ता स्वदेशी और लोकतांत्रिक है। लेकिन आज समाचार संस्थानों को जीवित रहने के लिए सरकारी विज्ञापनों, राजनीतिक वातावरण और कॉर्पोरेट पूंजी के साथ तालमेल बिठाना पड़ता है। दबाव अब सीधा नहीं, बल्कि परोक्ष और अधिक जटिल है।
तब और आज का आर्थिक चक्रव्यूह
इतिहास गवाह है कि पंडित युगल किशोर शुक्ल को गवर्नर जनरल बहादुर की 'पूरी कृपा' नहीं मिल सकी थी। उन्होंने सरकार से अनुरोध किया था कि ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ की प्रतियों को हिंदी भाषी क्षेत्रों में भेजने के लिए डाक शुल्क में रियायत दी जाए। लेकिन ब्रिटिश सरकार ने इसे ठुकरा दिया।
नतीजा यह हुआ कि कलकत्ता से बाहर अखबार भेजना इतना महंगा हो गया कि पर्याप्त पाठक होने के बावजूद, भारी आर्थिक घाटे के कारण महज 19 महीनों में (दिसंबर 1827) यह अखबार बंद हो गया। शुक्ल जी ने घाटा सहकर अखबार बंद करना बेहतर समझा, लेकिन सत्ता के आगे पूरी तरह घुटने नहीं टेके।
आज के दौर में इस घटना की प्रासंगिकता को निर्ममता से परखें, तो हम पाएंगे कि "सरकारी विज्ञापनों का रुक जाना" 1826 के 'डाक सुविधा न मिलने' का ही आधुनिक संस्करण है।
आज भी यदि कोई अखबार, टीवी चैनल या डिजिटल मीडिया सत्ता के सुर में सुर नहीं मिलाता, तो उसकी आर्थिक रीढ़ (सरकारी विज्ञापन) तोड़ दी जाती है। 1826 में शुक्ल जी को पूंजीपति और पर्याप्त ग्राहक नहीं मिले थे, इसलिए वे सरकारी रियायत पर निर्भर थे। आज 2026 में मीडिया खुद एक महाउद्योग बन चुका है, लेकिन उसकी आत्मा आज भी 'सरकार' रूपी सत्ता के विज्ञापनों के आगे बंधक है।
कड़वा सच तो यह है कि उस समय पत्रकारिता एक 'मिशन' थी, जिसे आर्थिक संकट के कारण दम तोड़ना पड़ा। जबकि आज पत्रकारिता एक 'उद्योग' है, जो वित्तीय मुनाफे के लिए सत्ता के साथ अपनी चेतना और जनहित का सौदा करने को मजबूर है।
'हित के हेत' बनाम डिजिटल युग का 'यूजर'
200 साल की इस यात्रा में माध्यम बदल गए हैं। ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ के समय पाठक एक 'नागरिक' था, जिसे जगाना था। आज डिजिटल, सोशल मीडिया और एआई (AI) के युग में पाठक को केवल एक 'यूजर' या 'उपभोक्ता' बना दिया गया है। खबरें अब 'कंटेंट' हो गई हैं।
भाषा का नया संकट: 1826 में हिंदी को अभिव्यक्ति का 'अवसर' नहीं मिल रहा था। आज हिंदी को असीमित अवसर उपलब्ध हैं, लेकिन उसकी गरिमा और विश्वसनीयता दांव पर है। सनसनीखेज हेडलाइंस के चक्कर में भाषा को हर दिन लहूलुहान किया जा रहा है।
सत्यापन की चुनौती: शुक्ल जी के समय चुनौती थी लोगों तक सूचना पहुंचाना। आज समस्या सूचना की कमी नहीं, सूचना का महाविस्फोट है। आज चुनौती मोबाइल स्क्रीन पर तैर रहे झूठ, प्रोपेगैंडा और डीपफेक के महासागर में से 'सत्य' को छानकर बाहर निकालना है।
‘उदन्त मार्त्तण्ड’ की प्रथम उद्घोषणा को पढ़ते समय हमें केवल इतिहास नहीं दिखाई देता, बल्कि वर्तमान पत्रकारिता का दर्पण भी दिखाई देता है। वह हमें "गवरनर जेनेरेल बहादुर की आयस से" पत्रकारिता की ऐतिहासिक विवशताओं की याद दिलाता है, जबकि "हिंदुस्तानियों के हित के हेत" हमें उसके शाश्वत उद्देश्य का स्मरण कराते हैं।
पंडित युगल किशोर शुक्ल ने व्यवस्था की सीमाओं को स्वीकार किया था, लेकिन अपने मूल उद्देश्य से समझौता नहीं किया। जब समझौता अनिवार्य होने लगा, तो उन्होंने स्वाभिमान के साथ अखबार बंद कर दिया। आज दो सदियों के बाद भारतीय पत्रकारिता का सबसे बड़ा सवाल वही है कि क्या मीडिया सचमुच जनता के हित के लिए काम कर रहा है? और क्या वह अपने स्वाभिमान की खातिर कोई भी समझौता न करने जैसा कठोर निर्णय लेने की स्थिति में है?
तकनीक बदल गई है, कागज से स्क्रीन तक का सफर तय हो चुका है, लेकिन बुनियादी चुनौती वहीं खड़ी है। यदि आज का मीडिया सत्ता की 'आयस' (कृपा और विज्ञापनों) के बिना सांस लेने से डरता है, तो तकनीकी रूप से हम भले ही 21वीं सदी में हों, मानसिक रूप से हम आज भी 1826 के औपनिवेशिक दबाव में ही जी रहे हैं। जब तक मीडिया वित्तीय रूप से केवल सरकारी विज्ञापनों पर आश्रित रहेगा और जनता उसके स्वाभिमान को बचाए रखने के लिए उसे व्यापक संरक्षण नहीं देगी, तब तक पत्रकारिता की आत्मा सत्ता की चौखट पर ऐसे ही माथा टेकने को मजबूर रहेगी।