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एक जहरीली कविता...!

राकेश अचल

नागिन सेंक रही है धूप जरा ठहरो

दमक रहा है उसका रूप जरा ठहरो*घर से निकली है अक्षत यौवन लेकर

प्रिय के लिए, साथ में कोरा मन लेकर

मौसम है उसके अनुरूप, जरा ठहरो

नागिन सेंक रही है धूप, जरा ठहरो*डस लेगी यदि बिफर गई ये विष कन्या

है स्वभाव से अल्हड़ वैसे ये वन्या

हैं आसक्त हजारों भूप, जरा ठहरो

नागिन सेंक रही है धूप, जरा ठहरो*इतराती, बल खाती जब ये चलती है

देख इसे हिरणों की छाती जलती है

चढ़ जाती है हर स्तूप, जरा ठहरो

नागिन सेंक रही है धूप, जरा ठहरो*प्रिय से मिलकर बेसुध होकर झूमेगी

विष उड़ेल देगी, अधरों को चूमेगी

विचलित होंगे वापी, कूप जरा ठहरो

नागिन सेंक रही है धूप, जरा ठहरो*नागिन सेंक रही है धूप, जरा ठहरो...