गिरीश उपाध्‍याय

आज से साल भर पहले ठीक यही दिन थे जब देश हवाओं में कोरोना के आने की आहट सुन रहा था। वह आहट धीरे-धीरे गड़गड़ाहट में बदली और फिर ऐसा तूफान आया कि सब कुछ तहस-नहस कर गया। इस एक साल में हमने जन और धन दोनों को खोया और इनके अलावा भी पता नहीं क्‍या-क्‍या खो दिया। पर ऐसा लगता है कि इतना सब कुछ खो देने और शरीर से लेकर आत्‍मा तक इतने गहरे घाव बना लेने के बाद भी हमने वह सबक नहीं सीख जो हमें सीख लेना चाहिए था।

कोरोना के महासंकट से उबर रहे भारत पर साल भार बाद एक बार फिर वही खतरा मंडराता दिख रहा है। हमारे सबक न सीखने की आत्‍मघाती लापरवाही ने कोरोना को एक बार फिर सिर उठाने का मौका दे दिया है। कई राज्‍यों में एक बार फिर वैसे ही हालात बनने लगे हैं जो सरकारों और प्रशासन को लॉकडाउन जैसे कदम उठाने पर मजबूर कर सकते हैं। और यह सब इस बार चुपचाप नहीं हुआ है।

हम इतने नादान नहीं है कि पिछले एक साल में हमने इस महामारी को लेकर जो कुछ देखा, सुना और भोगा है उसे जानते समझते न हों। हम सबकुछ जान कर भी वे ही गलतियां कर रहे हैं जो हमने कोरोना का पहला हमला होते समय की थीं। लेकिन इस बार ये गलतियां नहीं बल्कि अपराध है। पहले तो हमने सरकार को दोषी ठहरा दिया था कि उसने समय पर लोगों को जाग्रत नहीं किया, उसने समय रहते समुचित कदम नहीं उठाए, उसने ठीक समय पर माकूल व्‍यवस्‍थाएं नहीं कीं…

लेकिन इस बार? इस बार तो हमें सबकुछ मालूम है। स्‍वीकार भले ही न करें, लेकिन हम जानते हैं कि कोरोना के संक्रमण से बचाव ही उसका सबसे बड़ा इलाज है। यह अच्‍छी बात है कि इस एक साल में हमने कोरोना का स्‍वदेशी टीका विकसित कर लिया है और वह लोगों को लगना भी शुरू हो गया है। लेकिन इसके बावजूद यह महामारी मांग करती है कि हम बचाव के साधनों और उपायों का त्‍याग न करें। खुद को शूरवीर या अजर-अमर मानने जैसी मूर्खता न करते हुए इस बीमारी से डरें।

और यह डरना भी वैसा नहीं है जैसा सामान्‍य अर्थों में लिया जाता है। निडर होना अच्‍छी बात है लेकिन जब यह पता हो कि आग में हाथ डालने से हाथ जल जाता है तो फिर उसमें हाथ डालने से डरना या बचना ही चाहिए। कोरोना के मामले में भी ऐसा ही है। भले ही हमने सामान्‍य जिंदगी की तरफ कदम बढ़ा दिया हो, भले ही हमारे पास कोरोना का टीका आ गया हो, लेकिन यह वो आग है जिससे लिपटने की गलती हमें जलाकर राख कर सकती है। व्‍यक्तिगत रूप से भी और एक राष्‍ट्र की दृष्टि से सामूहिक रूप से भी।

इतने बड़े संकट के बाद देश यदि फिर से खड़ा हो रहा है तो यह हमारी जीजिविषा और इच्‍छाशक्ति का ही परिणाम है। आत्‍मविश्‍वासी होना अच्‍छी बात है, लेकिन अति-आत्‍विश्‍वासी होना आत्‍मघाती होता है। ऐसा लगता है कि कोरोना के मामले में हम अति-आत्‍मविश्‍वासी हो रहे हैं। शायद हम यह मान बैठे हैं कि कोरोना हार गया है। जबकि ऐसा नहीं है। अभी कोरोना को हराने और आगे चलकर उसे खत्‍म करने की दिशा में बढ़ने का बहुत लंबा सफर बाकी है।

इसलिए जरूरी है कि हम उन सावधानियों और एहतियाती उपायों को बिलकुल न त्‍यागें जो हमें इस बीमारी का शिकार होने से बचा सकते हैं। और इस काम में व्‍यक्ति की, समाज की और सरकार की, सभी की समान भागीदारी जरूरी है। इसमें भी उदाहरण उन लोगों को प्रस्‍तुत करना होगा जिनकी ओर संकट के समय समाज देखता है। व्‍यक्ति यदि यह पाता है कि उस पर तो हर बंदिश सख्‍ती से लागू हो रही है और राजनीतिक या अन्‍य रसूखदार लोगों के व्‍यक्तिगत अथवा सामूहिक आयोजनों में सारी बंदिशों की खुलेआम धज्जियां उड़ती हैं तो वह भी ऐसी बंदिशों की परवाह न करने पर आमादा होने लगता है।

हमें याद रखना होगा कि कोई भी बीमारी किसी की सगी नहीं होती और न ही कोई दावे के साथ यह कह सकता है कि उसे तो यह बीमारी लग ही नहीं सकती। ऐसे समय में जब कोरोना की दूसरी लहर आने की आशंका बन रही हो और लोगों से फिर से एहतियाती उपाय सख्‍ती से अमल में लाने को कहा जा रहा हो वहां शीर्ष स्‍तर पर बैठे लोगों या जन प्रतिनिधियों के ऐसे कुतर्क अच्‍छा संदेश नहीं देते कि वे तो फलां पूजा पाठ करते हैं, फलां उपासना पद्धति को मानते हैं इसलिए उन्‍हें कुछ नहीं होने वाला या कि मैं तो ये घरेलू उपाय कर लेता हूं इसलिए मुझे कोई एहतियात बरतने की जरूरत नहीं है।

याद रखना होगा कि ऐसे ही मुगालतों और ऐसी ही गैर जिम्‍मेदाराना हरकतों ने पहले भी कोरोना को तेजी से फैलने का मौका दिया था और अब भी वैसा ही हो रहा है। दुर्घटनाओं को रोकने के लिए सड़कों पर हमने अकसर एक बोर्ड लगा देखा है जिस पर लिखा होता है- ‘’सावधानी हटी, दुर्घटना घटी।‘’ कोरोना के मामले में यह बात सौ फीसदी लागू होती है। बल्कि यहां तो सावधानी हटने पर दुर्घटना नहीं बल्कि महादुर्घटना की आशंका है। क्‍या हम छोटी मोटी सावधानियों को नजरअंदाज कर फिर से किसी महादुर्घटना को न्‍योता देने जा रहे हैं?