राजेश जैन

भारत का पड़ोसी देश म्यांमार यानी बर्मा एक दशक के लोकतंत्र के बाद फिर सेना के शिकंजे में है। तख्तापलट के कारण वहां लोकतंत्र के लिए संघर्ष करीब 15 वर्ष पीछे पहुंच गया है। सैन्य तख्तापलट से भारत की परेशानियां भी बढ़ गई हैं। भारत को एक ओर लोकतंत्र का समर्थन करना है, वहीं अपने सुरक्षा हितों का ध्यान भी रखना है।

इसलिए हुआ तख्तापलट
पिछले साल नवंबर में म्यांमार में आम चुनाव हुए थे। इनमें आंग सान सूकी की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) ने दोनों सदनों में 396 सीटें जीती थी। दूसरी ओर मुख्य विपक्षी यूनियन सॉलिडैरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी को मात्र 33 सीटें ही मिली थी। इस पार्टी के नेता थान हिते सेना में ब्रिगेडियर जनरल रह चुके हैं और उनको सेना का समर्थन हासिल है।

सेना सूकी को मिले प्रचंड बहुमत से असुरक्षित महसूस कर ही रही थी। उसको लगा कि वे संविधान बदल देंगी और फौज निस्तेज हो जाएगी। सेना की आशंका इसलिए भी बढ़ी कि सू की सेना को साइडलाइन कर चीन के साथ संबंध बढ़ा रही थी। इसके अलावा सू की ने रोहिंग्या मुसलमानों की पिटाई का समर्थन कर देश में अपने आपको फौज से भी शक्तिशाली बना लिया था। म्यांमार के वर्तमान सेनापति मिन आंग एलैंग तीन माह में सेवानिवृत्त होने वाले थे। वे स्वयं राष्ट्रपति बनना चाहते हैं। यह लक्ष्य चुनाव से नहीं, तख्तापलट से ही पूरा हो सकता था।

शुरू से रहा सेना का दबदबा
म्यांमार में सेना को कई विशेषाधिकार मिले हुए हैं। मसलन, सेना के लिये संसद की एक-चौथाई सीटें आरक्षित हैं। सेना प्रमुख के पास वीटो पावर है। वह कमांडर-इन-चीफ़ होने के नाते महत्वपूर्ण- रक्षा, सीमा, गृह मंत्रालयों के मंत्रियों की नियुक्ति कर सकते हैं। दूसरी ओर सू की के हाथ में केवल नागरिक प्रशासन में कानून बनाने की शक्ति थी।

मामले को समझने के लिए हमें थोड़ा वहां के इतिहास में जाना होगा। 1948 में ब्रिटिश राज से आजादी के बाद से 1962 तक म्‍यांमार में लोकतांत्रिक सरकारें रही। लेकिन इसके बाद जनरल ने विन के नेतृत्व में सेना ने तख्ता पलट कर सत्ता कब्जा ली। 1988 तक म्यांमार में वन पार्टी सिस्टम था। सेना के जनरल बारी-बारी से सत्ता प्रमुख बनते रहे।

सेना के समर्थन वाली बर्मा सोशलिस्ट प्रोग्राम पार्टी को पहली बार 1988 में चुनौती दी गई। म्यांमार को आजादी दिलाने वाले जनरल आंग सानकी की बेटी आंग सान सूकी ने सेना की तानाशाही से आजादी दिलाने के लिए लोकतंत्र की लड़ाई शुरू की। 1989 में उनके नेतृत्व में हजारों लोग लोकतंत्र की मांग करते हुए तब की राजधानी यांगून की सड़कों पर उतर गए, लेकिन सेना की ताकत के आगे सूकी का आंदोलन कमजोर पड़ गया। उन्हें नजरबंद कर दिया गया। सेना के अधिकारी सॉ मांग ने सत्ता हथिया ली। 1989 से 2010 तक लगभग 21 साल सू की नजरबंद रहीं और म्यांमार में 22 साल तक सेना का ही शासन रहा।

ऐसे जीती थी लोकतंत्र की लड़ाई
1991 में नजरबंदी के दौरान ही सू की को नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। दुनिया भर में मानवाधिकारों के लिए लडऩे वाली लीडर के रूप में सूकी की पहचान से सेना कुछ नरम पड़ी। आखिरकार पचास साल बाद 2011 में उनकी लड़ाई खत्म हुई और सेना की जगह चुनी गई सरकार ने देश की बागडोर संभाली और लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ता आंग सान सू की देश की नागरिक नेता बन गईं। इसके बावजूद देश की सत्ता पर सेना का ही नियंत्रण रहा।

पहले ही पर कतर दिए थे
सेना ने 2008 में म्यांमार का संविधान बनाया और उसमें तीन ऐसे प्रावधान कर दिए कि कोई कितनी ही लोकप्रिय सरकार बन जाए, लेकिन सेना की बैसाखी के बिना नहीं चल सके। फौज को पता था कि सू की लोकप्रिय नेता हैं। यदि उनको लंबी नजरबंदी के बाद रिहा किया गया, तो वे चुनावों में जीतकर सरकार बना लेंगी और सेना समर्थकों का सूपड़ा साफ  हो जाएगा। इसीलिए उन्होंने संविधान में ऐसा प्रावधान कर दिया कि सू की प्रधानमंत्री ही न बन सकें। संविधान में दूसरा प्रावधान यह था कि संसद के 25 फीसदी सदस्य सेना द्वारा नामजद होंगे ताकि कोई सत्तारुढ़ पार्टी सेना की मर्जी के बिना संविधान संशोधन न कर सके। तीसरा प्रावधान यह था कि गृह, रक्षा और सीमा ये तीन मंत्रालय सेना के पास रहेंगे।

इसके बाद वही हुआ जो सेना चाहती थी। सू की के पति ब्रिटिश थे। विदेशी पति, पत्नी या बच्चे वाला व्यक्ति सर्वोच्च पद पर नहीं बैठ सकता, इस प्रावधान के कारण नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी के चुनाव जीतने के बावजूद सूकी राष्ट्रपति नहीं बन सकीं। इसलिए सूकी को स्टेट काउंसलर बनाया गया। संविधान के तहत सुरक्षा से जुड़े सभी मंत्रालयों पर सेना का नियंत्रण है। संविधान के तहत संसद की 25 फीसदी सीटें सेना के लिए आरक्षित हैं। उसे म्यांमार सरकार द्वारा संविधान में किसी बदलाव पर वीटो लगाने का अधिकार है।

दूसरी ओर सेना के इस कड़े शिकंजे के बावजूद 2015 के चुनाव में सू की की पार्टी एनएलडी ने बहुमत की सरकार बना ली। अब नवंबर 2020 के चुनाव में भी उसने 440 में से 315 सीटें जीत लीं। सेना की पिट्ठू पार्टी यूनियन सॉलिडेरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी हाथ मलती रह गई। एक फरवरी 2021 को यह नई संसद शपथ लेने वाली थी, लेकिन सुबह-सुबह सेना ने तख्तापलट कर दिया और एक साल के लिए सरकार अपने हाथ में लेने की घोषणा कर दी। उसने आरोप लगाया है कि गत चुनाव में धांधली हुई है। कमजोर अर्थव्यवस्था और रोहिंग्या मुस्लिमों का मामला न संभाल पाने का ठीकरा भी सरकार के माथे फोड़ा गया।

भारत पर क्या असर पड़ेगा
म्‍यांमार सेना और चीन में लंबे समय से गहरी सांठ-गांठ चल रही है। उसके चीन के साथ करीबी संबंध हैं। चीन म्यांमार का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है और सबसे ज्यादा विदेशी सहायता देता है। सेना के शासन से चीन म्यांमार के साथ और करीबी बढ़ा सकता है। चूंकि भारत एक लोकतांत्रिक देश है इसलिए म्यांमार में तख्तापलट के बाद चिंता हमने जताई है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि हमने म्यांमार में हुए घटनाक्रम का संज्ञान लिया है। भारत म्यांमार में हमेशा से लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता हस्तांतरण के पक्ष में रहा है। हमारा मानना है कि कानून का शासन और लोकतांत्रिक प्रक्रिया कायम रहनी चाहिए।

भारत के अलावा संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय राष्ट्रों और अमेरिका समेत अन्य देशों ने भी म्‍यांमार में लोकतंत्र बहाल करने को कहा है। दूसरी ओर चीन ने म्यांमार के संविधान का हवाला देते हुए इसे म्यांमार का आंतरिक मामला बताकर अंदर ही अंदर सुलझाने की बात कही है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इस मामले में निंदा प्रस्ताव पर परिषद के 5 स्थायी सदस्यों में शामिल चीन ने इसके खिलाफ अपनी वीटो ताकत का इस्तेमाल कर अड़ंगा लगा दिया। उधर, संयुक्त राष्ट्र ने चिंता जताई है कि देश में अभी भी 6 लाख रोहिंग्या हैं। कहीं सेना उनका दमन शुरू न कर दे।

बहरहाल,  चुनाव में धांधली के सेना के आरोप को म्यांमार चुनाव आयोग ने सिरे से रद्द कर दिया है। तख्तापलट के खिलाफ लोगों में आक्रोश है। सबसे बड़े शहर यांगून में लोग घरों पर लाल झंडे-झंडी, रिबन, लाल गुब्बारे आदि लगाकर और खुद लाल कपड़े पहनकर सूकी के प्रति समर्थन जता रहे हैं। गांधीवादी सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हो गया है। शिक्षकों और छात्रों ने बड़ी रैली कर अपदस्थ नेता आंग सान सूकी के प्रति समर्थन का इजहार किया। सूकी की को देश के डॉक्टरों और सरकारी अधिकारियों के बड़े वर्ग का भी समर्थन मिला है।

विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए सेना ने फेसबुक पर रोका तो हजारों लोगों ने इसकी काट के तौर पर खुद को ट्विटर पर शिफ्ट कर लिया है। सेना ने एक साल की इमरजेंसी के बाद फिर लोकतंत्र बहाल करने का भरोसा दिलाया है, लेकिन वह इतनी आसानी से पकड़ ढीली करती नहीं लगती। सेना ने कहा कि पिछले साल नवम्बर में हुए चुनाव की समीक्षा की जाएगी और चुनाव आयोग में सुधार किया जाएगा।
(लेखक एजुकेशन पोर्टल careerguidance4u.com के संपादक हैं।)