टीआरपी का खेल और इंटरव्यू लेने की कला

रमेश रंजन त्रिपाठी

‘इंटरव्यू ले लो, मजेदार इंटरव्यू!’ गली में एक फेरीवाला सिर पर टोकरी रखे आवाज लगाता हुआ घूम रहा था।

मुझे अजीब लगा, मैं बाहर आ गया- ‘तुम्हारे इंटरव्यू में क्या खास बात है?’ मैंने उसे रोककर पूछा।                  फेरीवाले ने अपनी टोकरी उतारकर मेरे सामने रख दी- ‘आप मेरा इंटरव्यू लेकर देखिए। इसका आनंद ही अलग है। इसमें मिठास और कड़ुएपन का अद्भुत मिश्रण है जिसे तीखेपन का फ्लेवर डालकर नफरत से बघारा गया है। आप इसके स्वाद के दीवाने हो जाएंगे। आपके कान इसे सुनते हुए नहीं अघाएंगे, देखते हुए आंखें तृप्त नहीं होंगी।’

‘दूसरे फेरीवाले भी ऐसा ही दावा करते हैं।’ मैं उसके मजे लेने लगा।

‘मेरा इंटरव्यू एक्सक्लूजिव है।’ फेरीवाला बोला।

‘मैं एक आम दर्शक हूं, मैं इंटरव्यू कैसे ले सकता हूं?’ मैंने टालना चाहा।

‘जब एक अभिनेता देश के शीर्ष नेता का इंटरव्यू ले सकता है तो आम नागरिक किसी का इंटरव्यू क्यों नहीं ले सकता?’ फेरीवाले के चेहरे पर मुस्कुराहट उभर आई।

‘सामान्य दर्शक के बारे में तुम्हें कितनी जानकारी है?’ मैंने पूछा।

‘मेरे पास टीआरपी का प्रतिदिन का पूरा विश्लेषण है।’ फेरीवाला बताने लगा- ‘आम दर्शक की रुचि का पूरा कच्चा चिट्ठा है मेरे पास।’

मैं थोड़ा असहज होने लगा, पता नहीं मैं फेरीवाले के मजे ले रहा था या वह मेरे? तभी गली में एक आवाज और गूंजी- ‘इंटरव्यू दे दो बाबा। एक इंटरव्यू का सवाल है। तुम एक इंटरव्यू दोगे, भगवान तुम्हें एक से बढ़कर एक बढ़िया कार्यक्रमों से नवाजेगा।’

याचक के गेट-अप में एक व्यक्ति अपनी टीम के साथ घूम रहा था। इशारा पाकर वह झट से मेरे पास पहुंच गया। मेरे सामने दो लोग थे, एक जो इंटरव्यू देना चाहता था, दूसरा जो इंटरव्यू लेना चाहता था। मैं उनकी ओर मुखातिब हुआ- ‘आप दोनों एक-दूसरे की इच्छापूर्ति करें और मुझे छुट्टी दें।’

‘यह कैसे संभव है?’ उनके मुख से निकला- ‘यह सारा प्रपंच तो आपकी जानकारी की भूख मिटाने के लिए है। आपको इसे चखना पड़ेगा, इसकी प्रशंसा के साथ अपनी जेब ढीली करनी पड़ेगी।’

‘जो स्वयं मेरे सामने कुछ प्राप्त करने की कामना से खड़े हैं वे मुझे भला क्या दे सकते हैं?’ मैंने पूछा।

‘हम आपके मन को प्रसन्नता दे सकते हैं।’ वे बोले।

‘तुम्हें मेरे आनंद के बारे में क्या जानकारी है?’ मैंने उत्सुकता दिखाई।

‘धर्म, हिंसा और लम्पटता सबसे अधिक बिकती है।’ वे बोले- ‘जो बिकती है वही पसंद मानी जाती और वही बनाई जाती है। आप भी इससे अछूते तो हैं नहीं।!’

मुझे नासमझों की भांति अपनी ओर ताकता पाकर फेरीवाला कहने लगा- ‘सामाजिकता, सियासत, साहित्य या सिनेमा, इन तीनों की पूछ-परख कहां नहीं है? इन दिनों टीवी में सबसे ज्यादा क्या दिखाया जा रहा है? राजनीति का केंद्र बिंदु क्या है? विश्लेषण करें। आपको जवाब मिल जाएगा।’

‘आप अपने माल की खपत के लिए मेरी प्रशंसा कर रहे हैं या टांग खिंचाई?’ मुझे अपने ऊपर की गई टिप्पणी अच्छी नहीं लगी इसलिए मैंने पलटवार किया- ‘क्या आप अपने दायित्वों का निर्वहन भलीभांति कर रहे हैं?’

‘हम तो नौकर हैं, मालिक का हुकुम बजा रहे हैं।’ वे हंसे- ‘आप तो खुदमुख्तार हैं, फिर हमें बढ़ावा क्यों दे रहे हैं? आपको हमारी जिन बातों में मजा आएगा हम वही बातें करेंगे न? हमारी आलोचना से पहले अपने गिरेबान में भी झांकें हुजूर!’

उन्हें अपने गिरेबान तक पहुंचता देख मुझे और बुरा लगा। समझ में नहीं आ रहा था कि उनकी बातों को कैसे नकारूं? मुझे एक उपाय सूझा कि इंटरव्यू देनेवाले से एक इंटरव्यू लेकर उसे इंटरव्यू के याचक को दे दूं। लेकिन यह भी लगा कि ऐसा करने से मेरी अपनी सोच का क्या महत्व रह जाएगा? यह दोनों तो एक ही थैली के चट्टे-बट्टे लग रहे हैं। इनका मकसद ही घुमाफिराकर मुझसे अपनी बात का समर्थन कराना है। मैं इनके जाल में फंसता जा रहा हूं।

मैं समझ गया कि मुझे अपने विवेक और अपनी आवाज की सहायता लेनी होगी। मैं अंदर से उन्हें बुलाकर लाया तो देखा कि इंटरव्यू लेने और देनेवाले दोनों गायब हो चुके थे।

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