अरुण कुमार त्रिपाठी

रामचरित मानस में अपनी शरण में आए विभीषण से राम कहते हैं- समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं।। अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयं बसइ धनु जैसे।। इससे पहले वे यह भी कहते हैं कि जो मद, मोह, कपट, छल को त्याग दे उसे मैं साधु के समान कर देता हूं।

अयोध्या में आगामी पांच अगस्त को प्रधानमंत्री की संभावित उपस्थिति में भव्य राम मंदिर निर्माण के लिए होने जा रहे भूमि पूजन के मौके पर राम के हृदय के इस भाव का स्मरण विशेष महत्त्व रखता है। यह पंक्तियां बताती हैं कि राम को कैसे मनुष्य प्रिय थे। या यूं कहें कि वे कैसा मनुष्य बनाना चाहते थे।

अपने भक्तों से राम का यह आग्रह आज के लोकतांत्रिक देश के लिए ज्यादा प्रासंगिक है। लोकतांत्रिक मनुष्य और उसका नेतृत्व समदर्शी ही होना चाहिए। अगर लोकतांत्रिक मनुष्य मद, मोह, कपट और छल से भरा होगा तो उसे राम के हृदय में स्थान नहीं मिलेगा और राम उसे साधुता प्रदान नहीं करने वाले हैं। न ही लोकतांत्रिक व्यवस्था सुचारु रूप से चल पाएगी। फिर वह रामराज्य भी रावण राज्य से बदतर होगा।

पिछले साल जब 9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद पर अपना निर्णय सुनाया तो विधिशास्त्रीय नजरिए से उसकी आलोचना भी हुई। वह होनी भी चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र ऐसा अधिकार देता भी है। लेकिन एक बात निश्चित रूप कही जा सकती है कि इससे देश के हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों ने राहत की सांस ली। न्याय मिला हो या न मिला हो लेकिन उस फैसले ने लोकतांत्रिक व्यवस्था की लाज रख ली।

इसीलिए अगर कुछ लोग राममंदिर विवाद के निपटारे का श्रेय किसी एक संगठन और व्यक्ति को देने की बजाय न्यायपालिका जैसी लोकतांत्रिक संस्था को देते हैं तो वह गलत नहीं है। राम मंदिर भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने दावा किया है कि मंदिर निर्माण में सरकारी धन भी नहीं लगेगा। क्योंकि मंदिर समाज का है और इसके लिए जनता से सहयोग लिया जाएगा जो सेक्यूलर देश के लिए अच्छी बात है। यह बात अलग है कि ट्रस्ट मंदिर के परिक्षेत्र का विस्तार चाहता है।

सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर के लिए 67 एकड़ जमीन दी थी और ट्रस्ट उसके अलावा आसपास के निवासियों से 41 एकड़ का दान मांग रहा है। इस तरह मंदिर का दायरा 108 एकड़ में होगा और अब उसकी ऊंचाई 121 फुट की बजाय 161 फुट होगी। साथ ही मंदिर के गुंबदों की संख्या पांच होगी। अदालत ने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी को जिले में ही कहीं पांच एकड़ जमीन लेने की पेशकश की थी और अच्छी बात यह है कि आरंभिक ना नुकुर के बाद अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों ने उसे स्वीकार कर लिया है।

मंदिर निर्माण से जुड़े सारे विवाद अब इतिहास बन चुके हैं और अब उसके रास्ते में किसी प्रकार की अड़चन नहीं है। उस पर शरद पवार और उमा भारती के बीच जो भी छोटी मोटी नोंक झोंक हो रही है वह भी बेमतब है। शरद पवार की यह टिप्पणी कि कुछ लोग सोचते हैं कि मंदिर बनाने से महामारी दूर हो जाएगी अप्रासंगिक है। निश्चित तौर पर महामारी से लड़ने के लिए समाज को अलग लड़ाई लड़नी होगी और मंदिर निर्माण के लिए दूसरे किस्म की तैयारी की जानी है।

सिर्फ भूमि पूजन के बहाने भारी भीड़ होगी यह अनुमान लगाना भी निरर्थक है। अगर प्रधानमंत्री और कुछ अतिविशिष्ट जनों के अलावा ज्यादा लोगों को अनुमति न दी जाए तो किसी संक्रमण का डर भी नहीं रहेगा। वैसे भी अभी महामारी के डर के नाते अयोध्या के हनुमानगढ़ी जैसे प्रसिद्ध मंदिर में इक्का दुक्का लोग ही पहुंच रहे हैं। इस दौरान वहां के मार्गदर्शकों (गाइड) की दशा देखते ही बनती है। वे कोई भी बाहर के नंबर की गाड़ी देखकर टूट पड़ते हैं और जब पता चलता है कि यह तो स्थानीय व्यक्ति ही है तो निराश होकर मुंह लटका लेते हैं।

संयोग से भारत में राम मंदिर का निर्माण ऐसे समय में शुरू होने जा रहा है जब तुर्की में हागिया सोफिया संग्रहालय को सोफिया मस्जिद घोषित करके वहां राष्ट्रपति तैयब एर्दोगन नमाज अदा करने जा रहे हैं। इस मस्जिद का इतिहास 1500 साल पहले के एक गिरिजाघर से जुड़ता है। उसे 1453 में उस्मानी शासक महमूद द्वितीय ने मस्जिद घोषित किया और 1924 में कमाल अता तुर्क ने जब देश को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाया तो इसे संग्रहालय बना दिया। पिछले दिनों तुर्की के सुप्रीम कोर्ट ने उसे मस्जिद घोषित कर दिया।

संयोग से इन दिनों तुर्की में इस्लामी कट्टरता का जोर है। ध्यान देने की बात है कि भारत में तुर्की के खलीफा के शासन को बहाल करने के लिए ही मौलाना शौकत अली, मौलाना अली जौहर और हकीम अजमल खान ने महात्मा गांधी की मदद से खिलाफत आंदोलन चलाया था जो बाद में वापस ले लिया गया। यह स्थितियां अतीत में हुए धार्मिक समुदायों के संघर्ष यानी जेहाद और क्रूसेड व धर्मयुद्ध की याद दिलाती हैं। उन्हीं को आज सभ्यताओं के संघर्ष का रूप दिया जा रहा है।

इतिहास की इस उलट पुलट में भारत और तुर्की में कुछ समानताएं हैं लेकिन उससे ज्यादा भिन्नताएं हैं। भारत में अल्पसंख्यक आबादी तुर्की के मुकाबले कहीं ज्यादा है। भारत की परंपरा भी मध्यएशिया के देशों के मुकाबले ज्यादा उदार और विविधता भरी रही है। इसमें कोई दो राय नहीं कि राममंदिर निर्माण के लिए विश्व हिंदू परिषद और भारतीय जनता पार्टी ने व्यापक आंदोलन चलाया और उसमें कट्टर और उदार दोनों तरह के लोग शामिल थे।

अच्छा होता उस विवाद का स्थानीय स्तर पर हल निकल आता, उस पर राष्ट्रीय विवाद न खड़ा होता, उसके लिए दंगे न होते और न ही बाबरी मस्जिद को गिराए जाने की स्थिति आती। इसके बावजूद भारत का लोकजीवन राम के राजनीतिक रूप से ज्यादा उनके सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप को स्वीकार करता है। इन्हीं राम की व्यापकता दक्षिण पूर्व एशिया के थाईलैंड, कंबोडिया, इंडोनेशिया, मलेशिया, म्यांमार जैसे देशों में है। उन देशों के नागरिकों का धर्म भले हिंदू नहीं है लेकिन राम उनकी संस्कृति के हिस्से हैं।

अच्छा होता हमारे प्रधानमंत्री अयोध्या में राम मंदिर के भूमि पूजन के साथ उन राम के आदर्शों को स्थापित करने का प्रयास करते जिनकी पूर्णता मर्यादित व्यक्तित्व में है। वे राम जो कृष्ण और शिव के साथ भारतीय पूर्णता के तीन महान स्वप्नों में एक हैं। वे राम जो त्रेता युग में तब अवतरित हुए जब धर्म का रूप बहुत नष्ट नहीं हुआ था। वे राम जो विनम्र हैं और पिता की आज्ञा मानकर वन चले जाते हैं और युद्ध भूमि में अंतिम सांसें ले रहे अपने सबसे बड़े शत्रु रावण से भी विनम्रतापूर्वक ज्ञान प्राप्त करने के लिए लक्ष्मण को भेजते हैं। वे राम जो अपने वनवास के दौरान निरंतर विजय प्राप्त करते हैं लेकिन किसी का राज्य नहीं हड़पते। समदर्शी राम और बिना हड़पे हुए फलने फूलने वाले राम प्राचीन संस्कृति ही नहीं आधुनिक लोकतंत्र के लिए भी आदर्श प्रस्तुत कर सकते हैं।

पिछली सदी के सबसे बड़े महामानव गांधी तो मंदिर जाते ही नहीं थे लेकिन उनके अंतिम शब्द `हे राम’ ही थे। वे राम में किसी प्रकार का युद्ध और हिंसा नहीं देखते थे बल्कि वे तो उन्हें सत्य के लिए संघर्ष करने वाला मर्यादापुरुषोत्तम मानते थे। क्योंकि उनके लिए रावण असत्य का प्रतीक था। अगर पुराने संघर्षों को भूलकर राम मंदिर निर्माण के साथ ऐसे उदार आदर्शों का आह्वान किया जाए तो हमारा लोकतंत्र बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय का रूप ले सकता है और राम के हृदय में बसने वाले समदर्शी मनुष्यों यानी नागरिकों की निर्मिति भी हो सकती है।