अवधेश शुक्‍ल

प्रदेश की एक लोकसभा एवं तीन विधानसभा सीटों के उपचुनाव में भाजपा ने यद्यपि तीन सीटें जीत कर अपना प्रभाव बरकरार रखा है, लेकिन सतना जिले की रैगांव सीट गंवा दी। रैगांव विधानसभा सीट पर भाजपा की हार इसलिए परेशान करने वाली है कि पिछले तीस वर्षो में पांच बार यहां से भाजपा प्रत्याशी ही जीते। वर्ष 1993 से भाजपा ने  अपनी जड़ें जमायी थीं और जुगुल किशोर बागरी पहली बार जीते थे। उसके बाद वर्ष 1998, 2003 और 2008 के विधानसभा चुनावों में वे बतौर भाजपा प्रत्याशी चुनाव जीते।

वर्ष 2013 में भाजपा ने उनके पुत्र को उम्मीदवार बनाया, जो चुनाव हार गए। लेकिन वर्ष 2018 में जुगुल किशोर बागरी पुन: भाजपा प्रत्याशी बने और जीते भी। उनके निधन से रिक्त हुई इस सीट पर हुए उपचुनाव में तीस साल बाद कांग्रेस की वापसी हुई है। तात्यपर्य यह कि भाजपा ने  सतना जिले की सबसे मजबूत सीट गंवा दी है। रैगांव के इस उपचुनाव में भाजपा की पराजय अप्रत्याशित नहीं कही जा सकती। भाजपा की जीत की संभावना पर पहला ग्रहण उसी दिन लग गया था जिस दिन पार्टी ने प्रत्याशी घोषित किया था।

रैगांव क्षेत्र की जनता के अलावा भाजपा कार्यकर्ता भी आश्चर्यचकित थे कि पार्टी नेतृत्व भला ऐसा निर्णय कैसे ले सकता है। लेकिन निर्णय तो हो ही चुका था और यह निर्णय जिला संगठन की सहमति के बिना भी नहीं हुआ होगा। उस निर्णय का नतीजा आज सामने है। भाजपा ने सिर्फ अपनी सीट नहीं गंवाई बल्कि 25 साल के विश्वास और भरोसे को भी खो दिया। चुनाव से पूर्व टिकट के लिए स्वर्गीय विधायक के दोनों पुत्रों के बीच राजनीतिक विरासत संभालने के लिए घमासान था। भाजपा ने परिवारवाद से मुक्त रहने का प्रयास तो किया लेकिन बाद में अपने प्रत्याशी को स्व. विधायक की नातिन बताकर वोट मांगने पड़े। यह प्रयोग भी जनता को जमा नहीं।

विकास के मामले में तो रैगांव क्षेत्र अभी भी कोसों दूर है। सड़क, बिजली, पानी, अस्पताल, स्कूल-कालेज सभी की दरकार है। इसीलिए इस उपचुनाव में प्रचार करने वाले भाजपा नेताओं एवं कार्यकर्ताओं को जनता की खरी-खरी भी सुनना पड़ी। चुनाव जीतने के लिए भाजपा भी गंभीर नहीं थी। वह पुराने आंकड़ों में ही जोड़ घटा कर जीत सुनिश्चित करके चल रही थी। इसीलिए भाजपा के उन स्थानीय नेताओं की भी पूछ परख नहीं की गई जिनकी बदौलत इस चुनाव में भाजपा पुन: जीत सकती थी।

स्थानीय भाजपा नेताओं को घर का जोगी मान लिया गया और आन गांव वालों को सिद्ध मानकर उनसे प्रचार कराया गया। भाजपा की एक बड़ी ताकत मुंह ताकती रही कि उन्हें कब पूछा जाएगा। कईयों ने तो बिना बुलाए ही एक दो दिन प्रचार किया ताकि बता सकें कि वे भी पार्टी में हैं। वास्तव में इस चुनाव में जीतने से ज्यादा होड़ जिताने का श्रेय लेने के लिए लगी थी। इस वजह से अधिकतर स्थानीय नेताओं एवं कार्यकर्ताओं ने श्रेय लेने वालों पर ही सब कुछ छोड़ दिया।

चार में से एक भाजपा विधायक नारायण त्रिपाठी तो मनाने के बाद भी मंचों पर नहीं गए। बल्कि रैगांव निपटाने का फरमान तक जारी कर दिया। दो अन्य विधायक भी पूछ परख नहीं होने से ज्यादा सक्रिय नहीं रहे। एक विधायक जो राज्यमंत्री हैं उन्हें अवश्य जिम्मेदारी मिली थी, सो वे लगे रहे। मुख्यमंत्री की कई सभाएं और तमाम मंत्रियों के प्रचार के बावजूद यदि रैगांव सीट हासिल नहीं हुई तो उसकी मुख्य वजह प्रत्याशी चयन और स्थानीय नेताओं की उपेक्षा को ही माना जा रहा है। क्योंकि सिर्फ विकास मुद्दा होता तो स्व.जुगुल किशोर बागरी पांच बार विधायक नहीं बन पाते।

यद्यपि इस उप चुनाव में बसपा मैदान में नही थी इसलिए मुकाबला भाजपा-कांग्रेस के बीच था। कांग्रेस ने बसपा के वोट साध लिए और भाजपा जहां मजबूत थी वहां भी वह प्रदर्शन नहीं कर पाई जो करती आ रही थी। नाराजगी, भितरघात के बावजूद रैगांव में भाजपा की जीत की संभावना क्षीण नहीं थी। यदि पार्टी एकजुट होकर चुनाव मैदान में उतरती तो परिणाम कुछ अलग ही होता। मगर ऐसा हो नहीं सका। हुआ क्यों नहीं भाजपा को स्वयं ही इस पर विचार करना होगा।