अजय बोकिल

अर्थशास्त्रीय गुणा-भाग, कर बोझ और कर छूट जैसी रस्मी हलचल को अलग रखें तो जैसे-जैसे देश का संघीय बजट उम्रदराज होता जा रहा है, वैसे-वैसे वह रसहीन भी होता जा रहा है। देश की पहली  म‍‍हिला वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने अपना तीसरा बजट पेश करते समय सबसे लंबे बजट भाषण का अपना ही पुराना रिकॉर्ड तो नहीं तोड़ा, लेकिन पहली बार बजट के पेपरलैस प्रेजेंटेशन का रिकॉर्ड जरूर बनाया। यानी देश की दिशा और दशा तय करने वाला बजट भी हार्ड कॉपी से सॉफ्ट कॉपी पर आ गया है।

चीजें जैसे-जैसे एक्चुअल से वर्चुअल होती जाती हैं, अपना रूप, स्वाद और गंध भी खोती जाती हैं। यूनियन बजट के साथ भी पिछले सालों से यही हो रहा है। अब बजट को लेकर (चाहे वह राज्य का ही क्यों न हो) पहले जैसी उत्सुकता और बेताबी नहीं होती। न ही बजट प्रस्तुति की शुभ घड़ी पहले सी धड़कन बढ़ाती है कि न जाने किन-किन चीजों पर टैक्स लगेगा, क्या-क्या महंगा होगा, कुछ सस्ता भी होगा या नहीं? गरीब का जीना आसान होगा या और मुहाल होगा?

मध्यम वर्ग के उस ऊंची कॉलर वाले तबके के लिए यही वह क्षण होता था, जब उसे अपने इनकम टैक्स पेयी होने पर क्षणिक अभिमान होता था। आयकर में मिली छोटी सी छूट भी बांछें खिला देती थी। तब बाजार उठा या गिरा, इसकी चिंता कम ही लोगों को हुआ करती थी। बजट से अपनी जिंदगी को कितनी ऊर्जा मिली, इसकी चिंता ज्यादा होती थी।

यूं तो देश का बजट आजादी से पहले भी पेश होता था, लेकिन उसमें कोई जनभागीदारी न थी। स्वतंत्र भारत का पहला बजट देश के पहले वित्तमंत्री आर.के.शणमुगम् शेट्टी ने 26 नवंबर 1947 को पेश किया था। तब उनका कुल बजट 194 करोड़ रूपये का था। जिसमें 24.59 करोड़ का वित्तीय घाटा दर्शाया गया था। उसमें रक्षा के लिए 92.74 करोड़ रुपये रखे गए थे। संसद के अलावा उनके बजट भाषण का प्रसारण आकाशवाणी से भी हुआ था। तब से अब तक हालात बहुत बदल चुके हैं।

आजादी के 74 साल बाद केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने जो बजट पेश किया, उसका आकार 34 लाख 83 हजार 236 करोड़ रुपये का है। इसमें वित्तीय घाटा लगभग 2 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है तथा रक्षा के लिए 3 लाख 62 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान है। कहने को कह सकते हैं कि बजट का आकार तुलनात्मक रूप से बहुत कम हुआ तो क्या, उस जमाने में रुपये की कीमत आज से बहुत ज्यादा थी।

हकीकत यह है कि जैसे-जैसे बजट का आकार सुरसा की तरह बढ़ता गया है, उसका थ्रिल उसी अनुपात में घटता गया है। 1999 तक बजट फरवरी की आखिरी तारीख को शाम 5 बजे पेश हुआ करता था। लोग रेडियो से कान लगाए बैठ जाते थे। क्या महंगा और क्या सस्ता होने वाला है। अखबारों में बजट की खबरें तैयार करना और उसकी दूसरों से अलग प्रस्तुति की स्पर्द्धा एक उत्सव की तरह होती थी। कुछ हद तक आज भी होती है। लेकिन अब बहुत सी सूचनाएं बजट के समांतर चलती रहती हैं। उसमें ज्यादा कुछ नवेलापन नहीं बचता।

वैसे बजट शाम 5 बजे ही क्यों पेश होता था, इसका कोई ठोस तर्क नहीं था। शायद एक परंपरा थी, सो चल रही थी। 1999 में अटल सरकार में किसी ने सवाल उठाया कि जो काम सांझ के झुटपुटे में हो सकता है, वह दिन-दहाड़े क्यों नहीं हो सकता। फिर बजट दिन में 11 बजे पेश होने लगा। इससे अखबारों में बजट को लेकर मचने वाली मारामारी का एक बड़ा अध्याय खत्म हो गया। काम ज्यादा सुकून के साथ होने लगा। आम लोगों को भी जो बात अंधेरा घिरने के पहले पता चलती थी, वह सूरज सिर पर आने के पहले ही पता चलने लगी।

फिर भी वित्त मंत्री के ब्रीफ केस में छपे हुए बजट भाषण की गोपनीयता का थ्रिल बाकी था। 2016 में बजट भाषण के लिए फरवरी की आखिरी तारीख का इंतजार भी खत्म हुआ और वह इसी माह की पहली तारीख को पेश होने लगा। तर्क था कि चूंकि नया वित्तीय वर्ष 1 अप्रैल से लग जाता है, इसलिए उसकी पूर्व तैयारी पहले से हो जानी चाहिए।

बजट की तकनीकी क्रांति के साथ कदमताल ने वो भी छीन लिया। इस बार वित्त मंत्री ने टैबलेट पर बजट भाषण पढ़ा। लोगों ने टीवी चैनलों पर देखा, सुना। ज्यादातर लोग पूरा बजट भाषण नहीं सुनते। अपने मतलब की बात सुनकर चैनल बदल देते हैं। क्योंकि उन्हें पता होता है कि हर बजट हरेक सरकार की आर्थिक आयोजना के साथ-साथ आत्ममुग्धता की गाथा भी होता है, जिसका वार्षिक गायन लोकतंत्र के मंदिर में होता है। हर सरकार मानकर चलती है कि वह जो सोच रही है, कर रही है, बता रही है, वह जनाकांक्षा का दर्पण है। लेकिन जनता क्या सोच और समझ रही है, इससे बजट का उतना ही वास्ता होता है, जितना कि बजट की वजह से सेंसेक्स का उछलना या गिरना।

इस बजट में भी कई खूबियां रहीं। मसलन आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने की सरकार की इच्छाशक्ति, इन्फ्रास्ट्रक्चर पर जोर, सरकारी कंपनियों का निजीकरण, कुछ राहतें, कुछ आफतें, बड़ी-बड़ी बातें और देश की इंद्रधनुषी तस्वीरें। कहा गया कि इस बजट के महत्व को भविष्य के चश्मे से देखो। आम आदमी इस गूढ़ बात को समझ नहीं पाता। वह वर्तमान के चश्मे से बजट को पढ़ने की कोशिश करता है।

वैसे वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन जब बजट भाषण प्रस्तुत करती हैं तो उनके हाव-भाव किसी प्रोफेसर की तरह ज्यादा होते हैं, बजाए राजनेता के। गनीमत यह रही कि उन्होंने बजट भाषण की लंबाई का अपना ‍ही रिकॉर्ड ध्वस्त नहीं किया। बतौर वित्त मंत्री उनका पहला बजट भाषण 2 घंटे 17 मिनट का था और दूसरा बजट भाषण 2 घंटे 40 मिनट का। पिछले साल इतना लंबा बजट भाषण देते-देते उनके माथे पर पसीना छलक आया था। और आखिरी के दो पन्ने तो उन्हें जल्दी में निपटा दिए थे। यह बात अलग है कि इस सुदीर्घ बजट भाषण के आर्थिक अरमानों पर दो माह बाद ही कोरोना पड़ गया और आर्थिकी की रफ्तार माइनस में चली गई।

लगता है इस बार उन्होंने कुछ सावधानी बरती। बजट भाषण 1 घंटा 50 मिनट में समेट दिया। इस दफा शेरो-शायरी भी कम थी। उन्होंने भाषण के दौरान एक क‍श्मीरी कविता, दो तमिल कहावतें और एक संस्कृत श्लोक पढ़ा। जैसे-जैसे बजट भाषण छोटा होता जा रहा है, उसका भाव पक्ष भी कमजोर होता जा रहा है। शेरो-शायरी की गुंजाइश भी कम होती जा रही है। वह ट्वीट्स का वृहद संस्करण ज्यादा बनता जा रहा है।

यूं बजट भाषण पहले भी कभी सुगम संगीत की तरह नहीं होते थे। आंकड़ों का मायाजाल तब भी होता था। आजकल के बजट भाषणों में आंकड़े भी बहुत कम होते हैं, जिससे आंकड़ों के आधार पर विश्लेषण करने वालों की परेशानी बढ़ गई है और इसके माध्यम से बजट की आत्मा तक पहुंचने का रास्ता भी संकरा हो गया है। अब बजट भाषण गाइड लाइन की तरह ज्यादा होने लगे हैं। वह सरकार के संकल्पों की आउट लाइन भर रह गई है।

मोदी सरकार ने तो रेल बजट का थ्रिल भी खत्म कर दिया है। 70 पेज के बजट भाषण में रेल महकमा कब आंकड़ों की सुरंग से निकल गया, पता ही नहीं चला। पहले बजट को लेकर इसलिए भी उत्सुकता रहती थी कि सरकारें ज्यादातर महत्वपूर्ण घोषणाएं इसी के माध्यम से करती थीं। इसी वजह से बजट की अपनी एक पवित्रता और अदब हुआ करता था। अब तमाम महत्वपूर्ण घोषणाएं बजट भाषण का इंतजार नहीं करतीं।

कह सकते हैं कि जिंदगी की तेज रफ्‍तार और वक्ती जरूरत ने प्रतीक्षा और धैर्य शब्दों को भी ट्रैश में डाल दिया है। या यूं कहें कि बजट भी रजिस्टर्ड मैरिज की माफिक हो गया है, जिसमें कोई मंगलाष्टक नहीं होता। अलबत्ता एक बजटीय प्रथा अभी कायम है। और वो है हलुआ सेरेमनी। वित्त मंत्रालय के नजरबंद कर्मचारी बजट बनाने की शुरुआत हलुआ बनाकर और खाकर करते हैं। सच कहें तो बजट का सारांश भी यही है और आर्थिकी का यथार्थ भी।