रवीन्द्र व्यास

22 मार्च का विश्व जल दिवस बुंदेलखंड के लोगों के लिए यादगार बन गया क्‍योंकि इस दिन प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में केन बेतवा लिंक परियोजना शुरू करने के लिए केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय, मध्यप्रदेश के मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने परियोजना दस्‍तावेज पर हस्ताक्षर किए। जल बंटवारे को लेकर दोनों राज्यों के बीच कई वर्षो से जंग चल रही थी जिसके चलते अटलबिहारी वाजपेयी के शासन काल में स्वीकृत हुई यह योजना कागजों में ही अपना अंतिम रूप नहीं ले पाई। सूत्रों की माने तो स्वयं मोदी जी के हस्तक्षेप के बाद जल बंटवारे पर सहमति बनी।

1993 में संयुक्त राष्ट्र ने 22 मार्च को विश्व जल दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया था, निश्चित रूप से संयुक्त राष्ट्र की यह पहल दुनिया में घटते जल स्रोतों और जल संरक्षण और आवर्धन के प्रति लोगों को जागरूक करने की थी। भारत भू जल दोहन में दुनिया के शीर्ष देशों में से एक है| जिसके चलते देश के अधिकांश इलाकों में भूजल स्तर खतरनाक स्तर तक गिर चुका है। पानी को लेकर वाटर ओआरजी के आकड़े बताते हैं कि दुनिया के 85 करोड़ लोगों को साफ़ पानी नहीं मिल पाता है, जिनमें 60 करोड़ लोग अकेले हिन्दुस्तान के हैं।

दुनिया भर में औरतों का 6 घंटे का समय पानी जुटाने में खर्च होता है तो बुंदेलखंड में 24 घंटे में से 10 घंटे औरतों का समय पानी जुटाने में व्यतीत होता है। ये आंकड़े बताते हैं कि जल को लेकर हालात कितने चिंताजनक हैं। सम्भवतः इसीलिए पीएम मोदी ने इस वर्ष का विश्व जल दिवस देश में वर्षा जल संरक्षण अभियान के तहत मनाने का निर्णय लिया है जिसकी शुरुआत उन्‍होंने सोमवार को की।

22 मार्च 2021 से 30 नवंबर 2021 तक पूरे देश में यह अभियान चलेगा। सरकार की मंशा लोगों को भागीदार बनाकर इसे एक जन आंदोलन बनाने की है। अब देखना यह होगा कि वर्षा जल के संरक्षण के प्रति लोग अपनी जिम्मेदारी का कितना निर्वहन करते हैं।

केन बेतवा लिंक परियोजना
सरकार और इंजीनियरों की नजर में बुंदेलखंड के छतरपुर, पन्ना, टीकमगढ़, झाँसी जिले के लोगों की तक़दीर और तस्वीर बदलने वाली है केन-बेतवा लिंक परियोजना से। अटल जी के प्रधानमंत्रित्व काल में जब देश की 37 नदियों को आपस में जोड़ने का फैसला लिया गया, उनमें से एक यह भी थी। यह देश की वह परियोजना है जिसे सबसे पहले शुरू होना था। इसका मुख्य बाँध पन्ना टाइगर रिजर्व के ढोडन गाँव में बनना है। बाँध व नहरों के कारण सवा पांच हजार हेक्टेयर वन क्षेत्र नष्ट हो जाएगा, छतरपुर जिले के दस गाँव डूब जायेंगे।

केन बेतवा लिंक परियोजना में चार बाँध बनाए जायेंगे। केन नदी पर ढोढन बाँध बनेगा। 77 मी. ऊँचे और 19633 वर्ग कि.मी. जलग्रहण क्षमता वाले इस मुख्य बाँध में 2853 एम.सी.एम. पानी भंडारण कि क्षमता होगी| इस बाँध से दो बिजली घर बनेंगे जिससे 78 मेवा बिजली बनेगी। इस बाँध के कारण पन्ना टाइगर रिजर्व की 5258 हेक्टेयर जमीन सहित कुल 9 हजार हेक्टेयर जमीन डूब जाएगी। इस जमीन पर बसे सुकुवाहा, भावरखुवा, घुगारी, वसोदा, कुपी, शाहपुरा, डोंदन, पल्कोहा, खरयानी और मेनारी गाँव का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। बाँध से 221 कि.मी. लम्बी मुख्य नहर उत्तर प्रदेश के बरुआ सागर में जाकर मिलेगी। इस नहर से 1074 एम.सी.एम. पानी प्रति वर्ष भेजा जाएगा, जिसमें से 659 एम.सी.एम. पानी बेतवा नदी में पहुंचेगा।

ढोंडन बाँध के अलावा तीन और बाँध भी मध्यप्रदेश की जमीन पर बेतवा नदी पर बनेंगे। रायसेन, विदिशा जिले में बनने वाले मकोडिया बाँध से 5685 हेक्टेयर क्षेत्र में, बरारी बैराज से 2500 हेक्‍टेयर और केसरी बेराज से 2880 हेक्‍टेयर क्षेत्र में सिचाई होगी। लिंक नहर से मार्गों में 60294 हेक्‍टेयर क्षेत्र सिंचित होगा। इसमें मध्यप्रदेश के 46599 हेक्‍टेयर व उत्तरप्रदेश के 13695 हेक्‍टेयर क्षेत्र में सिचाई होगी। ढोंडन बाँध से नहर के मार्ग में पडऩे वाले 6.45 लाख हेक्टेयर (1.55 लाख हेक्टेयर उत्तर प्रदेश में एवं 4.90 लाख हेक्टेयर मध्यप्रदेश में) जमीन की सिंचाई के लिए 31960 लाख घन मीटर पानी इस्तेमाल होगा। इससे घरेलू एवं औद्योगिक उपयोग के लिए 120 लाख घन मीटर पानी प्रदान किया जाएगा।

2008 में केन बेतवा लिंक परियोजना की पूर्ण ड्राइंग डिजाइन तैयार की गई। पर्यावरणविदों और वन आपत्ति के चलते मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा था। 2015 में उमा भारती ने इस परियोजना को शुरू करने की कोशिश की थी, पर यह हो नहीं सकी। 2017 में नॅशनल बोर्ड फॉर वाइल्ड लाइफ की सशर्त अनुमति के बाद फिर यह आशा बंधी की परियोजना शुरू होगी। पर मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के बीच जल बंटवारे को लेकर बात नहीं बनी। अब दोनों राज्यों के बीच जल बंटवारे को लेकर सहमति बनने के बाद परियोजना को विश्व जल दिवस पर हरी झंडी मिल गई है।

जल संरक्षण
सभी जानते हैं कि जल बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। दुनिया की तमाम सभ्यताओं का विकास नदियों के के किनारे ही हुआ है। बुंदेलखंड इलाके में सभ्यताओं के विकास लिए के लोगों ने जहाँ नदी नहीं थी, वहां सरोवरों का निर्माण किया।  भारत की संस्कृति में जल के महत्व को पर्याप्त स्थान मिला है वैदिक साहित्य में भू जल विज्ञान का विकास 5 हजार वर्ष से भी ज्यादा प्राचीन माना जाता है। पंच तत्व से जिस शरीर के निर्माण की बात भारत के धर्मग्रंथो में की जाती है उनमें जल भी एक महत्वपूर्ण घटक है।

वर्षों से मानव सभ्यता एक कार्य में जुटी रही की जल जहां हो, जैसा हो, उसे उपयोग कर लो। परिणाम ये हुआ की भू जल भण्डार खाली होते गए, इन भंडारों को भरने की हमने जरूरत नहीं समझी। दुनिया का 99 फीसदी पानी पीने के काम का नहीं है। मात्र एक फीसदी जल ही पीने योग्य है, ऐसा नहीं कि यह बात देश के अधिकांश लोग ना जानते हों, जानते हैं इसीलिए जल के नाम पर बड़े-बड़े एनजीओ अपना कारोबार चला रहे हैं। समाजसेवी होने का चोला ओढ़कर इनमें से अधिकांश जनता और सरकार से एक बड़ा छलावा करने में जुटे हैं।

दरअसल जल संरक्षण के लिए एक ईमानदार पहल की जरुरत है। ऐसी सार्थक पहल कुछ लोग करते भी हैं और उसके सार्थक परिणाम भी देखने को मिलते हैं।