राकेश अचल

टिकटौली में आज जश्न का माहौल है। होना भी चाहिए, क्योंकि आज टिकटौली वालों को प्रॉपर्टी कार्ड जो मिलने वाला है। टिकटौली वाले दूसरे आम हिन्दुस्तानियों की तरह कार्ड के बड़े प्रेमी हैं। उन्हें जब-जब कोई नया कार्ड मिलता है बेचारे गदगद हो जाते हैं। टिकटौली वालों ने वर्षों तक पोस्टकार्ड के अलावा कोई दूसरा कार्ड देखा ही नहीं था। पोस्टकार्ड भी कटे हुए कान का आता था,  जिसमें सुख की तो कोई खबर कभी आई नहीं। उस जमाने में पोस्टकार्ड का इस्तेमाल केवल किसी के दिवंगत होने की सूचना देने के लिए किया जाता था।

टिकटौली के प्रभु बताते हैं कि- ‘पहले जब किसी के मरने-गिरने की खबर पोस्टकार्ड से मिलती थी तब तक मृतक के घर में या तो शुद्धिकर्म हो चुका होता था या कभी-कभी तेरहवीं तक हो जाती थी। ऐसे में संवेदना जताने के लिए किसी के पास आंसू ही नहीं बचते थे,  लेकिन महिलाएं नकली रोकर लाज बचा लेती थीं। गांव में महिलाएं स-स्वर रोती हैं। गांव में इसे राय से रोना कहते हैं,  जबकि ये राग में रोना होता है। अक्सर ध्रुपद वाले इस राग का इस्तेमाल करते हैं।

बहरहाल पोस्टकार्ड युग में एक फायदा ये था कि किसी के मरने-गिरने पर राजनीति नहीं हो पाती थी। नेताओं में मृतक के घर जाने की होड़ नहीं मचती थी। तब जमाना ही और था। अव्वल तो इतनी क्रूरता से अपराध होते नहीं थे और हो भी जाते थे तो इतना हो-हल्ला नहीं होता था। होता भी कैसे? तब आज की तरह कोई आर भारत जैसे सैकड़ों टीवी चैनल ही नहीं थे। चैनल तो छोड़िये टीवी ही नहीं था। जो भी चैनल था, वो केवल पोस्टकार्ड था।

पिछले तिहत्तर साल में हम पोस्टकार्ड युग से चलकर प्रॉपर्टी युग तक आ गए हैं। आप हमारे कार्डों से हमारे देश की तरक्की का अंदाजा लगा सकते हैं। जिस इलाके में जितने ज्यादा कार्ड मिलें, उस इलाके को आप उतना तरक्की पसंद कह सकते हैं। कहना न चाहें तो मान सकते हैं। मेरे हिसाब से ये कलियुग नहीं कार्ड युग है। तरह-तरह के कार्डों की लम्बी श्रृंखला है। अब तो शादी-विवाह,  जन्मदिन ही नहीं अपितु हर मौके के लिए कार्डों का चलन है। आप आमने-सामने खड़े हैं,  चाहें तो सीधे अपने श्रीमुख से अपने प्रेमी को ‘आईलव यू’ कह सकते हैं, लेकिन नहीं कहेंगे। उसे ‘आई लव यूं’ लिखा कोई मंहगा कार्ड देंगे। इन कार्डों की कीमत इतनी होती है कि टिकटौली वालों के एक घर का एक दिन का राशन-पानी आ जाए।

कार्ड देने में सरकारें ही नहीं बल्कि बैंक  और दुकानदार तक होड़ में लगे हैं। शहरों में आपको घर बैठे डेबिट कार्ड,  क्रेडिट कार्ड,  हेल्थ कार्ड,  वैल्थ कार्ड और न जाने कौन-कौन से कार्ड मिल सकते हैं। खाते में पैसा हो या न हो। जेब में कार्ड रखिये और खूब मजे मारिये। जब पैसा हो तब लौटा दीजिये। थोड़ा सा शुल्क ही तो देना है भाई। अब लोग अपने बटुए में जिसे मार्डर्न लोग वायलट कहते हैं,  में रुपये की जगह कार्ड रखते हैं। ये कार्ड चलते भी हर जगह हैं। अब तो दुकानदारों को छोड़िये पानी पूरी और सब्जी वाले तक कार्ड ले लेते हैं। वर्चुअल दुकानें तो चल ही कार्ड से रही हैं।

पोस्टकार्ड से क्रेडिट कार्ड तक आते-आते मैं टिकटौली में होने वाले कार्ड के जश्न का किस्सा बताना भूल ही गया। टिकटौली वालों के पास भी सरकार ने तरह तरह के कार्ड दे रखे हैं। कोई किसान कार्ड है, तो कोई फसल बीमा कार्ड। अब सुना है की किसानों को एक नया कार्ड, प्रॉपर्टी का मिलने वाला है। टिकटौली में ही क्या देश के किसी भी छोटे गांव में घर-मकान का कोई दस्‍तावेज नहीं होता। सब काम मौखिक चलता आया है। जागीरदार से लेकर कामगार तक के पास घर-मकान का कोई दस्तावेज नहीं होता। सरकार अब सबको प्रॉपर्टी कार्ड देने जा रही है। सरकार की भी मजबूरी है। उसके पास अब देने के लिए कार्डों के अलावा कुछ बचा ही नहीं है।

हमारी सरकार का दिल देखिये, कम से कम दीवाली से पहले दीवाला निकलने के एवज में एक प्रॉपर्टी कार्ड तो दे रही है। ये कार्ड दिखाकर गांव वाले अपने बाल-बच्चों की शादी-विवाह का ठहराव तो कर ही सकते हैं। अरे कार्ड इस बात का सबूत तो बन ही जाएगा की गरीब के सर पर जो छत है वो लीगल है। इस कार्ड को दिखाकर आप कोरोना-काल में राशन-पानी तो हासिल कर ही सकते हैं। मुमकिन है कि आने वाले दिनों में सरकार इसी कार्ड को आधार कार्ड से जोड़ दे! गांववालों के पास कुछ साल पहले तक कुछ भी नहीं होता था। अब कम से कम उसके पास मतदाता कार्ड,  आधार कार्ड और अब प्रॉपर्टी कार्ड तो होगा।

मेरा अपना तजुर्बा है कि कार्ड है तो आत्मविश्वास है। कार्ड आपके आत्मविश्वास की गारंटी है। पहले तो कोई गारंटी थी ही नहीं। जिसके पास जितने अधिक कार्ड हों उसे आप उतना समृद्ध समझ सकते हैं। कार्ड बिना जीवन फीका-फीका लगता है। मेरे पास फिलहाल एक क्रेडिट कार्ड के अलावा कोई दूसरा कार्ड नहीं है। पहले ये दूसरा वाला कार्ड रेलवे कन्‍सेशन का था लेकिन सरकार ने कन्‍सेशन क्या रेलें ही बंद कर दीं, इसलिए ये कार्ड भी अब नहीं बनता। बन भी जाये तो किसी काम का नहीं। क्योंकि अब कार्ड से कन्‍सेशन मिलता ही नहीं है।

टिकटौली से मेरा नाता बहुत पुराना है,  इसलिए मैं आपको यहां की हर गतिविधि की इत्तला समय-समय पर देता रहता हूँ। प्रॉपर्टी कार्ड के जश्न की इत्तला भी इसी सिलसिले की एक कड़ी है। अब मान लीजिये कि जैसे किसी युग में इच्छाधारी नाग-नागिन होते थे, वैसे ही इस युग में कार्डधारी महिला-पुरुष होते हैं। अब कार्ड ही इच्छाओं की पूर्ति का जरिया है। यानि कार्ड है तो सब कुछ है और कार्ड नहीं तो कुछ भी नहीं। अब ‘जित देखो, उत कार्ड’ दिखाई देते हैं। अब लोग लाली नहीं कार्ड देखते हैं।

आज समाज में कार्डधारियों का जितना सम्मान है उसके लिए टिकटौली वालों समेत सभी को हमारी सरकार का आभारी होना चाहिए। सरकार किसी भी दल की हो कार्ड से परहेज नहीं करती। सरकार बदलने पर तमाम प्राथमिकताएं बदल सकती हैं लेकिन कार्ड नहीं बदलने वाले। कार्ड अजर हैं, कार्ड अमर हैं। कार्ड ही शाश्‍वत हैं,  कार्ड ही सारस्वत हैं। कार्ड ही लक्ष्मी हैं,  कार्ड ही सरस्वती हैं। कार्ड ही जीवन का आधार है। यानि ‘कलियुग केवल कार्ड आधारा।’

मेरी कोई सुनता नहीं अन्यथा मैं सबसे पहले कार्ड ईजाद करने वाले को नोबेल पुरस्कार देता। कार्ड का आविष्कार सबसे बड़ा नोबेल कार्य है। कार्ड ने दुनिया ही बदल दी है। भारत तो बहुत पीछे है कार्ड के मामले में। जबकि दुनिया इस मामले में बहुत प्रगति कर चुकी है। दुनिया में गोल्डन,  प्लेटिनम और प्रीमियम कार्ड दिए जाते हैं। कार्ड भी उत्तम,  मध्यम,  नीच प्रकार के होते हैं। यानि कार्डों की दुनिया में भी जाति-भेद चल पड़ा है।

कार्ड आपकी हैसियत देखकर दिया जाता है। हैसियत नहीं, तो कार्ड भी नहीं। इसलिए हे महामना कार्ड सदा साथ रखिये। ये ही काम आने वाला है। जैसे गिरधर जी लाठी के बारे में कहते थे ‘’लाठी में गुण बहुत हैं,  सदा रखिये संग। गहरि नदी,  नाली जहाँ, तहाँ बचावै अंग।‘’ इसी प्रकार मैं कहता हूँ कि- ‘’कारड में गुण बहुत हैं,  सदा राखिये संग, चाहे जो माहौल हो, सदा बचावे अंग’’ तुलसीदास जी भी आज होते तो कार्ड सुख के बारे में अवश्य लिखते-
‘जान लेय जो जानन हारा,
कलियुग केवल कार्ड आधारा