अजय बोकिल

झारखंड के धनबाद में अपर जिला न्याया‍धीश (एडीजे) उत्तम आनंद की हत्या समूचे देश को और न्याय व्यवस्था को हिला देने वाली है, क्योंकि इससे यह संदेश गया है कि इस देश में न्यायपालिका भी सुरक्षित नहीं है। इस अत्यंत गंभीर मामले का सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया तथा झारखंड के मुख्य सचिव व डीजीपी से एक हफ्ते में रिपोर्ट मांगी है। उधर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने भी मामले की सीबीआई जांच की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड सरकार पर कठोर टिप्पणी करते हुए कहा है कि राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति नागालैंड से भी बदतर हो गई है। कोर्ट ने कहा कि घटना का सीसीटीवी फुटेज देखने के बाद बच्चा भी बता देगा कि एडीजे आनंद की हत्या की गई है।

जो जानकारी सामने आई है, उसके मुताबिक एडीजे आनंद 28 जुलाई को तड़के सैर के लिए निकले थे। इसी दौरान गलत दिशा से आ रहे एक ऑटो रिक्शा ने उन्हें टक्कर मार दी। राहगीर उन्हें अस्पताल ले गए, जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। पहले इसे सड़क हादसे की तरह देखा गया। लेकिन बाद में घटना का जो सीसीटीवी फुटेज सामने आया, उसमें साफ दिख रहा है कि ऑटो ने रास्ते के किनारे वॉक कर रहे एडीजे आनंद को जानबूझकर टक्कर मारी। यानी ऑटो में बैठे व्यक्ति का इरादा एडीजे आनंद को मारने का ही था।

राज्य सरकार ने इसकी जांच के लिए एसआईटी गठित की है। रांची हाईकोर्ट ने इसे बेहद गंभीरता से लेते हुए कहा कि यदि धनबाद पुलिस मामले का खुलासा नहीं कर पाई तो मामला सीबीआई को सौंपा जाएगा। यह ऐसा मामला है, जिसमें कोल माफिया की आपसी रंजिश और गैंगवार तथा राजनीति और अपराधियों का गठजोड़ एवं रसूख की लड़ाई है। घटना के तार उस पूर्व नेता और जनता पार्टी से विधायक रहे कोल माफिया डॉन सूर्यदेव सिंह के परिवार से जुड़ते हैं, जिसकी दबंगई हर क्षेत्र में है। गैंगवार और हत्याएं इस परिवार के लिए रूटीन की तरह हैं।

इस बीच पुलिस ने तीन लोगों को गिरफ्तार किया है और उन्होंने अपराध कबूल भी कर लिया है। लेकिन उन्होंने ऐसा क्यों और किसके इशारे पर किया, यह साफ होना है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में स्पष्ट हो गया है ‍कि एडीजे आनंद की मौत घातक चोट पहुंचाने से हुई है। इस हमले में जो ऑटो इस्तेमाल हुआ, वह एक रात पहले ही चोरी किया गया था। पहली नजर में यह बात सामने आ रही है कि कोल माफिया हत्या के मामले में एडीजे आनंद ने दो गुंडों को जमानत देने से इंकार कर दिया था। इस पूरे मामले में भाजपा के एक पूर्व विधायक का नाम भी आ रहा है।

झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस व राजद की गठबंधन सरकार है। हैरानी की बात यह है कि इस जघन्य मामले पर वैसा राजनीतिक बवाल नहीं मचा, जो छोटे-छोटे मामलों पर मचता है। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी का एक बयान जरूर दिखा जिसमें उन्होंने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि राज्य में गुनहगारों को सजा सुनाने वाले न्यायाधीश ही सुरक्षित नहीं तो आम आदमी की स्थिति क्या होगी?

बताया जाता है कि एडीजे उत्तम आनंद इन दिनों 15 बड़े हाई प्रोफाइल मुकदमों की सुनवाई कर रहे थे। इनमें रंजय सिंह हत्याकांड भी शामिल था। एक टीवी चैनल के अनुसार रंजय उर्फ रविरंजन सिंह की मार्च 2017 में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। धनबाद में बड़ा राजनीतिक रसूख और डॉन की हैसियत रखने वाला ‍परिवार सूर्यदेव सिंह का है। सूर्यदेव सिंह को ‘कोल टाइगर’ भी कहा जाता था। वो मजदूर नेता से राजनेता बने थे।

सूर्यदेवसिंह कई बार विधायक रहे। उनके भाई भी कोयले के धंधे में थे। 1991 में सूर्यदेव सिंह की मौत के बाद परिवार में विरासत का झगड़ा शुरू हो गया। भाई बच्चासिंह और राजनारायण सिंह के दो गैंग बन गए। जबकि सूर्यदेव सिंह के बेटे और भाजपा प्रत्याशी संजीव सिंह ने कांग्रेस के टिकट पर लड़ रहे अपने चचेरे भाई नीरज सिंह को चुनाव में हरा दिया था।

रंजय सिंह संजीव सिंह का करीबी था। रंजय की हत्या के कुछ दिनों बाद ही धनबाद के डिप्टी मेयर और संजीव सिंह के चचेरे भाई नीरज सिंह का भी कत्ल हो गया। इस कत्ल के आरोप में संजीव सिंह को गिरफ्तार किया गया। माना गया कि रंजय की हत्या नीरज सिंह ने करवाई थी, इसलिए संजीव सिंह ने नीरज सिंह को मरवा दिया। इसी मामले में जज आनंद ने तीन दिन पहले ही दो आरोपियों रवि ठाकुर व अभिनव सिंह की जमानत अर्ज़ी खारिज की थी। रवि ठाकुर कुख्यात अमन सिंह गैंग का शूटर कहा जाता है। सो पुलिस को शंका है कि जज की हत्या के पीछे इसी गैंग का हाथ हो सकता है।

वैसे खुद आनंद भी रसूखदार परिवार से थे। उनके पिता व भाई हाईकोर्ट वकील हैं तथा दो साले आईएएस अधिकारी बताए जाते हैं। आनंद 6 माह पूर्व ही स्थानांतरित होकर धनबाद आए थे। हमारे देश में इस तरह न्यायाधीशो की हत्या की कु-परंपरा नहीं रही है। क्योंकि न्यायाधीश का काम कानून के अनुसार दंड देना है। यूं जजों के फैसलों पर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन उनकी जान लेने या उन्हें ‘सबक सिखाने’ जैसी दुष्ट और बेखौफ वृत्ति हमारी संस्कृति नहीं रही है। इसके पहले महाराष्ट्र के एक जज हरेकृष्ण लोया की संदिग्ध मौत को लेकर कई सवाल उठे थे।

जज लोया सोहराबुद्दीन शेख मर्डर मामले की सीबीआई विशेष अदालत में सुनवाई कर रहे थे। उनकी नागपुर में संदिग्ध परिस्थिति में मौत हो गई। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल भी लगी। लेकिन कोर्ट ने न केवल उसे खारिज कर जज लोया की मौत को स्वाभाविक माना बल्कि उस याचिका को ‘न्यायपालिका पर हमला’ करार दिया। हालांकि जज लोया की बहन ने बाद में कहा था कि वो अत्यधिक दबाव में थे, क्योंकि इस मर्डर केस में देश के कुछ बड़े नेताओं के नाम भी शामिल थे।

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने कहा है कि धनबाद की घटना ‘न्यायिक स्वतंत्रता पर हमला है।‘ यकीनन इस देश में न्याय पालिका पर हिंसक हमले की घटना अस्वीकार्य है। अभी तक कार्य पालिका, विधायिका और मीडिया पर तो इस तरह के हमले होते रहे हैं, लेकिन किसी जज का इस तरह खुलेआम मर्डर दुस्साहस और लोकतंत्र में अनास्था की पराकाष्ठा है। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विकास सिंह ने कहा कि ये न्यायिक आजादी पर हमला है। अगर न्यायपालिका को स्वतंत्र रहना है तो जजों को सुरक्षित रखना होगा। एक जज की इस तरह से हत्या नहीं की जा सकती है।

दरअसल यह घटना इस बात का संकेत है कि अब अपराधियों और दबंगों में किसी तरह का कोई भय नहीं रह गया है। अगर ऐसा ही चला तो कोई भी न्यायाधीश निर्भीक होकर फैसला देने से डरेगा। न्याय पालिका पर वैसे ही दूसरे दबाव पहले से हैं। लेकिन यदि न्याय का सम्मान करने की जगह ‘न्यायाधीशों को ही खत्म’ करने की प्रवृत्ति समय रहते नहीं कुचली गई तो देश के आम नागरिक का इंसाफ पर से ही भरोसा उठ जाएगा। अगर ऐसा हुआ तो वह लोकतंत्र और आम भारतीय की दृष्टि से भी काला दिन होगा।(मध्‍यमत)
डिस्‍क्‍लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं।
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