गिरीश उपाध्‍याय

पिछले दिनों मध्‍यप्रदेश के मुख्‍यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने घोषणा की थी कि अब हर गांव, हर शहर का जन्‍म दिन मनाया जाएगा। मेरा मानना है कि इस घोषणा के राजनीतिक मायने चाहे जो हों, उनमें सिर खपाने के बजाय हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि हम अपने गांव, अपने शहर से जुड़कर तो देखें। उनके लिए कुछ करने की मन में ठानें तो सही। सरकारों को हमेशा दोष देते रहने या व्‍यवस्‍थाओं व तंत्र को हमेशा कोसते रहने से कुछ नहीं होगा। बयानों की झड़ी लगाने, वाट्सएप-वाट्सएप खेलने और जो हो रहा है उसका मजाक उड़ाने से हटकर भी सोचना होगा।

मुखर होकर भले ही लोग न बोल पाते हों लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि अब कोई भी ऐसा जनआंदोलन शहर के लिए नहीं होता जिसमें शहर के सभी वर्गों की, सभी दलों की सभी विचारधाराओं को मानने वालों की साझी भागीदारी हो। आंदोलन, धरना, प्रदर्शन आदि होते भी हैं तो अपने-अपने झंडे और बैनर तले होते हैं या अपने झंडे व बैनर को महत्‍व देने के लिए होते हैं। ऐसे में कोई सार्थक और सकारात्‍मक बात भी राजनीतिक या कथित वैचारिक बाड़ेबंदी का शिकार होकर रह जाती है।

ऐसा नहीं है कि देश में मिलजुलकर काम नहीं हो रहे। बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है। इस सिलसिले में इंदौर का उदाहरण हमारे सामने है। वहां के लोगों की सक्रिय भागीदारी के चलते ही इंदौर देश में स्‍वच्‍छता का सिरमौर बना। आज इंदौर के माथे पर एक और मोरपंख लगने जा रहा है और वो है एशिया के सबसे बड़े, गीले कचरे से बनने वाली सीएनजी गैस प्‍लांट के उद्घाटन का। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद इसके वर्चुअल समारोह में शामिल होंगे।

जो शहर अपनी बदहाली का रोना रोते रहते हैं उन्‍हें जरा अपने ही प्रदेश में इधर-उधर नजर घुमाकर देखना चाहिए। इंदौर भी तो इसी प्रदेश का, इसी प्रदेश की राजनीति एवं प्रशासनिक व्‍यवस्‍था से संचालित होने वाला शहर है। क्‍या कारण है कि वहां ऐसी सार्थक बातें साकार हो जाती हैं और बाकी जगहों पर नहीं। इसके बारे में राजनीतिक दलों, विभिन्‍न सामाजिक संगठनों और खुद शहरों की जनता को सोचना होगा।

एक बात और है जिस पर ध्‍यान दिया जाना चाहिए। इंदौर को आज इस मुकाम पर पहुंचाने में जितना योगदान वहां की जनता का है, उतना ही योगदान वहां की प्रशासनिक मशीनरी का भी है। वहां चाहे जिला प्रशासन हो या फिर नगर निगम अथवा विकास प्राधिकरण, अपनी अलग अलग भूमिकाओं के बावजूद उन्‍होंने शहर के विकास को लेकर एक समन्वित सोच विकसित की। सख्‍ती बरती तो जनता ने भी पूरा साथ दिया, जनदबाव ऐसा था कि राजनीति को भी कई मामलों में मन मसोस कर रह जाना पड़ा।

सवाल ये है कि जब इंदौर में यह सब हो सकता है तो प्रदेश के बाकी शहरों, कस्‍बों व गांवों में क्‍यों नहीं। और इसका जवाब है, इच्‍छाशक्ति का अभाव… जरूरी है अपने शहर, अपने गांव और अपने गली-मोहल्‍ले के लिए मिलकर आवाज उठाना, और आवाज उठाने का मतलब सिर्फ चिल्‍लाना या भाषण झाड़कर चल देना नहीं, बल्कि पहले उस पहल पर खुद अमल करके दिखाना। इंदौर के लोगों ने कचरे के निष्‍पादन को अपनी आदत बनाया, तब जाकर वो शहर देश में स्‍वच्‍छता के मामले में अव्‍वल हो सका।

दूसरे, इस मामले में मीडिया को भी अपनी भूमिका के बारे में सोचना होगा। जो हाल राजनीति का है, मीडिया का हाल उससे कुछ अलग नहीं है। हालत ये है कि हम दुनिया जहान की समस्‍याओं पर लंबे-लंबे वक्‍तव्‍य दे देंगे, लेख लिख डालेंगे, फेसबुक और यूट्यूब लाइव कर, वहां मिलने वाले लाइक और शेयर का बखान कर लेंगे, लेकिन अपने शहर और गली मोहल्‍ले के बारे में बात नहीं करेंगे। दरअसल हमारी असली दिक्‍कत ये है कि हम देश का नेतृत्‍व करना चाहते हैं या कि देश को बदलना चाहते हैं, जबकि असलियत ये है कि हम अपने शहर के ट्रैफिक की बदहाली को बदल सकने तक की कूवत नहीं रखते… बेहतर होगा शुरुआत हम अपने आसपास, अपने शहर अपने गांव से करें… वो कहते हैं ना… हम बदलेंगे, जग बदलेगा… (मध्‍यमत)
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