राकेश अचल

प्रशांत भूषण के मामले में स्वयं संज्ञान लेने वाली हमारे देश की सर्वोच्च अदालत के लिए स्वत: संज्ञान लेने का एक और अवसर सामने है, लेकिन ऐसा होगा इसमें मुझे संदेह है, क्योंकि अबकी बार कड़वी बात कहने वाले प्रशांत भूषण नहीं बल्कि सबसे बड़ी अदालत से सेवानिवृत्त हुए जज मार्कण्डेय काटजू हैं। रिया और कंगना के जाल में उलझी मीडिया को भी काटजू साहब दिखाई और सुनाई नहीं देंगे।

काटजू साहब का मैं बहुत दिनों से आदर करता हूं, हालाँकि उनके अनेक बेबाक बयानों की वजह से औरों की तरह मैं भी उनसे इत्तफाक नहीं रखता, लेकिन वे जो कहते हैं, बहुत ठोक-बजाकर कहते हैं। 9 साल पहले सेवानिवृत्त हुए जस्टिस काटजू  इस बार भगोड़े नीरव मोदी के मामले में एक गवाह के रूप में पेश हो रहे हैं। उन्‍होंने इकानॉमिक टाइम्स से कहा, ‘मैं कल ब्रिटेन की अदालत में नीरव मोदी के लिए बतौर गवाह पेश (वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए) होऊंगा। लेकिन मैं केस की मेरिट पर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा। मैं सिर्फ इतना कहूंगा कि उन्हें (नीरव) भारत में इंसाफ नहीं मिलेगा।’

आपको याद होगा कि काटजू ने नीरव के प्रत्यर्पण के लिए भारत की याचिका के खिलाफ अपनी राय दर्ज कराई है। ब्रिटेन की एक अदालत भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी के प्रत्यर्पण के लिए भारत की याचिका पर सुनवाई करने वाली है। जस्टिस काटजू ने ईटी को फोन पर बताया कि उन्होंने अपने लिखित बयान में कहा है कि नीरव मोदी को भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष ट्रायल मिलने की संभावना नहीं है। नीरव को भारतीय मीडिया और मौजूदा प्रतिष्ठान पहले ही ‘दोषी’ करार दे चुके हैं।

इस देश में काटजू जैसे लोग कम ही पैदा होते हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 20 सितंबर 1946 को जन्‍मे काटजू का परिवार कश्‍मीर से ताल्‍लुक रखता है। बचपन से ही पढ़ने के शौकीन काटजू ने 1967 में इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय से कानून की डिग्री ली। काटजू उस परीक्षा की मेरिट लिस्‍ट में सबसे ऊपर आए थे। 1991 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज बनने के बाद काटजू तीन उच्‍च न्‍यायालयों (इलाहाबाद हाईकोर्ट, 2004, मद्रास हाईकोर्ट, 2004 और दिल्‍ली हाईकोर्ट, 2005) के चीफ जस्टिस बने। 2006 से लेकर 2011 तक काटजू सुप्रीम कोर्ट के जज रहे।

अपने एक बयान में काटजू ने भारत के 90 प्रतिशत लोगों को बेवकूफ बताया था। उन्‍होंने कहा कि भारत में लोग जाति के आधार पर चुनाव में वोट देते हैं। उन्‍होंने फूलन देवी का उदाहरण देकर बताया कि एक समय की कुख्‍यात डाकू रही फूलन भी चुनाव जीतकर देश की संसद पहुंच जाती हैं।

मुझे लगता है कि आज देश की सबसे बड़ी अदालत में बैठे मी लॉर्ड्स को जस्टिस काटजू की इस स्वीकारोक्ति या आक्षेप का संज्ञान लेते हुए उन्हें भी एक नोटिस थमाना चाहिए क्योंकि उन्होंने किसी एक पर नहीं पूरी भारतीय न्याय व्यवस्था पर आक्षेप किया है। देश की संवेदनशील अदालतों के लिए जस्टिस काटजू की ताजा टीप भी एक तरह से अवमानना की श्रेणी में ही आती है, लेकिन जस्टिस काटजू चूंकि प्रशांत भूषण नहीं हैं, इसलिए किसी में इतना साहस नहीं जो उन्हें नोटिस देकर उन पर मामला चलाये या उन पर एक रुपये का जुर्माना ठोक सके।

रिया और कंगना के जाल में उलझे देश के मीडिया को देखकर आज भी मुझे जस्टिस काटजू की वो टीप याद आती है जिसमें उन्होंने कहा था कि चैनल जनता के हितों के मुद्दों को ना दिखाकर क्रिकेट, फिल्‍म और ज्‍योतिष दिखाकर लोगों का ध्‍यान भटकाते हैं। इन्‍हीं बयानों के बाद ऐश्‍वर्या राय बच्‍चन के बच्‍चे के जन्‍म पर टीवी चैनलों ने कोई ब्रेकिंग न्‍यूज नहीं चलाई थी।

जस्टिस काटजू किसी दल के दलदल में नहीं हैं, इसलिए खुलकर मन की बात कह देते हैं। हाल ही में अंग्रेजी के एक अखबार में नरेंद्र मोदी को ले‍कर एक कॉलम में उन्‍होंने लिखा कि भारत के लोगों को अपनी सूझबूझ और विवेक से अपना प्रधानमंत्री चुनना चाहिए। उन्‍होंने नरेंद्र मोदी को गुजरात में हुए दंगों के लिए जिम्‍मेदार भी ठहराया। भक्तों की निगाह में काटजू राष्ट्रवादी कैसे हो सकते हैं और अब नीरव मोदी के साथ खड़े होकर तो शायद बिलकुल नहीं।

काटजू सर बेहिचक बोलते हैं, चाहे वो सनी लियोनी के पक्ष में बोलने की बात हो, मीडिया और सरकार के बीच चर्चा छेड़ने की बात हो या फिर सलमान रुश्दी पर राय देनी हो। जस्टिस काटजू अपनी बात रखने में नहीं हिचकिचाते। उनसे सवाल करने में भी संकोच होता है, क्योंकि वे पूरी आक्रामकता के साथ उत्तर देते हैं। आपको याद होगा कि इससे पूर्व जस्टिस काटजू ने महात्मा गांधी को ब्रिटिश एजेंट और सुभाष चंद्र बोस को जापानी एजेंट बताया था। इस बयान को लेकर संसद में भी हंगामा हुआ था।