हेमंत पाल

सोशल मीडिया पर आजकल एक चुटकुला बहुत पढ़ने में आ रहा है। पढ़ने वाले इसे बड़े चटखारे लेकर पढ़ रहे हैं। यह कहता है-
देश में नई पार्टी के उदय होने की संभावना है जिसका नाम होगा भारतीय कांग्रेस जनता पार्टी और इसका चुनाव चिन्ह होगा हाथ में कमल।

ये तो महज एक चुटकी है, पर इसमें जो गंभीरता छुपी है उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। क्योंकि, भाजपा पर लम्बे समय से ये आरोप लग रहा है कि वो सत्ता पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। सत्ता की हवस ने पार्टी को उस कगार पर ला दिया कि उसने अपने प्रतिबद्ध नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी भुलाना शुरू कर दिया। मध्यप्रदेश में पहले सत्ता पाने और फिर उसे बचाने के लिए भाजपा का जोड़-तोड़ का खेल जारी है। पहली खेप में कांग्रेस के 22 विधायकों को तोड़कर भाजपा ने चुनी हुई सरकार को गिराकर अपनी सरकार बनाई। अब उसे मजबूती देने के लिए इक्का-दुक्का कांग्रेसी विधायकों को प्रलोभन देकर भाजपा में मिलाया जा रहा है।

पार्टी की इस कारगुज़ारी से उन भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं की अनदेखी हो रही है, जो बरसों से भाजपा का झंडा थामकर घूम रहे हैं। कांग्रेस से बगावत करके आने वालों को हाथों-हाथ पद बांटे जा रहे हैं, पर इससे भाजपा के नेता अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं। पार्टी का संगठन मजबूत है और सरकार पर पार्टी का कब्ज़ा है, इसलिए कोई विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। लेकिन, नाराजी का धुंआ कई जगह से निकलता दिखाई दे रहा है।

किसी भी राजनीतिक दल की सबसे बड़ी ताकत उसके कार्यकर्ता होते हैं, जो निस्वार्थ भाव से पार्टी और नेताओं के लिए काम करते हैं। वे न तो पद की चाह रखते हैं न प्रतिष्ठा की। लेकिन, उन्हें उम्मीद जरूर होती है कि कभी न कभी पार्टी की नजर उन पर पड़ेगी और उन्हें प्रतिबद्धता और समर्पण का पुरस्कार मिलेगा। भाजपा के पास कार्यकर्ताओं की बड़ी फ़ौज है। इस बात में भी शक नहीं कि वे किसी और पार्टी से कहीं ज्यादा समर्पित होकर काम करते हैं।

भाजपा के कार्यकर्ताओं को समर्पण की शिक्षा ‘संघ’ से मिलती है, इसलिए उनकी प्रतिबद्धता पर संदेह नहीं किया जाता। वे किसी नेता के बजाए पार्टी के प्रति समर्पण का भाव ज्यादा रखते हैं। लेकिन, अब भाजपा में जिस तरह का बदलाव आता दिखाई दे रहा है, पार्टी कार्यकर्ताओं के समर्पण की कोई कीमत नहीं रह गई। सत्ता को सहारा देने के लिए कांग्रेस से जिस तरह विधायकों को तोड़कर और उनके साथियों को भाजपा का दुपट्टा पहनाया जा रहा है, वो किसी भी समर्पित भाजपा नेता को रास नहीं आ रहा।

मध्यप्रदेश में भाजपा ने जिस तरह की राजनीति की शुरुआत की है, वो न तो पार्टी के नेताओं को रास आ रही है और न राजनीति की समझ रखने वाले जानकारों को। क्योंकि, ये पार्टी के भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है। सिर्फ सत्ता पाने की स्वार्थ पूर्ति के लिए प्रतिद्वंदी पार्टी के लोगों को तोड़ना, उन्हें पार्टी की सदस्यता दिलाना और फिर अपने चुनाव चिन्ह पर उपचुनाव लड़ाना राजनीतिक रणनीति के हिसाब से सही हो पर, पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को जिस तरह किनारे किया जा रहा है, वो किसी के गले नहीं उतर रहा।

आखिर, उन लोगों कि क्या गलती जो बरसों से पार्टी के अच्छे दिन आने का इंतजार कर रहे थे। क्योंकि, जब अच्छे दिन आए तो उसका फ़ायदा उन्हें मिल रहा है, जो कल तक उनके प्रतिद्वंदी बनकर सामने खड़े थे। इसलिए कहा जा सकता है कि भाजपा ने अपनी चाल, चरित्र और चेहरे वाली विचारधारा को तिलांजलि दे दी। कांग्रेस मुक्त राजनीति का उसका नारा अब बदलकर ‘कांग्रेस युक्त राजनीति’ हो गया। क्या भाजपा ने कांग्रेस को खुद में समाहित करके उसे राजनीति से मुक्त करने की रणनीति बनाई थी। कम से कम हाल के क़दमों से तो ऐसा ही लग रहा है।

राजनीति में नेताओं की विचारधारा में बदलाव नई बात नहीं है। देश के राजनीतिक इतिहास के पन्ने पलटे जाएं, तो आजादी के बाद तो पूरा विपक्ष ही कांग्रेस के गर्भ से निकला है। लेकिन, वो वैचारिक मतभेदों से उपजी स्थितियाँ थीं, न कि जनप्रतिनिधियों को खरीदकर संख्या बढ़ाने की कोशिश। पार्टी के बड़े नेताओं की इस कुत्सित चालों का सबसे ज्यादा ख़मियाज़ा उन नेताओं और कार्यकर्ताओं को भुगतना पड़ता है, जिनका हक़ मारा जाता है।

मध्यप्रदेश के नज़रिए से इसका मूल्यांकन किया जाए, तो ज्योतिरादित्य सिंधिया खेमे की वजह से कई बड़े नेता मंत्री बनने से वंचित हो गए। जो किसी तरह पद पा गए, तो वे सम्मानजनक विभाग पाने से रह गए। समय गुजरने के साथ इसके उत्तरोत्तर प्रभाव और भी दिखाई देंगे। जहाँ भी उपचुनाव होना है, वहाँ तो भाजपा के सारे नेता और कार्यकर्ता उपेक्षित हो जाएंगे। उन्हें पार्टी प्रतिबद्धता की मज़बूरी के कारण बागी कांग्रेसी नेताओं के लिए चुनाव प्रचार भी करना पड़ेगा। इस स्थिति में उनकी आत्मा उन्हें जिस तरह कचोटेगी, उसका अहसास उन्हें ही होगा, जो इन हालात से गुजरेंगे। लेकिन, पार्टी से बंधे होने के कारण अपनी पीड़ा किसी को सुना भी नहीं सकते।

भाजपा के समर्पित कार्यकर्ता पार्टी हाईकमान की इस नई सत्ता संस्कृति को सहजता से स्वीकारेंगे, ऐसा लग नहीं रहा। उपचुनाव के दौरान असली भाजपा के लोगों और राजनीतिक स्वार्थ के वशीभूत भाजपा के पाले में आए लोगों में तनाव का माहौल बन सकता है। क्योंकि, दोनों पार्टियों की चुनाव शैली में काफी फर्क है। जब दोनों में टकराव होगा, तो भाजपा कार्यकर्ताओं को किनारे होना पड़ेगा। क्योंकि, चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार का झुकाव उन लोगों की तरफ ज्यादा होगा, जो उसके साथ कांग्रेस छोड़कर आए हैं।

ऐसे में भाजपा संगठन का रुख ही निर्धारित करेगा कि उसकी नजर में प्रतिबद्धता की कीमत क्या है। उसे बरसों का साथ निभाने वाले साथियों की जरूरत है या उन मौकापरस्तों की जिनकी प्रतिबद्धता की कीमत कभी भी लगाई सकती है। जो आज भाजपा हाथों बिके हैं, वो कल किसी और के पाले में भी जा सकते हैं। लेकिन, तब भाजपा के उन तपोनिष्ठ कार्यकर्ताओं का क्या होगा, जिनके दिल में उपेक्षा की फांस गड़ गई है।