अजय बोकिल

केरल के तिरुअनंतपुरम नगर निगम की पहली युवतम महापौर (मेयर) आर्या राजेन्द्रन का चुना जाना केवल इसलिए खबर नहीं है कि वो मात्र 21 वें साल में इस अहम पद के लिए चुनी गई हैं, बल्कि इसलिए भी है कि वाम दलों को इस बात का अहसास हो रहा है कि राजनीतिक पार्टी को धड़कता रखने के लिए युवा खून को समय रहते आगे बढ़ाना कितना जरूरी है। वरना पश्चिम बंगाल में 34 साल तक सतत शासन करने वाली इस पार्टी में लोग युवा चेहरों को अहम पदों पर देखने के लिए तरस गए थे। वहां आज यह पार्टी चौथे नंबर पर है। इसका एक मुख्य कारण यह भी है कि वक्त रहते पार्टी की नसों में खून का न बदला जाना। हालांकि यह सही है कि लेफ्‍ट पार्टियों में नए खून को आगे बढ़ाने की एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है, लेकिन इतनी भी देरी क्या कि युवाओं की राजनीतिक रुचि का क्षितिज ही बदल जाए।

आर्या राजेन्द्रन माकपा से जुड़ी हैं और अभी बीएससी की दूसरे वर्ष की छात्रा हैं। वो तिरुअंनतपुरम नगर निगम के मुदावनमुगल वार्ड से निर्वाचित हुई हैं। आर्या की जगह पहले जमीला श्रीधरन को मेयर बनाने की बात थी, लेकिन युवा चेहरों को आगे बढ़ाने के तहत आर्या को मेयर बनाने का फैसला लिया गया। आर्या सीपीएम की बाल शाखा ‘बाल संघम’ की अध्यक्ष भी हैं। वो एसएफआई की राज्यसमिति की सदस्य भी रही हैं। केरल में महापौर का चुनाव सीधे नहीं होता। वहां पार्षद ही मेयर का चुनाव करते हैं।

यानी आर्या ने शायद वोट भी पहली दफा डाला और पहली बार में वो चुनी भी गईं। उन्‍होंने एक इंटरव्यू में कहा कि वो सबसे ज्यादा शहर में अवशिष्ट प्रबंधन पर ध्यान देंगी। साथ ही सभी वार्डों में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की हालत सुधारने को प्राथमिकता देंगी ताकि लोग वहां इलाज के लिए बेहिचक जाएं। आर्या दस साल से सीपीएम से जुड़ी हैं तथा मानती हैं कि युवाओं को अपनी स्पष्ट राजनीतिक विचारधारा रखनी चाहिए। हालांकि आर्या को महापौर पद के लिए चुने जाने के पीछे एक कारण यह भी बताया जाता है कि हाल के नगर निगम चुनाव में एलडीएफ से महापौर पद की दो संभावित उम्मीदवारों में से एक एस. पुष्पलता कुन्नकुजी वार्ड से चुनाव हार गईं। उन्हें भाजपा के अजीत कुमार ने हराया।

मेयर पद की दूसरी संभावित प्रत्याशी ओजी ओलीना को यूडीएफ की मेरी पुष्पम ने पराजित किया। ऐसे में सत्तारूढ़ एलडीएफ ने आर्या को आगे बढ़ाने का निर्णय‍ किया। इस नगर निगम चुनाव में सत्तारूढ़ वाम मोर्चा 51 सीटें जीतकर सत्ता में आया। लेकिन भाजपा को भी संभवत: पहली बार 6 सीटों पर जीत मिली है। वैसे आर्या का मेयर बनना इसलिए भी अहम है, क्योंकि तिरुअनंतपुरम 153 साल पुराना नगर निगम है।

हालांकि आर्या ही देश की पहली सबसे युवा मेयर नहीं है। उनके पहले यह रिकॉर्ड 2009 में राजस्थान में सुमन कोली ने भरतपुर नगर निगम की मेयर चुनी जाकर बनाया था। वो भी 21 साल की थीं। इसी तरह महाराष्ट्र में नवी मुंबई नगर निगम के युवतम मेयर संजीव नाइक चुने गए थे, तब वे मात्र 23 साल के थे। संजीव एनसीपी के टिकट पर चुने गए थे और लगातार 3 बार महापौर रहे। तमिलनाडु में रेखा प्रियदर्शिनी 2006 में जब सलेम नगर निगम की मेयर निर्वाचित हुईं तब वो 24 बरस की थीं। डीएमके के टिकट पर चुनी गईं रेखा दलित समुदाय से थीं। यूपी के फिरोजाबाद नगर निगम की नूतन राठौर 2017 में मेयर चुनी गई थीं, तब वह 31 साल की थीं। पिछले साल तेलंगाना में एक युवा महिला मेकला काव्या जवाहरनगर नगर निगम की महापौर चुनी गई थीं। वो 26 वर्ष की हैं।

लेकिन यहां अहम बात है राजनीतिक जिम्मेदारियों के लिए नए और ताजगी भरे चेहरों को चुनना, उन पर दांव खेलना। इस मायने में लेफ्‍ट का रिकॉर्ड बहुत उत्साहवर्द्धक नहीं दिखाई देता। चेहरों को बदलने में वहां आज भी लंबा वक्त लगता है। हालांकि बदलते वक्त के तकाजों के मद्देनजर वहां भी परिवर्तन के पक्ष में सोचा जा रहा है। बावजूद सबके, लेफ्‍ट में युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने और उसे अहम जिम्मेदारियां सौंपने की गति बहुत धीमी और समयसाध्य है। बताया जाता है कि माकपा की सर्वोच्च निर्णायक संस्था केन्द्रीय समिति में अंतिम बार युवा चेहरों को 1985 में शामिल किया गया था, जिनमें सीताराम येचुरी और प्रकाश करात जैसे युवा नेता थे, जो आज स्वयं बुजुर्ग नेताओं की श्रेणी में हैं।

पार्टी पोलिट ब्यूरो में भी रिटायरमेंट एज घटाने की बात हो रही है। भाजपा की तरह 75 पार के नेताओं को घर बिठाने की बात भी चल रही है। इस लिहाज से आर्या जैसे चेहरों को हरकारा बनाना अच्‍छी शुरुआत है। उसका असर कितनी दूर तक होगा, यह देखना होगा। माकपा पोलिट ब्यूरो में रिटायरमेंट एज अभी 80 साल है। आम भाषा में कहें तो पोलिट ब्यूरो में जगह मिलने तक व्यक्ति वानप्रस्‍थ की अवस्था में आ जाता है।

बेशक लेफ्ट में युवाओं को आगे बढ़ाने को लेकर चिंता तो है, लेकिन इस काम में वैसी तेजी और साहस कम ही दिखाई देता है, जैसा कि आज भाजपा या कुछेक अन्य पार्टियों में दिखाई देता है। शायद यही कारण है कि बंगाल जैसे राज्यों में सीपीएम का कैडर राजनीतिक रूप से धुर विरोधी भाजपा और तृणमूल कांग्रेस की तरह आकर्षित हो रहा है। हालांकि पश्चिम बंगाल में लेफ्‍ट ने भी खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए आक्रामक सोशल मीडिया रणनीति पर काम शुरू किया है। युवाओं को वाम विचारधारा समझाने के ‍लिए ट्विटर पर #बंगालनीड्सलेफ्‍ट और #लेफ्टआल्टरनेटिव जैसे कैम्पेन चलाए जा रहे हैं। कोशिश यही है कि राज्य के युवाओं में फिर से पैठ कैसे बनाई जाए, जो पार्टी एक दशक पहले खुद गंवा चुकी है।

पिछले दिनों बंगाल में सीपीएम की एक आं‍तरिक‍ चिट्ठी चर्चा में रही थी, जिसमें इस बात को लेकर चिंता जताई गई थी कि पार्टी के कई युवा कार्यकर्ता तृणमूल और भाजपा की ओर आ‍कर्षित हो रहे हैं। इसमें यह भी कहा गया था कि 18 से 31 वर्ष की उम्र के लोगों में वाम विचारधारा का असर तेजी से घट रहा है। यही वो आयु वर्ग है, जो मैदानी लड़ाई लड़ने तथा चुनाव प्रचार करने में सबसे आगे रहता है। इसके पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि पार्टी के पास ऐसा कोई मुद्दा नहीं है, जो समकालीन राजनीति में दमदार तोड़ साबित हो सके।

बंगाल में भाजपा ध्रुवीकरण की आक्रामक राजनीति कर रही है तो तृणमूल बंगाली बनाम गैर बंगाली की सियासत में जुटी है। ऐसे में आज जरूरत केवल युवा चेहरों और नए मुददों की ही नहीं है, उस भाषा और मुहावरे की भी है, जो आज के युवाओं की भाषा है, जिसे वो आसानी से समझते हैं। ऐसे में आर्या जैसी युवा नेत्री को तिरुअनंतपुरम नगर निगम की कमान सौंपना इस बात की स्वीकारोक्ति है कि वक्त के झोंके बहुत तेजी से बदलते हैं। हम उस युग में हैं, जब वाट्स एप पर प्रेम हो सकता है और तलाक भी। ये वो पीढ़ी है, जो रिमोट पर दो मिनट में चार चैनल बदलती है। उसमें समझ की कमी नहीं है, लेकिन धैर्य और संयम की उसकी अपनी परिभाषा है।

‘धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय’ वाला समय अब गया। अवसर जल्द से ‍जल्द मिलें और नतीजे भी फौरन दिखें। यह तर्क दादी के नुस्खे जैसा है कि भई आप के पास उम्र है, फिर इतनी जल्दी किस बात की? हमारा वक्त गुजर जाने दो। फिर तुम्हारा भी आएगा। इसी सोच ने देश में लंबे समय से जमी सत्ताएं गंवाई हैं तो मप्र जैसे राज्य में लंबे वक्त के बाद हाथ आई सत्ता को बर्फ की तरह फिसल जाने दिया है। बेशक राजनीतिक लड़ाइयां हमेशा लंबी होती हैं, लेकिन उसे लड़ने के तरीके समय सापेक्ष होने चाहिए।

निस्संकोच आज के दौर में भाजपा ने इस निर्णायक सूत्र को संकल्पशक्ति के साथ पकड़ा है। इसके लिए उसने बुजुर्गों की नाराजी अथवा अनुभव की पालकी ढोते रहने के कर्मकांड से खुद काफी हद तक अलग करने की कोशिश की है। अगर राजनीतिक पार्टी में ही जुनूनी युवा नहीं होंगे या केवल रस्म अदायगी के लिए होंगे तो कौन सी पार्टी है जो दीर्घकाल तक सत्ता की लड़ाई को ‘धर्मयुद्ध’ के भाव से लड़ पाएगी।