राकेश अचल

लोग सरकारी आंकड़ों पर अक्सर यकीन नहीं करते, लेकिन मुझे इस बार सरकारी आंकड़ों पर ही हैरानी हो रही है। हमारे सूबे मध्यप्रदेश की विधानसभा में पेश किये गए आर्थिक सर्वेक्षण को ही यदि मानक मान लिया जाये तो आम आदमी की कमाई में हर महीने 405 रुपये की कमी आई है जबकि इस अवधि में सरकार ने पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और सीएनजी-पीएनजी के दामों में जो कुल वृद्धि की है वो इस कंगाली में आटे को लगातार गीला कर रही है।

लोक कल्याणकारी राज में सरकार एक तरफ व्यापार से हाथ खींच रही है और तमाम सार्वजनिक उपक्रमों को खुले बाजार में बेचने पर आमादा है वहीं सरकार को जनता की फ़िक्र शायद अब बिलकुल नहीं रह गयी है। अब सरकार या सरकारें नाम मांत्र की लोककल्याणकारी रह गयीं हैं, सरकारों का असल मकसद जनता के ऊपर महंगाई और करों का बोझ लादने के अलावा और कुछ नहीं रह गया है।

कोरोनाकाल में केंद्र की सरकार ने जनता को संकट से उबारने के लिए 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा की थी लेकिन इस पैकेज से जनता को कितना क्या लाभ हुआ ये मध्यप्रदेश के आर्थिक सर्वेक्षण से समझा जा सकता है। गेहूं उत्पादन के मामले में पंजाब को पीछे छोड़ चुके मध्यप्रदेश की जब ये दशा है तो दूसरे राज्यों का क्या हाल होगा, आप अनुमान लगा सकते हैं।

कोरोना के कारण अवाम की दशा किसी सरकार से छिपी नहीं है। जनता की आय कम हुई सो हुई रोजगार भी छिन गए, लोग जैसे तैसे नमक-रोटी से पेट की आग बुझा रहे हैं तो सरकार जनता पर महंगाई का बोझ बेशर्मी के साथ लादे जा रही है। एक लीटर पेट्रोल पर 33 रुपये तक का कर वसूलने वाली सरकारें अपना हिस्सा छोड़ने को राजी नहीं है। जनता जाये भाड़ में सरकार को क्या पड़ी? सरकार को अपनी आमदनी से मतलब। लोकतंत्र में ऐसी मतलबी सरकारें लोकहितकारी कैसे हो सकती हैं?

अब देश में तेल की कीमतों के अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य की बात करना ही बेमानी है। दुनिया में जब कच्चे तेल के दाम लगातार घटे हैं तब भी हमारे देश में सरकारें बेशर्मी के साथ तेल की कीमतें बढ़ाये चली जा रही हैं। सवाल ये है कि सरकार का हाथ पकडे कौन? सरकार का हाथ तो जगन्नाथ का हाथ है। कोरोनाकाल में काल के गाल में समाती आबादी अब महंगाई के मारे मर रही है। ऐसी कौन सी चीज है जिसके दाम कोरोनाकाल के रहते नहीं बढ़े। बसों का किराया बढ़ा, ट्रकों का भाड़ा बढ़ा, रेलों के किराये में तो 40 फीसदी तक की वृद्धि कर दी गयी, ये सब करते समय न सासंद को भरोसे में लिया गया और न जनप्रतिनिधियों को।

सर्वशक्तिमान सरकार के सामने सब लाचार हैं लेकिन सरकार है कि सियासत में उलझी है। सरकार ने पिछले छह माह में महंगाई को रोकने के लिए क्या कदम उठाये जनता को नहीं मालूम। जनता को इतना मालूम है कि सरकार ने किसानों के काम आने वाला डीजल और आम आदमी के काम आने वाले पेट्रोल के दामों में आँखें मूँद कर इजाफा किया। सरकार ने गृहणियों पर भी दया नहीं दिखाई। रसोई गैस की कीमत भी लगातार बढाकर आज रोटी पकाना भी मुहाल कर दिया है।

आप रेल में चल नहीं सकते, बसों में चल नहीं सकते, रेलें आपकी पहुँच से लगातार बाहर होती जा रहीं हैं और तो और अब सीएनजी, पीएनजी से चलने वाले ऑटो रिक्शा भी आम आदमी की पहुँच से बाहर करने की साजिश की जा रही है। केंद्रीय मंत्री मंहगाई को लेकर ऐसे तर्क दे रहे हैं कि जिन्हें सुनकर एक तरफ हंसी तो दूसरी तरफ रोना आता है। केंद्रीय तेल मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को प्रधानमंत्री जी ने किस विशेष योग्यता के आधार पर मंत्री बना रखा है, समझ से बाहर है।

सात साल पहले 2014 में देश की जनता को ‘अच्छे दिनों’ का ख्वाब दिखाकर सत्ता में आयी भाजपा कुर्सी से चुंबक की तरह चिपकी है। सत्ता में बने रहने के लिए जो राजनीतिक पाप भाजपा कर रही है उनमें से अधिकांश अक्षम्य हैं। लेकिन दुर्भाग्य ये है कि हमारी जाब्ता-फौजदारी की धाराओं में इस तरह के जुर्म के लिए सजा का कोई प्रावधान नहीं है। जनता के हाथ में मौका है कि वो अगले महीनों में अनेक राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के जरिये अपनी पीड़ा से सरकार को अवगत कराये। सत्ता ने तो जनता से उसके प्रतिकार का हथियार बहुत पहले ही छीन लिया है और अब लगता है कि बारी जीवन के अधिकार को छीने जाने की है।

जनता का गणित बहुत कमजोर होता है, उसे नहीं पता कि तेल की कीमतें 58 फीसदी बढ़ चुकी हैं, वाहन चलाना 30 फीसदी महंगा हो चुका है जबकि आमदनी लगातार घटती जा रही है। देश की दुर्दशा के लिए कोरोना से ज्यादा अब सरकार जिम्मेदार दिखाई देने लगी है। कोरोना पर तो किसी सरकार का जोर नहीं था, किन्तु कीमतें तो बढ़ने से रोकी जा सकती थीं, जो सरकार ने नहीं रोकीं। सरकार बढ़ती कीमतों को आखिर रोके भी क्यों? कारोबार करना सरकार का काम थोड़े ही है। कीमतों का सीधा रिश्ता बाजार से है, सो बाजार जाने और जनता जाने।

बढ़ती कीमतों के खिलाफ जनता सड़कों पर आ नहीं सकती, अदालतों में जा नहीं सकती। सत्याग्रह करे तो सरकार की सेहत पर उसका कोई असर होता नहीं है, ऐसे में आखिर देश का भविष्य कैसा होगा? क्या मौजूदा स्थिति इसी तरह जनता का मांस-मज्जा नोच-नोच कर खाती रहेगी। देश को विश्वगुरु बनाने वाले, देश का डंका विदेशों में बजाने वाले, 56 इंच के सीने वाले हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी ने आखिर जनता को इस संकट से बचाने के लिए सोचा क्या है? सरकार इस मुद्दे को हल्के में क्यों ले रही है? क्या सरकार मंहगाई के जरिये जनता का मान-सम्मान कुचलके उसे त्रिशंकु बना देना चाहती है।

देश और दुनिया में कोरोना का टीका आने के बाद भी कोरोना की वापसी होती दिखाई दे रही है। मुझे आशंका है कि कोरोना का दूसरा दौर पहले से अधमरी हो चुकी जनता और देश की अर्थव्यवस्था को चौपट कर देगा। इसलिए जरूरी है कि जनता इस अंधेरनगरी और चौपटराज के खिलाफ कमर कसकर खड़ी हो। जन संघर्ष ही मौजूदा समस्या का इकलौता निदान है।(मध्‍यमत)
डिस्‍क्‍लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं।

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