राकेश अचल

आज सियासत पर कोई बात नहीं करूंगा। आज किसी  चौकीदार को भला-बुरा कहने का मन नहीं है, क्योंकि आज  मन-मष्तिष्क पर झारखंड के माझी छाये हुए हैं। आपको  बिहार के दशरथ मांझी तो याद होंगे ही जिन्होंने पत्नी के लिए पहाड़ काटकर 360 फीट लंबी सड़क बना दी थी। धुन के पक्के दशरथ को इस काम में पूरे 22 साल लगे लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। हार न मानने वाले झारखंड के ही धनंजय भी दशरथ माझी के अनुयायी निकले और उन्‍होंने भी अपनी पत्नी के लिए कुछ ऐसा ही कमाल कर दिखाया। प्रेम मनुष्य से ताजमहल ही नहीं बनवाता बल्कि पहाड़ भी कटवाता है और हजारों किमी सड़कें भी नपवाता है।

धनंजय रहने वाले तो झारखंड के हैं, वे गोड्डा से 1176 किलोमीटर ग्वालियर में अपनी पत्नी सोनी को परीक्षा दिलाने पहुंचे हैं। पत्नी सोनी हेम्ब्रम यहां डिलेड सेकंड इयर की परीक्षा दे रही हैं। सोनी 7 माह की गर्भवती हैं, धनंजय अपनी गर्भवती पत्नी को स्कूटी से लेकर ग्वालियर पहुंचे हैं,  क्योंकि ट्रेन अभी चल नहीं रही है। आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि गाड़ी से लेकर आते।

धनंजय की मजबूरी ये थी कि कोरोना की वजह से गोड्डा से ग्वालियर आने के लिए अभी कोई साधन नहीं था,  ट्रेन भी बंद है। घर की हालत धनंजय की ऐसी नहीं है कि कोई प्राइवेट गाड़ी से परीक्षा दिलाने ले आते। पत्नी की इच्छा थी कि परीक्षा नहीं छूटे। वह डीलेड कर शिक्षक बनना चाहती है। वहीं,  पति गुजरात की एक कंपनी में कुक का काम करता है। लॉकडाउन की वजह से नौकरी चली गई। 3 महीने से घर पर आकर ही बैठा हुआ था। बचे हुए पैसे खर्च हो गए थे।

एक तरफ पत्नी का सपना था और दूसरी तरफ धनंजय की गरीबी, लेकिन सपना जीता, गरीबी हार गयी। धनंजय ने अपनी पत्नी के सपने को साकार करने के लिए गोड्डा से ग्वालियर स्कूटी से ही आने का फैसला किया। तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए धनंजय स्कूटी से पत्नी सोनी हेम्ब्रम को लेकर ग्वालियर जा पहुंचे। रास्ते में कई तरह की परेशानियां हुईं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। धनंजय को ग्वालियर पहुंचने के लिए बिहार,  यूपी और एमपी के विभिन्न पहाड़ी और मैदानी रास्तों से गुजरना पड़ा।

धनंजय कहते हैं कि ग्वालियर आने के लिए कुछ प्राइवेट बस मिली थी, किन्तु बस का किराया 15 हजार रुपया प्रति व्यक्ति था। कहाँ से लाता इतना पैसा। धनंजय ने ट्रेन में टिकट बुक कराई थी लेकिन ऐन वक्त पर ट्रेन रद्द हो गई। धुन के पक्के धनंजय अपनी पत्नी को स्कूटी पर बैठाकर 28 अगस्त को गोड्डा से चले थे। 30 अगस्त को रुकते-रुकते ग्वालियर पहुंच गए।

धनंजय परीक्षा खत्म हो जाने के बाद स्कूटी से ही गर्भवती पत्नी को लेकर गोड्डा लौटेंगे। इस दंपति के सामने आज भी आर्थिक चुनौती है। लेकिन पत्नी सोनी हेम्ब्रम की जिद है कि उसे शिक्षक बनना है। धनंजय खुद 10वीं भी पास नहीं है। अपनी पत्नी के इस सपने को किसी भी तरह से साकार करना चाहते हैं।

धनंजय की कहानी हमारी व्यवस्था पर तमाचा है। क्या झारखण्ड में सोनी के लिए अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था नहीं है जो उसे मध्यप्रदेश आना पड़ा? क्या केंद्र सरकार को पता नहीं है कि ट्रेनें बंद होने से कितने धनंजय और सोनी असहाय हैं? क्या ऐसी विषम स्थितियां बीते पचपन साल की तो छोड़िये छह साल की केंद्र सरकार की उपलब्धियों की हकीकत बयान नहीं करतीं? मुझे पता है कि ऐसे तमाम सवालों के जवाब न सड़क पर मिलेंगे और न संसद में। ऐसे सवालों को जनता को खुद हल करना पडेगा। सरकारें केवल मोरों को दाना चुगाने का काम कर सकतीं हैं वे दशरथ और धनंजय माझी के बारे में नहीं सोच सकतीं। सरकार की  प्राथमिकताओं में ऐसे माझी हैं ही नहीं, मीडिया है ही नहीं।

दशरथ और धनंजय की कहानी में बहुत मामूली सा फर्क है, लेकिन इस फर्क से सरकार के मिजाज पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। सरकारें ऐसे किस्सों-कहानियों पर फ़िल्में बना सकती है, डाक टिकिट जारी कर सकती है, पद्म सम्मान दे सकती है लेकिन जो व्यवस्था ये माझी और उन जैसे लोग चाहते हैं वो नहीं कर सकती। मैं ईश्वर से प्रार्थना करूंगा कि सोनी परीक्षा में पास हो, शिक्षक बने और धनंजय की मेहनत को और सुनहरा कर दे, ताकि आने वाले दिनों में धनंजय जैसे लोग या धनंजय की पीढ़ी अपने पांवों पर खड़ा होना सीख ले। क्योंकि सरकारों को तो शर्म आने वाली नहीं है।