राकेश अचल

कश्मीर में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के हालिया दौरे से देश को बड़ी उम्मीदें हैं। दो साल पहले खंड-खंड किये गए कश्मीर में 1990 जैसे हालात बनने के बाद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह अपने दौरे के दौरान पहली बार स्थानीय नौजवानों को भविष्य की क्रोनोलॉजी समझाते नजर आये,  इस क्रोनोलॉजी को पूरे देश को भी समझना चाहिए, क्योंकि ये क्रोनोलॉजी कश्मीर में अतीत में हुए ‘क्राइम’ से निबटने के लिए बनाई और समझाई जा रही है।

कश्मीर में पंडितों के साथ ही गैर कश्मीरी मजदूरों की हत्या और पलायन के साथ ही बढ़ती आतंकी गतिविधियों से कश्मीर समेत पूरा देश सहमा हुआ है। पूरा देश जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने के केंद्र के फैसले का समर्थन कर ठगा हुआ महसूस कर रहा है। क्योंकि इस सीमावर्ती इलाके के हालात में कोई तब्दीली नजर ही नहीं आ रही। धारा 370 हटाने के फैसले का देश ने समर्थन किया था किन्तु इस सूबे का विभाजन सरकार ने अपनी मर्जी या सूझबूझ से खुद कर लिया,  पर इसके कोई सुखद परिणाम सामने नहीं आये।

जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक भविष्य को लेकर दो साल से अनिश्चय की स्थित बनी हुई है। पिछले 75 साल में देश में नए राज्य तो बने थे किन्तु किसी जन्मजात राज्य से उसका राज्य का दर्जा नहीं छीना गया था। केंद्र सरकार ने राज्य से आतंकवाद का साया खत्म करने के लिए ये जोखिम भी उठाया, लेकिन नतीजा ठन-ठन गोपाल ही रहा। जम्मू-कश्मीर की वादियों में आज भी पहले की तरह बारूद की दुर्गन्ध फैली हुई है। पहले की तरह खून बह रहा है। शांति न जाने कहाँ जान बचाये  बैठी है। राज्य की जनता से किये गए वादे को पूरा करने के लिए केंद्र दो साल में भी कुछ ख़ास नहीं कर सका।

जम्मू-कश्मीर के विभाजन पर केंद्र से मेरी तरह औरों की असहमति हो सकती है लेकिन राज्य में शांति स्थापना के मुद्दे पर पूरा देश एक था बावजूद इसके केंद्र इस मसले पर सियासी क्राइम तो कर गुजरा लेकिन समस्या का उपचार उसके पास न कल था न आज है। अब केंद्रीय गृहमंत्री जी की क्रोनोलॉजी से कुछ उम्मीद बंधती नजर आ रही है। केंद्रीय गृहमंत्री जी संघ दक्ष होने के साथ ही चाणक्यवादी भी हैं। उन्हें भाजपा का चाणक्य कहा जाता है। कम से कम मुझे तो उनके चाणक्य होने से कोई आपत्ति नहीं है। देश के लिए अतीत में चाणक्य नीति आदर्श मानी गयी है। किन्तु चाणक्य नीति का कुछ प्रतिसाद तो सामने आये!

अपने विशिष्ट अंदाज में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने दहशतगर्दी का शिकार हुए युवाओं को भरोसा दिलाते हुए कहा कि कश्मीर में युवाओं को मौका मिले इसलिए अच्छा डिलिमिटेशन (परिसीमन) भी होगा, डिलिमिटेशन के बाद चुनाव भी होगा और फिर से राज्य का दर्जा भी वापस मिलेगा। उन्‍होंने कहा कि कश्मीर को भारत सरकार से मदद आती है,  आनी भी चाहिए,  बहुत सहा है कश्मीर ने। परन्तु एक दिन ऐसा ज़रूर आएगा जब कश्मीर भारत के विकास के लिए योगदान करेगा। लेने वाला नहीं,  भारत को देना वाला प्रदेश बनेगा।

केंद्रीय गृहमंत्री की इस घोषणा पर उनके मुंह में घी-शक़्कर भरी जाना चाहिए,  लेकिन सवाल ये है कि उन्होंने जो कहा है वो होगा कब? क्या ये सब करने के लिए भी वे किसी शुभ मुहूर्त की तलाश में हैं। भाजपा ने अतीत में जम्मू-कश्मीर की सत्ता में भागीदारी की थी। पर अब वे तमाम लोग उसके साथ नहीं है। केंद्र यदि राज्य के तमाम राजनीतिक दलों को राष्ट्रद्रोही मानता है तो फिर जम्मू-कश्मीर को लेकर बनाई गयी उसकी क्रोनोलॉजी पर काम कैसे होगा। इस समय राज्य में राजनीतिक दलों और केंद्र के बीच संवादहीनता की दीवार खड़ी हुई है। शाह की क्रोनोलॉजी में इस दीवार को गिराने का कोई उपाय नहीं बताया गया है।

आजकल जो लोग टीवी नहीं देखते या अखबार नहीं पढ़ते उन्हें बता दूँ कि कश्मीर में हो रही इन हत्याओं को लेकर देशव्यापी गुस्सा है। वहां रहने वाले प्रवासी मजदूरों ने पलायन शुरू कर दिया है। इसे देखते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने स्पेशल ऑपरेशन के लिए एक टीम कश्मीर भेजी है। कहते हैं कि स्पेशल टीम यहां पर आतंक फैला रहे आतंकियों का खात्मा करेगी। विखंडित कश्मीर की मौजूदा दशा से केंद्र के भी होश फाख्ता हो चुके हैं। केंद्र ने सभी जिला पुलिस प्रमुखों को सन्देश भेजा है कि वह गैर-कश्मीरी लोगों को सुरक्षा दें। ऐसे गैर स्थानीय मजदूरों को तत्काल नजदीकी पुलिस थाने या केंद्रीय अर्धसैनिक बल या सेना के प्रतिष्ठानों में लाया जाए, ताकि उनकी जानमाल की सुरक्षा की जा सके। गैर-स्थानीय मजदूरों की सुरक्षा के लिए दस जिलों को भेजे गए निर्देश में लिखा है कि इस मामले को अत्यंत गंभीरता से लें।

पिछले दिनों मैंने कहा था कि राज्य के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा फेल हो चुके हैं, उन्हें वापस बुला लेना चाहिए। राज्य के पूर्व उपराज्यपाल सतपाल मलिक ने भी मेरी बात की परोक्ष रूप से पुष्टि की है। मलिक का कहना है कि उनके कार्यकाल में आतंकी राज्य में घुस नहीं पाते थे। अब देखना ये है कि केंद्रीय गृहमंत्री के इस तीन दिवसीय दौरे के बाद केंद्र अपनी प्रशासनिक मशीनरी में भी कुछ फेरबदल करता है या नहीं?  उम्मीद की जा रही है कि शाह का दौरा अल्पसंख्यकों में भरोसा जगा सकता है। ऐसे में शाह के दौरे के जरिए पाकिस्तान को ये संदेश देने की कोशिश भी होगी कि वो कितना ही आतंक फैलाए,  भारत अपने लोगों का हौसला डिगने नहीं देगा।

केंद्र सरकार का ‘मिशन कश्मीर’ क्या है ये केंद्र के अलावा केवल भगवान जानता है। जनहित में इसे जनता को बताया नहीं जा सकता, इसके सबूत भी नहीं मांगे जा सकते। मांगना भी नहीं चाहिए क्योंकि ये एक बेहद संवेदनशील मुद्दा है,  किन्तु सरकार को कुछ न कुछ करके दिखाना ही होगा,  अन्यथा कश्मीर मुद्दे पर नाकामी का जो ठीकरा आज की सरकार अपनी पूर्ववर्ती सरकारों के सर फोड़ती आयी है वो ही ठीकरा उसके भी माथे पर फोड़ा जा सकता है। हम केंद्र के ‘मिशन कश्मीर’ का स्वागत करते हैं। उम्मीद करते हैं कि ये मिशन कामयाब हो,  ताकि जम्मू-कश्मीर को लेकर अतीत में जो क्राइम हुआ है उसके प्रायश्चित के रूप में तैयार की गयी ‘क्रोनोलॉजी’ असरदार साबित हो सके।(मध्यमत)
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