राकेश अचल

राजनीतिक बदला लेने के लिए दल-बदल का खतरनाक और असंवैधानिक खेल अब चरम पर है। क्या इस खेल को लोकतंत्र की शुचिता बनाये रखने के लिए फौरन बंद नहीं होना चाहिए? अरुणाचल के बाद मणिपुर में जेडीयू के पांच विधायकों के भाजपा में शामिल होने के बाद ये सवाल फिर जिन्दा हो गया है।

दल-बदल रोकने के लिए हमारे पास क़ानून है, लेकिन न के बराबर है, क्योंकि इस दल-बदल क़ानून से इस राजनीतिक कैंसर को अब तक रोका नहीं जा सका है। दल-बदल क़ानून नौवें दशक में आयाराम-गयाराम की अनैतिक घटनाओं के बाद जरूरत समझा गया। दल-बदल क़ानून एक मार्च 1985 में अस्तित्व में आया, ताकि अपनी सुविधा के हिसाब से पार्टी बदल लेने वाले विधायकों और सांसदों पर लगाम लगाई जा सके। 1985 से पहले दल-बदल के ख़िलाफ़ कोई क़ानून नहीं था। बीते 37  साल में ये क़ानून बहुत कम असरदार साबित हुया, इस वजह से दल-बदल का ‘कर्क’ रोग लगातार बढ़ता गया।

जिस कांग्रेस के जमाने में दल-बदल शुरू हुआ था, उसी कांग्रेस ने इसे रोकने के लिए क़ानून बनाया था। लेकिन आज ये क़ानून बड़ी ही बेशर्मी के साथ कांग्रेस समेत सभी राजनीतिक दलों के के द्वारा अपमानित किया जा रहा है। भाजपा ने तो दल-बदल को राजनीतिक शत्रुता का प्रमुख औजार बना लिया है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि भाजपा कार्यालयों के बाहर दल-बदलुओं के लिए ‘स्वागतम’  का बैनर हमेशा लटका रहता है। भाजपा ने बीते 8 साल में सर्वाधिक दल-बदल कराया या उसे स्वीकार किया है।

अरुणाचल के बाद मणिपुर में अभी दल-बदल की क्या जरूरत थी? लेकिन चूंकि जेडीयू को नीचा दिखाना था इसलिए वहां भी दल-बदल करा दिया गया। इस साल फरवरी-मार्च में हुए मणिपुर विधानसभा चुनाव में जेडीयू ने कुल 38 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। इसमें छह सीट पर उसे जीत मिली थी। अब जेडीयू के 5 विधायक अपने गले में भाजपा का दुपट्टा डालकर खड़े हैं। दल-बदल से जेडीयू के साथ-साथ वो जनता भी अपमानित हुई है जिस जनता ने इन बिकाऊ लोगों को चुना था। जनता का इसमें कोई दोष नहीं है,उसे क्या पता कि वो जिन लोगों पर भरोसा कर रही है वे बिकाऊ हैं!

पिछले महीने बिहार में बीजेपी और जेडीयू के रास्ते अलग-अलग होने के बाद यह कदम उठाया गया है। चर्चा थी कि बिहार में अलग होने के बाद जेडीयू मणिपुर में एन बीरेन सिंह के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार से समर्थन वापस लेने की योजना बना रही है। जेडीयू की इस योजना को नाकाम करने के लिए उसके विधायकों को खरीदा जाना अनिवार्य हो गया था। भाजपा ने ये काम कर दिखाया क्योंकि अब केवल यही एक पार्टी है जो विधायकों  को खरीदने में सिद्धस्त है। भाजपा किसी भी कीमत पर किसी भी विधायक को खरीदने का माद्दा रखती है।

दल-बदल के जरिये सरकारें बनाई और बिगाड़ी जा रही हैं, ये लोकतंत्र को लगातार कमजोर करने वाली कोशिश हैं। क़ानून इसके सामने बौना साबित हुया है। अब उम्मीद भी नहीं है कि कोई इस दल-बदल क़ानून को संशोधित, संवर्धित करने के बारे में सोचेगा। मौजूदा कानून को लोग अपनी सुविधा के अनुसार परिभाषित करते हैं, इस्तेमाल करते हैं। इस मामले में अदालतों की भूमिका पर कोई टिपण्णी करना ही व्यर्थ है,क्योंकि अधिकांश फैसले मुंह देखकर किये जाने लगे हैं।

अब सवाल ये है कि ये अनैतिक खेल कब तक चलेगा आखिर? राजनीति अब नैतिकता से कोसों आगे निकल चुकी है। अब राजनीति अदावत का दूसरा नाम है। दल-बदल करने और कराने को अब सिर्फ कर्मकांड माना जाता है, अपराध नहीं। अपराध तो जनता करती है जो बिकाऊ लोगों को चुनती है। दल-बदल रोकने के लिए दल-बदल का निषेध करने के लिए बनाये गए क़ानून में संशोधन जरूरी है। जन-प्रतिनिधियों से विलय का प्रावधान छीने जाने की जरूरत है। अब केवल इस्तीफा ही एकमात्र विकल्प होना चाहिए। ऐसे जन-प्रतिनधि भविष्य में चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिए जाएँ तो शायद इस बीमारी पर रोक लगे, लेकिन बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन?

राजनीतिक बदले के लिए बिहार में जेडीयू के भाजपा से अलग होते ही सबसे पहले वहां ईडी का इस्तेमाल किया गया, अब विधायकों को दल-बदल करा दिया, लेकिन क्या इससे कुछ हासिल हो सकता है? जेडीयू के सुप्रीमो अब कांग्रेस के राहुल गांधी के बाद भाजपा के लिए दूसरी बड़ी चुनौती बन गए हैं और भाजपा हर चुनौती को साम-दाम, दंड और भेद से समाप्त कर देना चाहती है। लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा। भाजपा ने कांग्रेस को समूल नष्ट करने की कोशिश भी करके देख ली पर नाकाम रही, लेकिन उसका हौसला अभी बना हुआ है।

दल-बदल रूपी बेशर्म का पौधा हरा-भरा बनाये रखने के लिए सभी दलों के साथ ही भाजपा की भूमिका प्रणम्य है। प्रणम्य हैं भाजपा के अध्यक्ष और शीर्ष नेता जो दल-बदलुओं की आरती उतारने के लिए हमेशा थाली सजाये खड़े नजर आते हैं। मुझे लगता है कि दल-बदल को अब क़ानून नहीं जनता ही रोक सकती है। जनता को ही ऐसे लोगों की शिनाख्त करना पड़ेगी। ऐसे बिकाऊ लोगों के खिलाफ लोकनिंदा अभियान चलाना होंगे बेहतर हो कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ही ये अभियान चलाये क्योंकि सच्चा राष्ट्रवादी संगठन यही है।

आपको याद होगा कि ऐसे मामलों में अदालतें या तो संबंधित पक्षकारों को उनकी सुविधा के हिसाब से समय देती हैं या फिर फैसले। बहुत कम उदाहरण हैं जहां दल-बदल करने वाले किसी जन-प्रतिनिधि को दण्डित किया गया हो। ऐसे लोग जो लोकतंत्र के साथ मजाक करते हैं उन्हें दण्डित करना जरूरी है। जब ये काम अदालतें नहीं करतीं तो जनता को ये काम खुद अपने हाथ में लेना चाहिए। दल-बदल करने वालों को ही नहीं बल्कि दल-बदल कराने वालों को भी दण्डित करना चाहिए। चुनाव इस काम के लिए सबसे शुभ अवसर होता है, आने वाले दिनों में फिर चुनाव ही चुनाव हैं। आइये मिल-जुलकर इन दलबदलुओं और उनके खैरख़्वाहों को सबक सिखाएं…