राकेश अचल

लोकतंत्र में सियासत अब एक खेल बन गया है। अब ‘जनादेश’, ‘जनमत’ या ‘जनता की संसद’ जैसे शब्दों का कोई मोल नहीं बचा है। सियासत न जनमत के सहारे है और न जनादेश के सहारे। सियासत को अब पल-पल पर अदालतों का सहारा लेना पड़ रहा है और यही सबसे दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। देश में ये सब आजकल में नहीं हुआ है लेकिन अब स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है। अब तो बिना अदालत के सियासत करना असम्भव सा लगने लगा है।

सियासत में मतभेदों और कुरसी हथियाने के हथकंडों के चलते विवाद लगातार बढ़ रहे हैं। आजादी के बाद से सियासी विवाद होते रहे हैं लेकिन उन्हें दलों के भीतर बैठकर सुलझाया जाता रहा है, लेकिन कांग्रेस के शासन में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को चुनौती के बाद से लगता है प्रत्येक विवाद का फैसला अदालत से माँगा जाने लगा है। सियासत और अदालत के बीच के रिश्ते जब बिगड़े तो देश ने ‘आपातकाल’ का दुःस्वप्न भी देखा लेकिन अब स्थिति और भयावह हो गयी है।

देश में जैसे-जैसे कुरसी के प्रति ललक बढ़ रही है,विवाद भी बढ़ रहे हैं। विवादों की एक लम्बी सूची है, इसलिए अतीत में न जाते हुए मै मौजूदा विवादों का ही जिक्र करना चाहूंगा, खासतौर पर राजस्थान के विवाद का। राजस्थान में किस्सा कुरसी का शुरू होने से पहले कर्नाटक और मध्यप्रदेश में ये नाटक हो चुका है। जनता के आदेश से चुनी गयी सरकारों को अस्थिर कर उन्हें हथियाने के लिए रची जाने वाली साजिशों के खिलाफ जब राजनितिक दल कोई रास्ता नहीं निकाल पाते तो उन्हें अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। ख़ास बात ये है कि हमारी अदालतें भी किसी को निराश नहीं करतीं।

राजस्थान में पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट की बगावत के चलते राजस्थान की गहलोत सरकार संकट में आ गयी। दोनों गुटों के बीच लुका-छिपी का खेल शुरू हुआ। पहले समझाइश और फिर बाद में धमकियों का दौर चला। बाद में जब विधानसभा अध्यक्ष ने बाग़ी विधायकों को नोटिस दिया तो मामला पहले हाईकोर्ट में और बाद में सुप्रीम कोर्ट में पहुँच गया। सरकार बनाने के लिए जनादेश देने वाली जनता तमाशबीन बनी हुई है। पूरे ग्यारह दिन से राज्य की सरकार त्रिशंकु बनी हुई है। अब जनादेश के साथ हो रहे खिलवाड़ पर जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ जाएगा तब कहीं जाकर तस्वीर साफ़ होगी।

कुरसी का ये किस्सा निपटाने के लिए जनता के हाथ में कोई औजार नहीं है। विधानसभा अध्यक्ष के अधिकारों को अदालत में चुनौती दी गयी है। खुद विधानसभा अध्यक्ष अदालत पहुँच गए हैं। बाग़ी विधायकों का भविष्य किसी को पता नहीं है और जब तक अदालत का फैसला नहीं आ जाता तब तक ये पता भी नहीं चल पायेगा की राजस्थान में सरकार रहेगी या जाएगी।

कुल मिलकर पानी सर के ऊपर से निकल रहा है। सब कुछ डूबने वाला है। इसके लिए न जनता दोषी है और न देश की अदालतें, दोषी हैं तो सिर्फ और सिर्फ कुरसी प्रेमी नेता। पहले सत्ता हथियाने के लिए निर्वाचित सरकारों को राष्ट्रपति शासन लगाकर हटा दिया जाता था, अब विधायकों की खरीद-फरोख्त कर ये काम हो रहा है। बदनीयती दोनों के पीछे है।

अदालती निर्देशों के सहारे चलने वाली सरकारें जनादेश की सरकारें होती हैं ये मानने को मैं तो तैयार नहीं हूँ, क्योंकि अदालत के आदेश अलग हैं और जनादेश अलग। दोनों का घालमेल लोकतंत्र के लिए घातक है। इस समय कर्नाटक या मध्यप्रदेश में जनादेश की सरकारें नहीं हैं। ये जुगाड़ की सरकारें हैं। अदालतों की भूमिका इनमें बहुत सीमित है।  अदालतों के सामने तो जो विवाद लाये जाते हैं उन्हें उनका निराकरण करना ही पड़ता है। अदालतें समय-समय पर इस तरह के विवादों को लेकर कुरसी प्रेमियों को हड़काती रहतीं हैं, किन्तु कोई असर दिखाई नहीं देता।

राजस्थान के इतर मध्यप्रदेश के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष एनके प्रजापति अदालत के सामने मंत्रिमंडल में अनुपात से ज्यादा भर्ती का मामला लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुँच गए हैं। अदालत ने उनकी याचिका पर मध्यप्रदेश सरकार को नोटिस भी दे दिया है, सवाल ये है कि क्या सियासी विवादों का हल सियासी मंचों पर ही नहीं हो सकता और यदि नहीं हो सकता तो अदालतें कब तक इनके पचड़े में फंसी रहेंगीं? क्या देश में बढ़ते सियासी विवादों को देखते हुए इनके लिए अलग से अदालतों का गठन नहीं कर देना चाहिए, ताकि काम बाढ़ के बोझ से दबी देश की तमाम छोटी-बड़ी अदालतें जनता से जुड़े गैर सियासी मामलों की सुनवाई तेजी से कर फैसले दे सकें।

सियासी मामलों के लिए अलग अदलात का विचार हास्यास्पद लग सकता है लेकिन जिस तेजी से सियासी विवाद बढ़ रहे हैं उसे देखते हुए आज नहीं तो कल इस बारे में देश को सोचना ही होगा। तय करना होगा की सियासी विवादों को जनादेश की अवमानना माना जाये या नहीं? दल-बदल या बगावत जैसे काम करने वाले जन प्रतिनिधियों को कैसे सबक सिखाया जाये, ये तो सोचना ही पडेगा, अन्यथा देश में सियासत के गधे-घोड़े बिकते रहेंगे और चुनी हुई सरकारें साल-दो साल में अस्थिर की जातीं रहेंगी।

लोकतंत्र में जनादेश से बड़ा कोई आदेश नहीं होना चाहिए। एक बार बहुमत से बनी सरकार पूरे पांच साल चलना चाहिए, इस बीच में जो जहाँ जाना चाहे, जाये लेकिन सरकार को कोई खतरा न हो। ऐसा कभी हो पायेगा, अभी कहा नहीं जा सकता, लेकिन आने वाली सियासी पीढ़ी को इस बारे में सोचना और निर्णय करना ही पडेगा।