डॉ. अजय खेमरिया

भारत में दवा और उपचार का सुगठित कारोबार जनता के व्यापक शोषण का माध्यम बन गया है। एकीकृत स्वास्थ्य नीति का भाव शोषण को बढ़ाने वाला कारक है। 140 करोड़ की आबादी वाले देश में दवा औऱ सहायक उपकरणों के कारोबार को नैतिकता के धरातल पर विनियमित करने का कोई कानूनी तंत्र ही आज तक विकसित नहीं है। नतीजतन जनता का आर्थिक शोषण तो बदस्तूर जारी है ही, साथ ही अनावश्यक दवाओं के सेवन से लीवर, किडनी के रोगियों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है।

सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका के जरिये डॉक्टरों एवं दवा कम्पनियों के जिस अनैतिक गठबंधन पर इन दिनों देश भर में चर्चा छिड़ी है वह कोई नया मामला नही है। पिछले 70 सालों से नागरिक इस त्रासदी को झेल रहे हैं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि पैरासिटामोल बनाने वाली एक कम्पनी ने डोलो 650 एमजी गोली की बिक्री बढ़ाने के लिए डॉक्टरों को एक हजार करोड़ की रिश्वत दी है। अकेले कोरोना काल मे डोलो 650 एमजी की करीब 350 करोड़ गोलियां बेची गई है।

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई कर रहे जज डी.वाई. चंद्रचूड़ ने खुद कहा कि कोविड के दौरान डॉक्टर ने उन्हें भी इसी गोली की सलाह दी थी। जाहिर है डोलो की रिकॉर्ड बिक्री सामान्य कारोबारी उछाल तो नहीं ही थी। बुनियादी सवाल अकेले डोलो 650 एमजी का नहीं बल्कि देश में दवा कारोबार के विनियमन का है। सरकार के पास इस संबंध में कोई समावेशी नीति है ही नही है। ऐसा क्यों है? इसे करीब दो लाख करोड़ से ज्यादा के दवा एवं उपकरण कारोबार के अंतर्निहित हितों के आलोक में भी देखने और समझने की आवश्यकता है।

केवल डॉक्टरों पर सवाल उठाकर हम इस संवेदनशील मामले को सतही बनाने की ही कोशिश कर रहे है। बेशक डॉक्टरों का नैतिक पक्ष कमजोर है, लेकिन बड़ा सवाल तो सरकार की नीतियों का है, जो कठघरे में नजर आ रही हैं। देश में दवा कारोबार के नियंत्रण एवं नियमन का काम डिपार्टमेंट ऑफ फार्मास्युटिकल के अधीन है। यह रसायन मंत्रालय के अंतर्गत काम करता है। एक अन्य निकाय है राष्ट्रीय औषधि मूल्य नियंत्रण प्राधिकरण (एनपीपीए) लेकिन यह भी दंडात्मक शक्तियों से विहीन है।

दवा मूल्य नियंत्रण के लिए असल मे कोई एकीकृत कानूनी व्यवस्था ही देश में मौजूद नहीं है। औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन कानून 1940 के तहत इस कारोबार को विनियमित किया जाता है। अब कानूनी स्थिति यह है कि फार्मा महकमा बेसिक दवाओं के दाम निर्धारित करता है जो किसी भी बीमारी के लिए आवश्यक माना जाता है। दवा कम्पनियां इन बेसिक दवाओं में एक दो अतिरिक्त साल्ट जोड़कर नया ब्रांड बाजार में पेश कर देती हैं और उसकी मनमानी कीमत जनता से वसूलती हैं। एक और अस्पष्ट पक्ष यह कि सरकार के निकाय केवल 500 एमजी तक की दवा के दाम तय करते है उससे ऊपर नहीं।

दावा किया गया है कि डोलो बनाने वाली कम्पनी ने इसी प्रावधान का फायदा उठाकर 650 एमजी की नई रेंज बाजार में उतारी। 500 एमजी की दर एक स्ट्रिप 2013 में 5.10 रुपए की थी जबकि आज बाजार में 650 एमजी की दर 30.91 रु है। आरोप यह भी है कि 650 एमजी डोलो का बुखार या बदन दर्द में 500 एमजी से अधिक कारगर होने के कोई साक्ष्य मेडिसिन टेक्स्ट बुक में नहीं पाए गए हैं।

अब इस मामले पर अपने-अपने पक्ष हो सकते हैं कि 650 एमजी कारगर रही है या इसके दुष्प्रभाव किडनी, लिवर पर हुए हैं।  लेकिन नीतिगत रूप से बड़ा सवाल तो दवा कम्पनियों की नैतिकता से जुड़ा है। नई चिकित्सकीय आचार संहिता 2002 डॉक्टरों को इन कम्पनियों से रिश्वत, उपहार या अन्य आदान-प्रदान प्रतिबंधित कर जुर्माने की व्यवस्था करती है, लेकिन हजारों करोड़ का कारोबार करने वाली कम्पनियां किसी भी कानूनी दायरे में इन कृत्यों के लिए जवाबदेही से बची हुई हैं।

दवा निर्माण क्षेत्र के लिए यूनिफॉर्म कोड ऑफ फार्मास्युटिकल मार्केटिंग प्रेक्टिस (यूसीपीएमपी) 2015 से बनी हुई है लेकिन यह संहिता कानूनन बाध्यकारी नहीं है। यानी दवा कम्पनियों को अपने उत्पाद बेचने के लिए देश में हर तरह की छूट मिली है। सरकार की स्थिति का अदांजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 8 जनवरी 2019 को कर्नाटक के सांसद के.सी. राममूर्ति ने जब राज्यसभा में ऐसी कम्पनियों की जानकारी मांगी जो अनैतिक रूप से काम करती हैं, तो स्वास्थ्य मंत्री अश्वनी चौबे ने सिर्फ इतना जवाब भर दिया कि औषधि विभाग को कुछ कम्पनियों के विरुद्ध शिकायत प्राप्त हुई है।

14 फरवरी 2019 को एक आरटीआई के जवाब में औषधि विभाग ने 20 कम्पनियों की सूची दी, लेकिन इनके विरुद्ध क्या कार्रवाई हुई है यह देश को बताने के लिए कोई भी तैयार नहीं है। सच्चाई यह है कि देश में दवा कारोबारियों और चिकित्सकों के मध्य कदाचारी रिश्तों पर एकतरफा कानून लागू है जो कम्पनियों के पक्ष में है। बेहतर होगा दवा कारोबार को विनियमित करने के लिए इसे स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन लाया जाए।

भारत में भी अमेरिका, जर्मनी, चीन की तर्ज पर एक एकीकृत औऱ सख्त कानून बनाये जाने की आवश्यकता है। जर्मनी में 1996 में हार्ट वाल्व स्‍कैंडल मामले में डॉक्टर को मौत की सजा सुनाई जा चुकी है। 2009 में जॉनसन एंड जॉनसन पर 2.2 बिलियन डॉलर, 2013 में फाइजर पर 2.3 बिलियन डॉलर, 2014 में ग्‍लैक्‍सो स्मिथ क्‍लाइन पर 3 बिलियन यूरो का जुर्माना लगा। इसी तरह 2018 में भी फाइजर पर अनैतिक कारोबारी गतिविधियों को लेकर 23.85 मिलियन डॉलर का जुर्माना लगाया जा चुका है। भारत में ऐसा इसलिए संभव नहीं है क्योंकि कम्पनियों के विरुद्ध ऐसे कोई कानून ही नहीं हैं।

सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन जनहित याचिका के मुताबिक देश की सात बड़ी दवा कम्पनियों ने पिछले आठ साल में 34186 करोड़ रुपया तो केवल अपने उत्पादों की मार्केटिंग पर खर्च किया है। फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल रिप्रजेंटेटिंव्‍स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अनुसार एक बर्ष में लगभग 42 हजार करोड़ रुपये की दवाएं रिटेल काउंटर से बेची गई हैं। जिनमे अधिकतर गैर जरूरतमंद औऱ उपचार के लिए असंगत श्रेणी की हैं। जाहिर है दवा कम्पनियों से जुड़ी मार्केटिंग को विनियमित करने के लिए आचार संहिता को बाध्यकारी बनाए जाने की सख्त आवश्यकता है।

दवाओं के साथ सहायक मेडिकल उपकरणों के दाम भी आवश्यकता और उपयोगिता के आधार पर विनियमित किये जाने का प्रामाणिक औऱ एकीकृत निकाय बनाने की जरूरत है। वर्तमान में लगभग 80 फीसद दवाइयां मूल्य नियंत्रण के कानूनी दायरे से बाहर हैं। इसे ह्रदय में उपयोग किये जाने वाले स्टेंट की कीमतों से समझा जा सकता है जिनकी कीमतें 2017 में नियंत्रित की गईं।

स्टेंट के साथ कोरोना में उपयोग आये पल्स मीटर, ऑक्सिमीटर, कंसंट्रेटर, ग्लूको मीटर 700 फीसदी अधिक दामों पर बेचे जा रहे थे। जिन्हें 70 फीसदी मुनाफे तक लाया गया है। वस्तुतः स्वास्थ्य सुविधाओं की कीमत तय करने में मूल्य निर्धारण व्यवस्था और बाजार की भूमिका को ईमानदारी से विश्लेषित किए जाने की आवश्यकता है।
(मध्यमत)
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