राकेश अचल 

केंद्रीय चुनाव आयोग ने भी कोरोना को ढाल बनाकर देश में होने वाले तमाम लोकसभा और विधानसभा सीटों के उप  चुनाव फिलहाल स्थगित कर दिए हैं। चुनाव आयोग ने ये निर्णय किस बिना पर लिया है ये या तो आयोग जानता है या केंद्र सरकार। मुमकिन है कि राज्य सरकारें भी इस बारे में थोड़ा-बहुत जानती हों लेकिन जनता बिलकुल नहीं जानती। उपचुनावों का स्थगन सीधे-सीधे जनता के सर्वोच्च अधिकार से जुड़ा है इसलिए केंचुआ के फैसले पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।

कोरोनाकाल में देश की सरकार ने सियासत को छोड़ अधिकांश जरूरी गतिविधियां स्थगित कर रखीं हैं, इनमें न्याय भी शामिल है। कोरोनाकाल में देश की न्यायप्रणाली सीमित रूप से काम कर रही है। आप कहीं आ-जा नहीं सकते, मनोरंजन नहीं कर सकते, खा-पी नहीं सकते यानि अपनी मरजी से जी नहीं सकते। महामारी के इस काल में आप सरकार के रहमोकरम पर हैं और ये सब इसलिए है कि सरकार आपको किसी भी कीमत पर मरने नहीं देना चाहती। अगर आप मर गए तो फिर सियासत और सत्ता का क्या होगा?

सत्ता हथियाने के लिए दलबदल के जरिये राज्य सरकारों को अस्थिर करने और उच्च सदन में अपनी ताकत बढ़ाने के लिए सरकार कोरोनाकाल में जो कुछ सम्भव है, सो कर रही है, और जहां उसे कामयाबी नहीं मिल रही वहां उसने संवैधानिक संस्थाओं का प्रत्यक्ष या परोक्ष इस्तेमाल शुरू कर दिया है। दुर्भाग्य ये है कि अब कोई संस्था निर्विवाद या संदेहों से परे नहीं रह गयी है। सब सरकार के सुर में सुर मिलाने के लिए या तो आतुर हैं या उन्हें इसके लिए विवश किया जा रहा है। इन संस्थाओं के बारे में आप अपना मुंह खोलकर अपने लिए जेल का दरवाजा खुलवा सकते हैं, लेकिन पब्लिक सब जानती है।

भारतीय चुनाव आयोग (केंचुआ) ने कुछ राज्यों में कोविड-19 महामारी और बाढ़ की स्थिति के मद्देनजर सात सितंबर तक होने वाले लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के उप-चुनाव स्थगित कर दिए हैं। जैसे ही स्थिति अनुकूल होगी वैसे ही चुनाव कराए जाएंगे। हालांकि आयोग ने कहा है कि केवल आठ सीटों पर होने वाले उपचुनाव को स्थगित किया गया है। आयोग ने यकायक ये निर्णय क्यों लिया कोई नहीं जानता। कौन सी रिपोर्ट इस निर्णय का आधार बनी ये भी किसी ने आयोग से पूछा नहीं।

आयोग के पास संविधान के अनुच्छेद 324 का एक हौज है जिसमें उतरकर वो मनमानी करना चाहता है। चूंकि इस समय कोरोना के अलावा देश की सीमाओं पर तनाव है, अर्थव्यवस्था, क़ानून और व्यवस्था बेपटरी है इसलिए सत्तारूढ़ दल नहीं चाहता कि देश में कोई भी उप चुनाव हो, क्योंकि इस समय जनता का गुस्सा सरकार के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।

मध्यप्रदेश में तो उपचुनावों के भरोसे ही भाजपा ने कांग्रेस में व्यापक पैमाने पर दलबदल कराया और अपनी सरकार बना ली। ये देश कि पहली ऐसी सरकार है जिसके 14 मंत्री विधानसभा के सदस्य ही नहीं हैं। सितंबर तक यदि ये न चुने गए तो इन्हें अपने पदों से इस्तीफा देना पड़ सकता है। किसी वर्ग विशेष को प्रतिनिधित्व देने के लिए विधानसभा के बाहर के व्यक्ति को मंत्री बनाने के उदाहरण तो हैं लेकिन पूरी फ़ौज सदन के बाहर की हो ये मध्यप्रदेश में ही हुआ है। प्रदेश सरकार ने पहले कुल 22 कांग्रेसी विधायक तोड़े थे, आज ये संख्‍या बढ़कर 26 हो गयी है और मुमकिन है कि जबतक विधानसभा के उपचुनाव हों ये संख्या और बढ़ जाये।

मुझे लगता है कि भाजपा ने चाल तो चल दी, लेकिन अब उसे खतरा महसूस हो रहा है और शायद इसीलिए उसने परदे के पीछे से चुनाव आयोग को उपचुनाव आगे टालने के लिए तैयार कर लिया है। अब यदि समय पर चुनाव न हुए तो मंत्रिमंडल में बेमन से शामिल किये गए कांग्रेस मंत्री अपने आप बाहर हो जायेंगे, यानि सांप भी मर जायेंगे और लाठी भी नहीं टूटेगी। यही स्थिति देश के 8 लोकसभा उपचुनावों को लेकर है। भाजपा भीतर से भयभीत है और फिलहाल किसी चुनाव में नहीं उतरना चाहती।

मुमकिन है कि केंचुआ 24 जुलाई को अपनी बैठक के बाद विपरीत परिस्थितियों का हवाला देकर राज्य सरकारों से बातचीत की औपचारिकता भी करे, लेकिन उसकी मंशा में खोट दिखाई दे रही है। केंचुआ यदि सत्ता के मनोरथ को पूरा करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 324 का सहारा लेता है तो साफ़ हो जाएगा कि ‘दाल में काला’ नहीं बल्कि पूरी दाल ही काली है।

कोरोना के फैलाव को देखते हुए चुनाव स्थगित करने के अनेक पैरोकार सामने आएंगे, उन्हें मेरी बातें अनुचित भी लगेंगी लेकिन मुझे जो कहना है मैंने कह दिया। आप क्या सोचते हैं ये आपका विवेक है। गनीमत ये है कि केंचुआ के बारे में लिखते समय वैसे खतरे नहीं हैं जैसे औरों के बारे में लिखते समय होते हैं। इस मुद्दे पर सड़क से विधानसभा तक बहस होना चाहिए लेकिन दुर्भाग्य, विधानसभा स्थगित है और सड़क पर कोरोना का गश्त।