राकेश अचल

वक्त के साथ दुनिया बदलती है या दुनिया के साथ वक्त? तय करना हम खबरनबीसों का काम नहीं है। ये दर्शन का विषय है और इसे दार्शनिक ही तय कर सकते हैं। दर्शन एक विचित्र शब्द है। शायद दार्शनिक इसी दर्शन से बना है। दर्शन का मोटा अर्थ देखना होता है। और दार्शनिक का अर्थ एक ऐसी मूर्ति से होता है जो सामान्य से कुछ हटकर हो। आप दुनिया के प्रमुख दार्शनिकों के चेहरे-मोहरे देखकर समझ सकते हैं की दार्शनिक आखिर होते क्या चीज हैं।

दार्शनिक होना बुरी बात नहीं है। दार्शनिक होने में कोई ख़ास पूंजी खर्च नहीं होती। यदि आप दार्शनिक बनना चाहते हैं तो पहले तो कुछ ढीलाढाला बाना पहनना सीखिए, फटे, मैले चोगे भी चल सकते हैं। कहते हैं कि दार्शनिक हर वक्त कुछ न कुछ सोचता रहता है। उधेड़बुन में रहता है, अर्थात कुछ उधेड़ता है कुछ बुनता है। इसी क्रिया में कुछ ऐसा निकल आता है जो सोसायटी के लिए उपयोगी हो जाता है हमारे यहां दार्शनिक बनने से ज्यादा दार्शनिक दिखने का ज्यादा शौक है। दार्शनिक दिखने का शौक अब होड़ में तब्दील हो चुका है।

दुनिया के प्रमुख दार्शनिकों की संख्या 30 के ऊपर तो होगी ही, जिन्होंने दुनिया को अपने मौलिक विचारों से प्रभावित किया। अरस्तू, कन्फ्यूशियस, मार्क्स, रेने, जान स्टुअर्ट मिल का नाम तो आपने सुना ही होगा। दुनिया के पास बीस, तीस दार्शनिक होंगे लेकिन हमारे पास सौ से कम नहीं हैं, पर हम जब भी मिसाल देते हैं विदेशी दार्शनिकों की देते हैं। देशी दार्शनिकों की नहीं। ये मजबूरी है। हमें दरअसल देशी से ही नफरत है। हमें दर्शन हो, दवा हो, विज्ञान हो, सब विदेशी चाहिए, स्वदेशी नहीं। भारत के प्रमुख दार्शनिक विद्वान भी इसीलिए धीरे-धीरे विदेशों की तरफ रुख करना सीख गए।

बहरहाल हम भटक रहे हैं हम  बात कर रहे थे दुनिया और वक्त की। आज की दुनिया में किसी के पास वक्त ही नहीं है। कमब्खत, वक्त न जाने कहाँ चला गया है। हमारे पास इतना वक्त नहीं है कि हम देख सकें कि कौन सा वक्त चल रहा है। वक्त के मामले में हम सचमुच कमबख्त हैं। इसी वजह से कब क्या बदल जाता है, किसी को पता ही नहीं चलता। जब देश में पहली बार इमरजेंसी लगाई गयी तब तक इमरजेंसी क्या होती, कोई नहीं जानता था। अब हम इमरजेंसी लगाने के मामले में एक्सपर्ट हो गए। इमरजेंसी लगाए बिना भी हम देश के हालात ऐसे कर सकते हैं जो इमरजेंसी से कहीं ज्यादा खराब हों।

देश में आजकल ‘डिजिटल इमरजेंसी’ का दौर शुरू हो गया है।  ‘डिजिटल इमरजेंसी’ असली इमरजेंसी से कुछ कम नहीं है। ‘डिजिटल इमरजेंसी’ में सरकार आपका गला इतनी मासूमियत के साथ घोंटती है कि किसी को कुछ पता ही न चले। आजकल लोग-बाग अभिव्यक्ति के लिए सोशल मीडिया के साथ हैं। आपको कुछ नहीं करना कुछ डिजिट्स पर कंट्रोल करना पड़ता है। जैसे आजकल सरकार ने किया हुआ है। जो भी प्यादे से फर्जी होकर ज़रा भी टेढ़ा-टेढ़ा चलने की कोशिश करे बस उसका अकाउंट स्थगित कर दीजिये।

आजकल भारत की अस्सी करोड़ आबादी भले ही सरकार की प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना पर पल रही हो लेकिन सोशल मीडिया पर निर्भरता 110 करोड़ की है। इस आबादी को लगाम देने के लिए आपको जेलें भरने या नजरबन्दियाँ करने की जरूरत नहीं है। आप केवल घर का इंटरनेट बंद करा दीजिये, कोई इस पर आपत्ति करे तो विरोधियों के खाते बंद करा दीजिये। जो कम्पनी ऐसा करने में सहयोग न करे तो उस कम्पनी के सीईओ का तबादला करा दीजिये। इस तरीके को ही ‘डिजिटल इमरजेंसी’ कहते हैं जो भारत में लागू हो चुकी है।

‘डिजिटल इमरजेंसी’ से महात्मा राहुल गांधी से लेकर हमारी बिरादरी के भी असंख्य लोग दुखी हैं। किसी का खाता निलंबित है तो किसी का खाता फ्रीज कर दिया गया। फ्रीज यानि ठंडा करना, इतना ठंडा करना कि वो हिमांक तक पहुंचकर कैंची की तरह चलने वाली जुबानों और उनके खातों को ठंडा कर सके। ‘डिजिटल इमरजेंसी’ का ‘साइड इफेक्ट’ इतना है कि जब तक लोग चिल्लाना शुरू करते हैं तब तक सम्बंधित अपना काम पूरा कर चुका होता है। कहने का आशय ये कि यह एक तरह कि अहिंसक इमरजेंसी है, और पूरी दुनिया में लोकप्रिय भी। लोकप्रिय है इसलिए लोकतान्त्रिक भी है और इसलिए इसे भारत के सन्यासी होते लोकतंत्र की रक्षा के लिए जब-तब इस्तेमाल किया जाता है।

‘डिजिटल इमरजेंसी’ में बाधक कोई भी तत्व स्वीकार्य नहीं है। इस मामले में पूरी दुनिया एक है। अभी मनीष माहेश्वरी ने डिजिटल इंडिया को आँखें दिखने की कोशिश की तो उन्हें ट्विटर इंडिया से ही हटा दिया गया। आखिर सरकार की बात दूसरे देशों की लोकतांत्रिक सरकारें सुनती ही हैं। भारत की बात अमेरिका ने सुनी। अमेरिका की बात भी भारत अक्सर सुनता ही रहता है। डिजिटल इमरजेंसी में जरूरी नहीं कि आपका खाता महात्मा राहुल गांधी की तरह बंद ही किया जाये, ये काम आपके पीछे पेगासस लगाकर भी किया जा सकता है। किया जा रहा है। दुनिया का तो पता नहीं लेकिन हमारे भारत में तो इसका हल्ला है। सड़क से संसद तक लोग पेगासस, पेगासस करते दिखाई देते हैं।

‘डिजिटल इमरजेंसी’ दरअसल एक ‘मायावी’ तकनीक है जो किसी जमाने में लंकाधिपति रावण के पास ही थी, लेकिन अब इसका विस्तार सारी दुनिया में हो चुका है। ये अदृश्य तकनीक आपकी जबान पर ही नहीं आपकी आत्मा पर भी तांडव नृत्य कर सकती है। मिसाल के तौर पर मेरा वाट्सअप खाता बीते 36 घंटे से डिजिटल इमरजेंसी की चपेट में है। मैं इसीलिए महात्मा राहुल गांधी समेत उनकी बिरादरी और गैर बिरादरी के लोगों की तकलीफ समझ सकता हूँ जो इस समय निहत्थे हैं। जो न चिंचिया पा रहे हैं और न ढंग से बोल पा रहे हैं। कोरोनाकाल में डिजिटल प्लेटफार्म ही सबसे ज्यादा मुफीद माने जाते हैं। न आपको अखबारों में बयान भिजवाना है और न टेलीविजन चैनलों के सामने बयान देना है, बस जरा सा चिंचिया दीजिए आपकी बात सारी दुनिया में पहुँच जाएगी।

‘डिजिटल इमरजेंसी’ के खिलाफ खड़े होने के लिए अभी तक कोई लोकनायक प्रकट नहीं हुआ है। बिना लोकनायक के ये इमरजेंसी हटने से रही क्योंकि इसे लगाने वाले हमारे हुक्मरान दार्शनिक हैं। लम्बी दाढ़ी-मूंछ वाले, लम्बे चोगों वाले। आधे संत और आधे नेता। हमारे यहां एक ही देह में दो प्राण रहने की पुरानी प्रथा है। अर्धनारीश्वर का नाम तो आपने सुना ही होगा। हमारे यहां नर और सिंह मिलकर नृसिंह बन जाते हैं। इसलिए हे डिजिटल प्राणियों समझदारी से अपने डिजिट का इस्तेमाल करो अन्यथा तुम्हें पता भी नहीं चलेगा और तुम्हारा टेंटुआ दबा दिया जाएगा। (मध्‍यमत)
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