वर्तमान हालात पर एक ‘प्रचण्‍ड’ कविता

हुई जिन्दगी झण्ड, कबीरा,

पूजित है पाखण्ड है कबीरा

……….

राजा रानी गर्राये से

राजकुंवर उद्दण्ड, कबीरा

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जनगणमन उदास सा बेबस

शासक मत्त भुसण्ड, कबीरा

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संविधान लूला लंगडा सा

लोकतन्त्र बरिबण्ड, कबीरा

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लण्ठ और गुण्डे सम्मानित

है सन्तन को दण्ड कबीरा

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लुच्चे टुच्चे राजकरत हैं

माया बडी प्रचण्ड, कबीरा

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परजा भूखी और प्यासी है

नेता खा गये फण्ड कबीरा

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नहीं सुरक्षित बहन बेटियाँ

गली-गली मुसडण्ड. कबीरा

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हंसन को धकियाकर मोती

चुग रये कागभुसण्ड कबीरा

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मारो पटक-पटक कर अब तो

करो खण्ड के खण्ड कबीरा

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कल होना तय राख परन्तु

करता फिरे घमण्ड कबीरा

(डॉ. लक्ष्‍मीनारायण पाण्‍डे की फेसबुक वॉल से साभार)

 

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