कमलेश पारे

बांग्लादेश के ‘राष्ट्रीय दिवस समारोह’ में जब भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि वे भी बांग्लादेश की आजादी के लिए हुए आंदोलन का हिस्सा रह चुके हैं, तो अपने देश में बुद्धिजीवियों के एक हलके में भूचाल सा आ गया था। पहला प्रश्न यही था कि यह कैसे हो सकता है, जबकि भारत तो पहले दिन से बांग्लादेश की लड़ाई में उसके साथ था। तो इस देश में इसके लिये आंदोलन क्यों हुआ होगा? जो भी लोग उस समय सजग या सक्रिय रहे होंगे, उन्हें याद होगा कि भारतीय सेना बांग्लादेश की ‘मुक्ति-वाहिनी’ के साथ गोपनीय रूप से अत्याचारी पाकिस्तानी फौजियों के विरुद्ध तो पहले दिन से लड़ रही थी, लेकिन औपचारिक रूप से भारत इस पूरे दृश्य को सिर्फ देख रहा था।

तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में पश्चिमी पाकिस्तानी फौज द्वारा स्थानीय लोगों के साथ ही ‘हिंदू’ अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे भीषण अत्याचारों और लाखों की संख्या में आ रहे शरणार्थियों के कारण हमारा समाज व्याकुल हो गया था। तब तत्कालीन प्रमुख विपक्षी दल ‘भारतीय जनसंघ’ ने एक सत्याग्रह कर भारत की सरकार पर दबाव बनाया था कि हम पाकिस्तान के विरुद्ध खुले युद्ध की शुरुआत कर दें। साथ ही मुजीबुर्रहमान द्वारा घोषित ‘खुद-मुख़्तारी’ को स्वीकार कर उन्हें एक सार्वभौम राष्ट्र के रूप में मान्यता दें। उस सत्याग्रह का नाम ‘गण-सत्याग्रह’ था।

1 अगस्त 1971 से लेकर 12 अगस्त 1971 तक सारे देश में चलाये गये इसी सत्याग्रह के दौरान संसद के समक्ष जनसंघ के 10,000 कार्यकर्ताओं ने अपनी गिरफ्तारी दी थी। यह समाचार ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रमुखता से छपा भी था। त्वरित संदर्भ के लिए उस दिन की, उस अखबार की कतरन यहां प्रस्तुत है। इसी तरह देश के अन्य नगरों में भी गिरफ्तारियां दी गई थीं। तब 1950 में जन्मे श्री नरेंद्र मोदी 21 वर्ष की आयु के एक प्रथम वर्ष शिक्षित संघ-स्वयंसेवक थे। इसलिए वे इस आंदोलन में शामिल हुए होंगे, इस पर कोई भी शंका करना उचित नहीं है।

अंततोगत्वा श्रीमती गांधी ने पाकिस्तान के विरुद्ध औपचारिक युद्ध की घोषणा कर दी थी। यह वही दिन और वही अवसर था जब श्री अटल विहारी वाजपेयी ने उनके लिए तथाकथित रूप से ‘दुर्गा’ शब्द का उपयोग किया था। हालांकि अटल जी इस शब्द के उपयोग का खंडन करते रहे, लेकिन ये ‘दुर्गा’ उनके पीछे आजीवन चिपकी रहीं। हां, यह सच है कि अगले दिन संसद में सारे विपक्षी दलों में श्रीमती गांधी की प्रशंसा की लगभग होड़ सी लग गई थी। उनके घोर व कटु आलोचक श्री मोरारजी देसाई तक ने उनकी प्रशंसा की थी।

श्री अटल विहारी वाजपेयी को बांग्लादेश की सरकार ने जब अपने देश का सर्वोच्च सम्मान दिया था, तब दिए गए ‘मानपत्र’ में भी इस ‘गण-सत्याग्रह’ का उल्लेख किया गया था। त्वरित संदर्भ के लिये उस ‘मानपत्र’ की प्रति भी यहां प्रस्तुत है।
इसलिए सही संदर्भ के लिये यह बात स्पष्ट होनी चाहिए कि बांग्लादेश की स्वतंत्रता के दौरान भारत में तत्कालीन विपक्षी दल ‘भारतीय जनसंघ’ ने एक बड़ा सत्याग्रह किया था, और उसके कार्यकर्ता अपनी मांगों के लिए जेल भी गए थे। अतः श्री मोदी की बात पर अविश्वास करना उनके साथ एक अन्याय होगा।
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