आपकी हिफाजत और जनता की फजीहत, यह कैसे चलेगा?

भोपाल में पिछले साल दिवाली की रात सेंट्रल जेल से प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) के आठ सदस्यों के भागने और बाद में पुलिस एनकाउंटर में उनके मारे जाने की घटना के बाद कई सवाल उठे थे। इनमें सबसे बड़ा सवाल जेल की सुरक्षा व्‍यवस्‍था में सेंध का था। उस समय आरंभिक जांच से यह तथ्‍य सामने आया था कि जिन सुरक्षा गार्डों को जेल की सुरक्षा में तैनात होना था वे वीआईपी लोगों के यहां काम कर रहे थे।

उस समय की मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार जेल के सुरक्षाकर्मियों की यह तैनाती मुख्यमंत्री, जेलमंत्री, पूर्व जेल मंत्रियों, जेल अधिकारियों के घर तथा कार्यालय से लेकर जेल विभाग के मुख्‍यालय तक में की गई थी। घटना के वक्‍त वहां बहुत कम सुरक्षाकर्मी थे और उसी का फायदा उठाते हुए सारे खूंखार कैदी एक सुरक्षाकर्मी की हत्‍या कर जेल से भाग निकले थे। पता चला था कि राज्य की सबसे सुरक्षित कही जाने वाली इस जेल में मौजूद लगभग 3,300 कैदियों के लिए सिर्फ 139 गार्ड हैं।

भोपाल जेल ब्रेक की वह घटना हाल ही में जारी हुई एक सरकारी रिपोर्ट के चलते याद आई। गृह मंत्रालय के ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ने देश में पुलिसिंग का जो हाल बताया है, वह चौंकाने वाला है। उसके आंकड़ों के मुताबिक देश में 663 लोगों पर सिर्फ एक पुलिसकर्मी तैनात है जबकि हरेक वीआईपी की सेवा में औसतन तीन पुलिसकर्मी ड्यूटी कर रहे हैं। देश में अभी कुल 19 लाख 26 हजार पुलिसकर्मी हैं जिनमें 56,944 की जिम्‍मेदारी सिर्फ देश के 20,828 वीआईपी लोगों की सुरक्षा देखना है।

रिपोर्ट के मुताबिक लक्षद्वीप को छोड़कर ऐसा एक भी राज्य नहीं है जहां पुलिस पर वीआईपी कल्चर का बोझ न हो। सबसे खराब हालत बिहार की है, जहां सबसे ज्यादा 3,200 वीआईपी हैं। इनकी सुरक्षा में 6,248 पुलिसकर्मी तैनात हैं। दूसरे नंबर पर पश्चिम बंगाल है जहां 2,207 वीआईपी की सुरक्षा में 4,233 पुलिसकर्मी लगे हुए हैं। तीसरे पर जम्मू और कश्मीर है जिसके 2,075 वीआईपी की सुरक्षा में 4,499 पुलिसकर्मी लगे हैं। यूपी में 1,901 वीआईपी की सुरक्षा में 4,681 तो पंजाब में 1,852 वीआईपी की सुरक्षा में 5,315 पुलिसवाले लगे हैं।

देश भर में सबसे कम वीआईपी पर सबसे अधिक पुलिस वालों की तैनाती राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्ली में है। वहां मात्र 489 वीआईपी की सुरक्षा में 7,420 पुलिसकर्मी लगे हैं। वहीं मुंबई में सिर्फ 74 वीआईपी हैं जिन्हें 961 पुलिसकर्मी सुरक्षा दे रहे हैं। केरल में महज 54 वीआईपी है, जिन्हें 214 पुलिसकर्मी मिले हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार भारत की तुलना में देखें तो ब्रिटेन में 84, फ्रांस में 109, जापान में 125, ऑस्ट्रेलिया में 205, अमेरिका में 252, साउथ कोरिया में 282, रूस में 312 और पड़ोसी चीन में 435 वीआईपी हैं। यानी मोटे तौर पर दुनिया में कहीं भी उतने वीआईपी नहीं है जितने भारत में हैं। दूसरे लिहाज से दुनिया के प्रमुख देशों के वीआईपी की सूची में शामिल लोगों को जोड़ भी लिया जाए तो भारत के वीआईपी की संख्‍या उनसे ज्‍यादा ही निकलेगी।

लेकिन वीआईपी सुरक्षा से हटकर जब जनसामान्‍य की ओर नजर घुमाएं तो हम पाते हैं कि भारत दुनिया के उन देशों में है जहां प्रति व्‍यक्ति सबसे कम पुलिस सुविधा है। पिछले दिनों केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ही जानकारी दी थी कि सभी राज्यों में पुलिसकर्मियों के कुल स्वीकृत पदों की संख्या 22,63,222 है, जिसमें से लगभग सवा तीन लाख पद तो खाली पड़े हैं। यानी लोगों की जरूरत के हिसाब से तो पुलिस कम है ही, जो है, उसका भी दस फीसदी से ज्यादा हिस्सा देश के ‘बड़े लोगों’ यानी वीआईपी की ‘सेवा’ में लगा है।

कुछ माह पहले जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालबत्‍ती हटवाने फैसला किया था, उसके बाद माना गया था कि यह सरकार वीआईपी कल्‍चर को पूरी तरह खत्‍म करके ही दम लेगी। लेकिन विभिन्‍न श्रेणियों की अतिविशिष्‍ट सुरक्षा के मामले में वर्तमान सरकार ज्‍यादा उदार साबित हुई है। यह कोई दबी छिपी बात नहीं है कि बंदूकधारी सुरक्षा गार्ड का साथ में होना, सुरक्षा का सबब कम और स्‍टेटस सिंबल ज्‍यादा है। इसीलिए हर राजनेता की कोशिश होती है कि उसके पास बंदूक और रिवॉल्‍वर का लायसेंस हो साथ ही उसे सरकारी सुरक्षा गार्ड भी मुहैया हो जाए।

आंकड़ों के लिहाज से देखें तो अति उच्‍च सुरक्षा पाने वाले लोगों की वर्तमान संख्‍या देश में 475 बताई गई है। जबकि यूपीए के समय इस सूची में 330 लोग थे। अभी 55 नेताओं और वीआईपी को ज़ेड प्लस सुरक्षा मिली हुई है। यूपीए सरकार के दौरान यह सुविधा 20 लोगों के ही पास थी। जेड प्‍लस सुरक्षा में 35से  40 सुरक्षाकर्मी तैनात किए जाते हैं। अभी जेड कैटेगरी की सुरक्षा पाने वालों की संख्‍या 60 है जो पूर्ववर्ती सरकार के समय 26 थी। जेड कैटेगरी में करीब30 सुरक्षाकर्मी तैनात होते हैं।

वाई प्लस सुरक्षा 145 लोगों को मिली हुई है, इसमें करीब 11 सुरक्षाकर्मी तैनात होते हैं। एक्स कैटेगरी की सुरक्षा 68 लोगों के पास है जिसमें 2 सुरक्षाकर्मी तैनात होते हैं। अभी केंद्र सरकार से 299 लोगों को सुरक्षा दी गई है जबकि यूपीए सरकार के समय इस सूची में 250 लोग थे। इसके अलावा राज्‍यों में अपने स्‍तर पर भी कई लोगों को अलग अलग तरह की व्‍यवस्‍था के तहत सुरक्षाकर्मी दिए जाते हैं जिनकी संख्‍या सैकड़ों में है।

इन सुरक्षाकर्मियों के बारे में आम अनुभव बताता है कि इनसे सुरक्षा का कम और घरेलू नौकर या निजी सेवक का काम ज्‍यादा लिया जाता है। कहने को वे सुरक्षा के लिए तैनात होते हैं, लेकिन वीआईपी उनसे अपने जूतों के फीते बंधवाने, चप्‍पलें उठवाने, घर की सब्‍जी लाने, बच्‍चों को खिलाने और कुत्‍तों को घुमाने जैसे काम लेते हैं।

निश्चित तौर पर देश के नेताओं और विशिष्‍ट जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा होनी चाहिए। लेकिन क्‍या उसके साथ यह नहीं देखा जाना चाहिए कि उस सुरक्षा का औचित्‍य क्‍या है? उस व्‍यक्ति को सचमुच सुरक्षा की जरूरत है या फिर वह केवल अपना रुतबा बढ़ाने के लिए यह सुविधा चाहता है? उम्‍मीद की जानी चाहिए कि जिस तरह मोदी सरकार ने लालबत्‍ती की परंपरा खत्‍म कर वीआईपी कल्‍चर को तोड़ने का प्रयास किया है, उसी तरह सुरक्षा के नाम पर मुहैया कराए जाने वाले पुलिस व सुरक्षाबल के मामले में भी वह विचार करेगी। क्‍योंकि वीआईपी की सुरक्षा के फेर में आम जनता की सुरक्षा की अनदेखी स्‍वीकार नहीं की जा सकती। आखिरकार वीआईपी भी इन लोगों को यह जनता ही तो बनाती है।

 

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