रमेश रंजन त्रिपाठी

‘हमारी बातचीत में तुम गठरी लेकर क्यों आते हो?’ गोपाल ने पूछ ही लिया- ‘क्या है इसमें?’

‘मेरा मन है इसमें।’ सुमेर ने निर्लिप्त भाव से बता दिया।

‘तो तुम इसे खोलकर क्यों बैठ जाते हो?’ गोपाल को सुमेर की हरकत अजीब सी लगी।

‘मेरे गुरु जी ने समझाया था कि किसी से बात करो तो पूरी तैयारी रखा करो।’ सुमेर ने उसी सपाट चेहरे से जवाब दिया- ‘क्या पता कब किससे पाला पड़ जाए? तब मन को खोल दिया करो, उसमें चालीस सेर होते हैं।’

‘अब ये कौन से सेर हैं जो एक मन में चालीस होते हैं?’ गोपाल ने माथा खुजाया।

‘तौलनेवाले सेर जिसमें अस्सी तोला होते हैं।’ सुमेर मुस्कुराया।

‘कन्फ्यूज मत करो।’ गोपाल बोला- ‘शेर का मुकाबला सेर से कैसे? जरूरी नहीं कि सामनेवाला शेर हो !’

‘सेर न होगा तो पौवा होगा, छटांक होगा या पंसेरी होगा।’ सुमेर की मुस्कान कायम थी- ‘कोई हो, चालीस सेर वाले मन को खोल दो तो सामनेवाला झिझक ही जाता है।’

‘उसके पास भी तो मन होगा!’ गोपाल की उलझन कम नहीं हो रही थी- ‘उसके मन में भी सेरों की कमी नहीं होगी।’

‘अधिकांश लोग अपने मन की गांठ नहीं खोलते।’ सुमेर बोला- ‘इसलिए अपने चालीस सेरों को खोलकर रखो और निश्चिंत रहो। खुद-ब-खुद रोब गालिब होता रहेगा।’

‘तुम्हारे इन सेरों को चलन से बाहर हुए छह से अधिक दशक बीत चुके हैं।’ गोपाल ने समझाया- ‘अब तुम्हारे मन में चालीस सेर नहीं सवा सैंतीस किलोग्राम होते हैं। इसलिए सेरों का खौफ न दिखाया करो।’

‘सोने की दुकानों में तोला तो अभी भी बोला जाता है।’ सुमेर ने बात काटी- ‘फिर सेर ने किसी का क्या बिगाड़ा है?’

‘तोला छोटा, नाजुक और कीमती धातुओं का चमचा है इसलिए अभी भी कहीं-कहीं वजूद बनाए हुए है।’ गोपाल ने ज्ञान बघारा- ‘सेर को अब उससे ज्यादा वजनदार किलोग्राम यानी सवा सेर मिल गया है इसलिए चलन से बाहर है।’

‘लेकिन मन को सेर बहुत पसंद हैं।’ सुमेर के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभरने लगीं- ‘अब इस मन का क्या करें?’

‘मन को धीर धरना सिखाओ।’ गोपाल प्रवचन के मोड में आने लगा- ‘मन दस-बीस तो होते नहीं जिन्हें अलग-अलग कामों में लगा दिया जाए या किसी में किलोग्राम और किसी में सेरों को ठहरा दिया जाए। मन तो एक होता है सो उसमें ‘आउट ऑफ डेट’ को अड्डा क्यों जमाने दें? इन सेरों को निकाल बाहर करो। सेरों से ज्यादा लगाव हो तो शेरदिल बनो। उसको वहां दहाड़ने दो। धाक जमाने के लिए चालीस नहीं, एक सच्चा शेर ही पर्याप्त होता है।’

‘मेरे मन के सेर जाएंगे कहां?’ सुमेर सोच में पड़ गया- ‘जंगल में रहने की आदत नहीं है इन्हें। कोई सर्कस वाला भी नहीं लेगा क्योंकि ये मेरे मन के सेर हैं किसी और की बात नहीं सुनेंगे। बाहर इनका पाला किलोग्राम से पड़ेगा। तब माशा, तोला, छटांक वाला मेरा सेर ग्राम-ग्राम की हजार बूंदों से बने किलोग्राम का मुकाबला कैसे करेगा? यह तो विलुप्त हो जाएगा।’

‘तुम्हारी बात में रत्ती भर भी दम नहीं है।’ गोपाल ने टोका।

‘ये चलन से बाहर हो चुकी रत्ती यहां क्या कर रही है?’ सुमेर को अपने सेरों के निकाले जाने का बदला लेने का मौका मिल गया था।

‘तुम्हारे सेर हों या छटांक, या हों यह रत्ती और माशा, सभी के लिए कहावत और मुहावरों की कॉलोनी में रहने के स्थान आवंटित किए जा चुके हैं।’ गोपाल हंसा- ‘इन्हें वहीं छोड़ आओ और बातचीत के उपवन में विचरते देखा करो। लाड़ उमड़े तो अपनी जुबान से दुलरा दिया करो और खुश रहो।’

‘बात मेरे पल्ले नहीं पड़ी।’ सुमेर बोला।

‘कोई बात नहीं।’ गोपाल हंसा- ‘शायद अगली बार की बातचीत में बात बन जाए।’

सुमेर भी अपनी मन की पोटली को समेटता हुआ हंसने लगा।