‘मास्‍टर’ प्‍लान तो छोडि़ए आप तो ‘स्‍टूडेंट’ प्‍लान ही ले आइए

जब गैंग रेप और पद्मिनी विवाद जैसी भारी भरकम खबरें चल रही हों तो किसी भी शहर का मास्‍टर प्‍लान वैसे भी खबर बनने की हैसियत नहीं रखता। लेकिन इसके बावजूद राजधानी भोपाल में मास्‍टर प्‍लान को लेकर यदि गुरुवार के अखबारों में खबरें छपी हैं तो उसके लिए पूरे समाज को मीडियावालों का एहसानमंद होना चाहिए। एहसान उन अफसरों का भी माना जाए जिन्‍होंने शहरवासियों को इस मुद्दे पर बात करने का मौका दिया…

तो हम भोपाल के मास्‍टर प्‍लान को बनाने-बिगाड़ने वाले तमाम अफसरान के एहसान तले दबे होकर इस मुद्दे पर बात करेंगे। पहले यह जान लें कि भोपाल के मास्‍टर प्‍लान का लफड़ा क्‍या है? भोपाल, विकास के हर मामले में अव्‍वल रहने का दावा करने वाले मध्‍यप्रदेश की राजधानी है। सफाई के मामले में इस शहर ने देश में दूसरा स्‍थान पाया है। लेकिन शहरी विकास की बुनियादी जरूरत मास्‍टर प्‍लान के मामले यह शहर 12 साल पीछे चल रहा है।

भोपाल का पिछला मास्‍टर प्‍लान दिसंबर 2005 में खत्‍म हो गया था। कायदे से उसके तत्‍काल बाद अगला मास्‍टर प्‍लान आना था जो 2021 तक के लिए होता, लेकिन लगातार हो रही देरी के चलते अब नया मास्‍टर प्‍लान 2031 तक के लिए बनाया जा रहा है। और बनाया क्‍या जा रहा है, बनाने का टोटका किया जा रहा है। टोटका मैंने इसलिए कहा क्‍योंकि 2005 में पुराने मास्‍टर प्‍लान की मियाद खत्‍म होने के बाद 2008 में नए मास्‍टर प्‍लान का मसौदा तैयार कर लिया गया था। लेकिन विधानसभा चुनाव आदि की आड़ लेते हुए उसे जारी नहीं किया गया।

रोते झींकते अगस्‍त 2009 में मास्‍टर प्‍लान का मसौदा जारी हुआ। उस पर सुझाव आपत्तियां मंगाई गईं और उस दौरान ऐसा झंझट हुआ, या यूं कहें कि जानबूझकर ऐसे ऐसे पेंच फंसाए गए कि अप्रैल 2010 में वह मसौदा रद्द करना पड़ा। सितंबर 2010 में आदेश हुए कि नया मास्‍टर प्‍लान तैयार किया जाए जो 2031 तक का हो।

अब जरा वो मोटे मोटे कारण भी सुन लीजिए जिनके चलते पुराने मास्‍टर प्‍लान का मसौदा रद्द किया गया था। उस मसौदे में भोपाल के मशहूर बड़े तालाब के जलग्रहण क्षेत्र में भी, न केवल आवासीय बल्कि वाणिज्यिक गतिविधियों की अनुमति दे दी गई थी। उसमें हवाईअड्डे सहित कई संवेदनशील इलाकों के आसपास भी आवासीय गतिविधियां संचालित करने की बात थी। 24 मीटर चौड़ी सड़कों पर व्‍यावसायिक अनुमति देने के साथ ही आवासीय क्षेत्र में वाणिज्यिक गतिविधियां संचालित करने यानी उस भूमि को मिश्रित भू उपयोग वाली मानने का भी प्रावधान किया गया था।

सबसे बड़ा गड़बड़झाला तो भोपाल की आबादी की गणना में हुआ था। पड़ताल के दौरान पता चला था कि जिस जनसंख्‍या आकलन के आधार पर मसौदा तैयार किया गया वह आकलन ही गलत था। इसके अलावा मसौदे में यूडीपीएफआई (Urban Development Plans Formulation and Implementation) गाइडलाइन का भी पालन नहीं किया गया था। यानी कुल मिलाकर उसी कुंए का पानी पीकर यह प्‍लान तैयार किया गया जिसमें भांग घुली थी।

खैर अब वे सारी बातें इतिहास का हिस्‍सा हैं। इस बीच मामला खिंचते खिंचते अब 2017 आ गया है। नए मसौदे पर इस बीच सुझाव आपत्तियां बुलवाई गई थीं और मास्‍टर प्‍लान संशोधन पर आए 871 सुझाव आपत्तियों को लेकर स्‍थानीय सांसद आलोक संजर की अध्‍यक्षता में 22 नवंबर को इसकी सुनवाई शुरू हुई।

जैसाकि हर मास्‍टर प्‍लान के समय होता है। स्‍थायी रूप से बड़े तालाब और भोपाल के अन्‍य तालाबों का मामला इसमें उठा और फिर वही बात दोहराई गई कि भोपाल की पहचान बन चुके तालाब के आसपास निर्माण पर रोक के बावजूद निर्माण गतिविधियां लगातार जारी हैं, ऐसे में मास्‍टर प्‍लान की हैसियत ही क्‍या है।

ऐसे ही और भी कई मुद्दे उठे, लेकिन सबसे ज्‍यादा छाया रहा आवासीय क्षेत्र में अस्‍पताल और नर्सिंग होम खोले जाने का मुद्दा। बैठक में आए डॉक्‍टरों और नर्सिंग होम के प्रतिनिधियों ने इसकी जोरदार वकालत करते हुए, इसकी अनुमति दिए जाने की मांग की। उनकी दलील थी कि बस्‍ती के बीच अस्‍पताल या नर्सिंग होम होने से लोगों को सुविधा ही होगी और उन्‍हें वक्‍त जरूरत इलाज समय पर मिल सकेगा।

लेकिन पूर्व मुख्‍य सचिव निर्मला बुच और पूर्व डीजी अरुण गुर्टू सहित जनता के कई नुमाइंदों का कहना था कि ऐसी गतिविधियों के कारण उस बस्‍ती या मोहल्‍ले के लोगों का जीना दूभर हो जाता है। मुख्‍य रूप से इस संबंध में पार्किंग और बायोवेस्‍ट का मुद्दा उठाया गया। खबरों के अनुसार निर्मला बुच ने तो यहां तक कह दिया कि जो लोग ऐसा सुझाव दे रहे हैं वे अपने घर के सामने नर्सिंग होम खुलवा लें, तब समझ में आएगा परेशानी क्‍या होती है…

दरअसल बस्तियों के बीच अस्‍पताल या नर्सिंग होम सहित कोई भी वाणिज्यिक या व्‍यावसायिक गतिविधि चलाने से निश्चित रूप से उस इलाके के लोगों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ता है। न सिर्फ भोपाल में बल्कि प्रदेश के कई शहरों में लोगों ने अपने आवासीय प्‍लाट या मकान को नर्सिंग होम या अस्‍पतालों में तब्‍दील कर दिया है। निश्चित रूप से चिकित्‍सा सुविधा एक जरूरी सुविधा है, लेकिन वहां आने जाने वालों की गतिविधियों के कारण स्‍थानीय लोगों को जो असुविधा होती है उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

लेकिन मास्‍टर प्‍लान बनाने वाले पता नहीं किस दबाव या प्रभाव में होते हैं कि इन चीजों की तरफ उनका ध्‍यान ही नहीं जाता। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि ‘मास्‍टर प्‍लान’ में ‘मास्‍टर’ तो केवल नाम भर का है, असलियत में तो वह ‘स्‍टूडेंट प्‍लान’ भी नहीं है। बेहतर तो यह होगा कि मास्‍टर प्‍लान बनाने से पहले इस काम के सारे कर्ताधर्ता कोई ‘स्‍टूडेंड प्‍लान’ तैयार करें।

जारी… 

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