आकाश शुक्‍ला

सरकार के प्रति यदि कोई भ्रम फैलाता है तो उसे दूर करने की जिम्मेदारी भी सरकार की ही होती है और यदि सरकार इस भ्रम को दूर न कर सके तो वह बात भ्रम नहीं रहती, उसमें सत्यता रहती है और यह सरकार की असफलता कहलाती है। न्याय हमेशा अन्याय के पीछे खड़ा रहता है और न्याय के सामने खड़े अन्याय को हटाकर ही न्याय प्राप्त किया जा सकता है। जब तक अन्याय नहीं होता तब तक न्याय पाने का कोई प्रयास नहीं होता। किसान आंदोलन बरसों से किसानों के साथ हो रहे अन्याय और बिन मांगे मिले वर्तमान किसान बिल की विसंगतियों और इससे उपजे सरकार के प्रति अविश्वास का नतीजा है।

वर्तमान किसान आंदोलन भ्रम के कारण नहीं हो रहा है। उसके पीछे जल्दबाजी में लिए गए सरकार के पूर्व के निर्णय भी हैं जैसे नोटबंदी, जिसको प्रचारित किया गया था कि उससे कालाधन खत्म हो जाएगा। जीएसटी को भी बहुत जोर-शोर से प्रचारित किया गया, परंतु अर्थशास्त्रियों की आशंकाएं नोटबंदी और जीएसटी पर सही ही साबित हुईं। ये दोनों कदम आर्थिक मंदी का कारण बने। किसान आंदोलन के पीछे भी नया किसान बिल और सरकार पर किसानों का भरोसा नहीं होना है। इसके अलावा किसानों को भरोसे में लिए बिना कानून बनाना किसानों के असंतुष्ट होने का मुख्य कारण है।

आजादी के 73 वर्षों में सत्तारूढ़ पार्टियों ने चाहे वह कांग्रेस हो या बीजेपी या अन्य कोई पार्टी, यदि किसानों की समस्या पर ध्यान देकर उचित न्यूनतम समर्थन मूल्य ईमानदारी से देने की व्यवस्था बनाई होती तो किसानों को कर्ज माफी, कृषि अनुदान जैसी सहायता की जरूरत नहीं पड़ती। अन्य क्षेत्रों में काम कर रहे लोगों की तुलना में कृषि क्षेत्र में काम कर रहे  कृषकों की आमदनी में तुलनात्मक रूप से काफी कम बढ़ोतरी हुई है। जबकि कृषि की लागत पहले की तुलना में काफी बढ़ गई है। जीवन यापन पर होने वाले खर्च बहुत ज्यादा बढ़े हैं जिससे कृषकों के जीवन यापन का स्तर समाज के अन्य वर्गों की तुलना में काफी पिछड़ा हुआ है।

किसान को बरसों से उम्मीद रही है कि उसे उचित न्यूनतम समर्थन मूल्य मिले। 2006 में आई स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट में एमएसपी औसत लागत से 50 फीसदी ज्यादा रखने की सिफारिश की गई थी ताकि छोटे किसान भी मुकाबले में आएं। किसानों की फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य कुछेक नकदी फसलों तक सीमित न रहें। जनता को मोदी सरकार से स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करने की उम्मीद थी परंतु यह उम्मीद ही रह गई। और आ गया नया किसान बिल जिस पर किसानों को ही विश्वास नहीं है।

पहले कानून, यानी कृषि उपज व्यापार कानून के अंतर्गत किसानों को मंडी के अलावा अन्य जगहों पर अपनी फसलें बेचने की छूट रहेगी। पहले भी राज्यों में यह छूट लागू थी। इस कानून का किसानों में डर यह है कि इससे मंडी  व्यवस्था खत्म हो जाएगी। मंडी के अलावा बाहर फसलों के विक्रय पर मंडी टैक्स नहीं लगेगा। बाहर जब बड़े कॉरपोरेट घराने फसल खरीदेंगे तब शुरुआत में तो फसलों के अच्छे दाम मिलेंगे परंतु जब धीरे-धीरे बाहर के खरीददारों के कारण मंडी व्यवस्था चौपट हो जाएगी, तब कारपोरेट घराने उनकी फसलें ओने पौने दामों पर खरीदेंगे और किसानों को मजबूरी में फसल उन्हीं को बेचना पड़ेगा।

उनके हालात रिलायंस के जिओ उत्‍पाद से समझे जा सकते हैं। शुरुआत में फ्री डाटा और फ्री कॉलिंग की सुविधा देकर जनता को जियो की आदत डालकर अन्य नेटवर्क के खात्मे के बाद अब लोगों को जिओ की मनमानी सहन करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, ठीक वैसा ही हाल किसानों का भी हो जाएगा। इस कानून की कमी को, न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी करने की बाध्यता संबंधी कानून बनाकर हल किया जा सकता है। मंडी की खरीदी एवं मंडी के बाहर की खरीदी के लिए एक जैसे नियम बनाकर बाधा को दूर किया जा सकता है, किसानों की भी यही मांग है। इस कानून के कारण किसान छोटे बिचौलिये के हाथ से निकल कर बड़े बिचौलिये के हाथ में चला जाएगा।

दूसरा कानून कांट्रैक्ट फार्मिंग को लेकर है, इस कानून की मांग किसी कृषि संगठन ने कभी नहीं की। इसकी आवश्यकता बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों को कृषि उपज के बड़े बाजार पर राज करने के लिए जरूर महसूस हो रही थी। इस कानून में अनुविभागीय अधिकारी के न्यायालय को प्रथम न्यायालय बनाया जाना भी किसानों से अधिक किसानों के साथ कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग करने वालों को फायदा पहुंचाने का उपक्रम है। किसान और कॉरपोरेट में से अनुविभागीय अधिकारी किसके पक्ष में काम करेंगे यह बताने की आवश्यकता नहीं है?

हालांकि इसके कुछ प्रावधान अच्छे हैं जैसे कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का अनुबंध करने वाले को कृषि भूमि को लीज पर देने, हस्तांतरण करने, बंधक रखने एवं स्थाई निर्माण करने के कोई अधिकार नहीं रहेंगे। इस कानून में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग करने की कोई अनिवार्यता नहीं है, किसान यदि नहीं चाहेगा तो उसे कोई कांटेक्ट फार्मिंग करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। जो भी कृषक कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग करेगा उसे ही इसके फायदे और नुकसान होंगे।

तीसरा कानून जरूर सभी के लिए नुकसानदेह है। इसके अंतर्गत अनाज, दाल, तिलहन, आलू, प्याज आदि मूलभूत आवश्यकताओं के खाद्यान्न को आवश्यक वस्तु अधिनियम के दायरे से बाहर लाना निश्चित ही प्रथम दृष्टया बड़े बड़े कॉरपोरेट के लिए जमाखोरी के रास्ते खोलने की निशानी है। आवश्यक वस्तु अधिनियम के दायरे से खाद्यान्न को बाहर करने के कारण आवश्यक खाद्यान्नों की जमाखोरी, काला बाजारी और मूल्य वृद्धि जैसे दुष्परिणाम आम जनता को भुगतने पड़ेंगे।

किसानों से कम दामों पर उनकी फसलें खरीद कर और उसका बहुतायत में संग्रह करने के बाद, जब जनता को वही फसलें विक्रय की जाएंगी तो किसान को दिए गए मूल्य और जनता के विक्रय मूल्य में बहुत अधिक अंतर होगा जिसका फायदा न तो किसान को मिलेगा न जनता को। बड़े-बड़े जमाखोर आवश्यक खाद्यान्नों की कृत्रिम कमी बाजार में पैदा कर उन्हें ऊंचे दामों पर विक्रय करेंगे। इस कमी को स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य देकर और व्यापारियों के लिए अधिकतम विक्रय मूल्य  तय करके दूर करते हुए जनता को इसके दुष्परिणामों से बचाया जा सकता है।

किसान आंदोलन कोई धार्मिक या उग्रवादी आंदोलन नहीं है। इस आंदोलन को खालिस्तान समर्थन से जोड़ना शर्मनाक है, किसानों के खिलाफ दुष्प्रचार करने से अधिक उनकी समस्या सुनने और समझने की आवश्यकता है। इस आंदोलन को सीमित राजनीतिक दायरे में देखना भी उचित नहीं है, क्योंकि आंदोलनकारियों में बीजेपी, कांग्रेस, अकाली दल आदि सभी दलों को वोट देने वाले किसान हैं। इनकी जायज चिंताओं को सुनकर उनका हल निकालना सरकार का कर्तव्य है।