ग्रीटिंग कार्ड्स का बाजार घटा है, शुभकामनाओं का नहीं

अजय बोकिल

नया साल आते ही हमेशा की तरह शुभकामनाओं का बाजार भी शबाब पर है, लेकिन शुभकामना पत्रों (ग्रीटिंग कार्ड्स) का बाजार उतार पर है। हो सकता है कि ज्यादातर लोग यही कहें कि अहम बात शुभकामना है, कैसे या किस रूप में दी जा रही है, यह गौण है। 2021 के लिए चौतरफा ग्रीटिंग से लबरेज तैयार शुभकामना संदेश उपलब्ध हैं। लेकिन आजकल इन्हें ऑन लाइन या डिजीटल फॉर्म में भेजने का चलन बढ़ रहा है। कुछ साल पहले तक नया साल, दिवाली या और किसी खास मौके पर ग्रीटिंग कार्ड का ढेर-सा लग जाता था। जज्बात रंगबिरंगे कागज पर छप कर आते थे, उन्हें सुंदर पेंटिंग या अन्य आकारों में सजाया जाता था।

ग्रीटिंग कार्ड हाथ में आते ही हाथों को कुछ अलग-सी गरमाहट महसूस होती थी। आंखों में सौहार्द की चमक तैर जाती थी। किसने भेजा है? यह जिज्ञासा शांत होने के बाद भेजने वाले के प्रति खामोश-सा आभार और प्रति-दुआ निकलती थी। हालांकि कुछ दिनों बाद वही ग्रीटिंग कार्ड घर के किसी कोने में पड़ा रहता था या रद्दी में भी चला जाता था। इतना जरूर याद रहता था कि हां, फलाने ने फलां मौके पर ग्रीटिंग कार्ड भेजा था, अपन भी कोई शुभकामना पत्र तो भेज दें।

पर अब ग्रीटिंग कार्ड के लिए डाकिए या कूरियरवाले का इंतजार नहीं करना पड़ता। सोशल मीडिया पर तो तारीख बदलने से पहले ही तमाम ग्रीटिंग कार्ड्स, जीआईएफ और मीम्स तक की बमबारी शुरू हो जाती है। इधर से आया और उधर पहुंचाया। जिसे पहली बार मिला, उसने वह शुभकामना संदेश को ठीक से पढ़ने की जहमत भी उठाई है या नहीं, यह जानने का कोई कारगर तरीका हमारे पास नहीं होता। बस इधर से आया और उधर पेला। शुभचिंतन की रस्म पूरी।

इसी बीच यह सवाल मौजूं है कि पहला ग्रीटिंग कार्ड ‍कब और किसने भेजा होगा? इस का जवाब ढूंढें तो प्राचीन मिस्र और चीन में नववर्ष के जश्न पर इसकी शुरुआत हुई। 15 वीं सदी में जर्मन लोगों ने छपे हुए ग्रीटिंग कार्ड (जर्मनी में मुद्रण कला का आविष्कार हो चुका था) भेजना शुरू किया। 19 वीं सदी में डाक व्यवस्था वजूद में आने के बाद भारत सहित दुनिया के कई देशों में ग्रीटिंग कार्ड्स भेजने की प्रथा बड़े पैमाने पर शुरू हुई। इसने एक संगठित और कलात्मक व्यवसाय का रूप ले लिया।

अमेरिका में हर साल सर्वश्रेष्ठ ग्रीटिंग कार्ड्स को पुरस्कार भी दिए जाते हैं। हमारे देश में भी बीते सौ सालों में ग्रीटिंग कार्ड्स का कारोबार काफी बढ़ा। उसने कलात्मकता के नए आयामों को छुआ। छपाई की आधुनिक तकनीक, कागज की सुलभता, शिक्षा और कुछ नया करने की चाहत ने हमारे यहां भी ग्रीटिंग कार्ड कल्चर को लोकप्रिय बनाया। इसने सुभाषितों और एक नई कला को भी बढ़ावा दिया। अच्छे शब्दों, अच्छे वाक्यों में अच्छी बातें दिल को सुकून देने लगीं। भावनाओं के इस आदान-प्रदान को समय रहते बाजार ने भी लपका।

हमारे यहां भी तैयार और एक से एक सुंदर ग्रीटिंग बाजार में मिलने लगे। हिंदू धर्म यूं भी तीज-त्‍योहारों का धर्म है। बाजार ने इसकी ताकत और वैविध्य को बूझा। लिहाजा व्यक्तिगत जन्म‍ दिन से लेकर आंवला नवमी तक के ग्रीटिंग कार्ड की रेंज हमे दिखने लगी। इन ग्रीटिंग कार्डों ने कलाकारों को भी काम दिया। माना जाने लगा कि जितना सुंदर ग्रीटिंग कार्ड, उतनी ही मोहक भावनाएं।

आजकल तो इंस्टेंट मैसेजिंग एप और इंटरनेट विशेज (नेट शुभकामना संदेश) भी आ गए हैं। म्यूजिकल कार्ड्स, एलईडी लाइट्स और हाई टेक कार्ड भी उपलब्ध हैं। इन सबमें हाथ से बने ग्रीटिंग कार्ड्स की महत्ता अभी कम नहीं हुई है। एक अध्ययन बताता है कि ग्र‍ीटिंग कार्ड तुलनात्मक रूप से महिलाएं ज्यादा खरीदती है बजाए पुरुषों के। शायद इसलिए कि वो कहीं ज्यादा जज्बाती होती हैं।

कई बार लगता है कि दुनिया जितनी करीब आती जा रही है, उतनी ही औपचारिक भी होती जा रही है। इसलिए, क्योंकि भारतीय संस्कृति में इस तरह औपचारिक शुभकामना संदेशों का बहुत चलन नहीं था। यानी जो दिल के करीब है, उन्हें क्या शुभकामना देना? यह रिश्तों को औपचारिकता के रैपर में लपेटने की पश्चिमी कोशिश ज्यादा है। हमारे लिए शुभ दिन का मतलब ज्यादा से ज्यादा घर में पूजा-पाठ और बड़ों के पैर छूकर लिया आशीर्वाद ही होता था। बरसों-बरस जिंदगी कुछ इसी तरह बीतती चली जाती थी।

आधी सदी पहले तक ज्यादातर ‍परिवारों में बच्चों के जन्मदिन ‘सेलिब्रेट’ करने का चलन भी नहीं के बराबर था। अमूमन इसे बड़े लोगों और अमीरों का शगल माना जाता था। बच्चे अपने ‘बर्थ-डे’ को लेकर आज जैसे कांशस नहीं थे। हालांकि यह कोई बहुत अच्छी बात नहीं थी। लेकिन अब इन छपे हुए शुभकामना-पत्रों का ज्वार भी उतार पर है। यह ट्रेंड केवल भारत में नहीं, पूरी दुनिया में है। एक समीक्षक ने तो कटाक्ष किया कि ‘आज ग्रीटिंग कार्ड कंपनियों को ही सहानुभूति की जरूरत है।‘

एक अंतरराष्ट्रीय मार्केट रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक सीवीएस और वालमार्ट जैसी नामी कंपनियों को भी अपने कई ग्रीटिंग कार्ड आउट लेट बंद करने पड़े हैं। कारण लोगों की कार्ड खरीदने में घटती रुचि। लोग अब ऑन लाइन ग्रीटिंग पर ज्यादा जा रहे हैं। अमेरिकी ग्रीटिंग कार्ड एसोसिएशन की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका में अभी भी हर साल लोग 6 अरब डॉलर के ग्रीटिंग कार्ड न्यू ईयर समेत विभिन्न अवसरों पर खरीद रहे हैं, लेकिन अब यह ग्राफ नीचे जा रहा है।

ग्रीटिंग कार्ड बिजनेस में पूरी दुनिया में- 2.3 फीसदी सीएजीआर (कंपाउंड एन्युअल ग्रोथ रेट) की कमी आने की संभावना है। यानी पूरी दुनिया में जो ग्रीटिंग कार्ड मार्केट 815 अरब डॉलर का है, वह 2026 तक गिरकर 691 अरब डॉलर तक गिरने की आशंका है। हमारे देश की ‍स्थिति भी इससे बहुत अलग नहीं है। कई दुकानों में नए साल के ग्रीटिंग कार्ड सजे हैं, लेकिन उतने खरीदार नहीं है। पहला कारण तो कोरोना का भय है, दूसरे, ग्रीटिंग कार्ड हार्ड कॉपी में भेजना अब ‘पुरानेपन’ का द्योतक है। जब वॉट्सऐप पर शुभकामनाओं की बमबारी होती जाती हो, तब इक्का-दुक्का ग्रीटिंग कार्ड के जरिए मौन संवाद साधने की फुर्सत किसे है?

यह सही है कि वॉट्सऐप और डिजीटल ग्रीटिंग्स ने शुभकामना संदेशों की आत्मा को धीमा जहर दे दिया है। संदेशे आते हैं, संदेशे जाते हैं..लेकिन मन को भीतर से छुए बगैर ही चले जाते हैं। क्योंकि वर्चुअल में कोई स्पर्श सुख नहीं है। ऐसे संदेश कभी-कभी चौंकाते जरूर हैं, लेकिन दिल में कम ही उतरते हैं। ज्यादातर लोगों को उन संदेशों के भाव सागर में डुबकी लगाने के बजाए उन्हें यथा शक्य तेजी से अगले को फारवर्ड करने की जल्दी होती है। इसमें ‘जोत से जोत जलाते चलो’ का आग्रह तो होता है, लेकिन इस जोत को जलाए रखने का अडिग संकल्प नहीं होता।

बावजूद नए साल के शुभकामना संदेश आ रहे हैं। ऐसा ही एक दिलचस्प संदेश था- अगर आप 2020 में असफल रहे हैं तो 2021 में फिर ट्राइ करिए। एक और संदेश था- अपने अतीत को गुड बाय कहिए, अपने भीतर के नए साल को गले लगाइए। कुछ लोगों ने मास्क में लिपटा 2021 साल भी भेजा। दुनिया बदलती है। शुभकामनाओं के आदान प्रदान के तरीके भी बदल रहे हैं। सच तो यह है कि कागज के लिए हार्ड कॉपी जैसा शब्द ही अपने आप में बेजान सा है। चिट्ठी में लिखे शब्दों की ऊर्जा वॉट्सऐप या एसएमएस की इबारत में भी हो, यह कतई जरूरी नहीं है।

राहत की बात इतनी है कि शुभकामना पत्रों का बाजार जरूर घट रहा हो, लेकिन शुभकामनाओं का मार्केट अभी कम नहीं हुआ है। सभ्यता की दौड़ में और खुद के वजूद को कायम रखने की होड़ में भी सुंदर, सकारात्मक और ऊर्जावान शब्दों की महत्ता अभी मरी नहीं है। बदला है तो उसका अंदाज और कहन का तरीका। ग्रीटिंग इस साल भी आ रहे हैं, लेकिन उनमें जज्बात की सपाटबयानी और परस्पर शुभ चिंतन की रस्म अदायगी ज्यादा लगती है।

‘नव वर्ष शुभ हो’ यह वाक्य कई बार इतना भोंथरा महसूस होता है कि लगता है कि पिछले साल भी तो यही कहा था। फिर क्या हुआ? यानी मनुष्य की दुआ और वक्त की चाल में कोई तालमेल नहीं होता? फिर हम हैं कि शुभकामनाएं दिए जाते हैं। क्यों?

 

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