श्रद्धांजलि : कमल दीक्षित
हेमंत पाल
हिंदी पत्रकारिता में कुछ ऐसे लोग हुए हैं, जिनमें अच्छा लिखने के साथ अच्छा लिखने वालों की पहचान करने की भी काबिलियत थी। ऐसा ही एक नाम कमल दीक्षित का भी है, जो अब हमारे बीच नहीं रहे। वे अच्छे पत्रकार, अच्छे संपादक होने के साथ पत्रकारिता के अच्छे शिक्षक भी थे। वे पत्रकारिता की ऐसी पाठशाला थे, जहाँ से जो भी ‘दीक्षित’ होकर निकला, वो कभी अपने काम में असफल नहीं हुआ। उन्होंने अपने जीवनकाल में पत्रकारिता की कई प्रतिभाओं को पहचाना और उन्हें आगे बढ़ने का मौका दिया। उनके बारे में कहा जाता था कि वे पत्थरों के बीच से पारस को पहचान लेते थे और उसे तराशते भी थे। ऐसा उन्होंने एक बार नहीं, कई बार किया। मुझे लगता नहीं कि उन्होंने कभी प्रतिभा को पहचानने में गलती की हो। वे सिर्फ नाम से ही ‘दीक्षित’ नहीं थे, कर्म से भी दीक्षित रहे और हिंदी पत्रकारिता में कई नए चेहरों को उन्होंने ‘दीक्षित’ भी किया।

मैंने अपनी साढ़े तीन दशक से ज्यादा समय की पत्रकारिता में एक दर्जन से ज्यादा संपादकों के साथ काम किया। उनका मिजाज देखने के साथ उनके काम करने की शैली और तत्काल फैसले लेने का तरीका भी बहुत नजदीक से देखा है। इस नजरिए से कह सकता हूँ कि दीक्षितजी में जो क्षमता थी, वो दूसरे संपादकों में कम ही नजर आई। अच्छा लिखना स्वयं की काबिलियत हो सकती है, जो पत्रकारिता में आने की पहली शर्त है। लेकिन, बतौर संपादक अखबार की पूरी टीम को साथ लेकर चलना, उनसे समयबद्ध काम करवाना और उनका उत्साह बढ़ाए रखना सिर्फ दीक्षितजी की ही खूबी थी। मैंने उन्हें कई मौकों पर ऐसे फैसले लेते देखा, जो सामान्य बात नहीं थी। न तो वे अपने आसपास संपादक होने का आभामंडल लेकर चलते थे और न कभी इसका अहसास ही कराते। उनके व्यवहार में पारदर्शिता इतनी थी, कि कोई भी उनके आरपार झाँक ले।

मैं पत्रकार नहीं बनना चाहता था, सिर्फ हिंदी से प्रेम था तो यदा-कदा कुछ लिखता रहता। 1982 में मैंने धार में मेडिकल स्टोर शुरू किया था। संपर्कों का दायरा विशाल था, तो कुछ पत्रकारों का मेरे पास आना-जाना लगा रहता था। तब कमल दीक्षितजी इंदौर के ‘नवभारत’ में संपादक थे। कुछ लिखता तो ‘नवभारत’ के संवाददाता के मार्फ़त अखबार दफ्तर में लिफाफा भिजवा देता। हर बार मेरा लिखा छप जाता। अच्छा भी लगता कि बिना किसी काट-छांट के मेरा लिखा छपने लगा। इस बीच एक बार दीक्षितजी से मुलाकात हुई। आश्चर्य हुआ कि उन्होंने मुझे नाम से पहचान लिया। उत्साहित करते हुए कहा कि ऐसे ही लिखते रहो। कुछ नए विषयों पर भी लिखकर भेजो। उनके इन दो शब्दों ने मेरी सोच को बदल दिया। मैंने गंभीर मुद्दों पर लिखा, जो छपा भी। 1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद की स्थितियों पर ‘नवभारत’ में लगातार लिखा। इस बीच एक मौका ऐसा आया, जब उन्होंने मुझसे कहा कि तुम जिस तरह लिखते हो, वो खालिस पत्रकार वाले गुण हैं। तुम ज्यादा दिन मेडिकल स्टोर नहीं चला सकोगे। फिर भी मैं नहीं चाहूंगा कि तुम रिस्क लो, पर अपनी प्रतिभा को समझो।

इसके बाद मैं लगातार लिखता और छपता रहा। फर्क ये आया कि मेरे लेखन को ‘नवभारत’ के सभी संस्करणों में जगह मिलने लगी। ‘रविवार’ जैसी नामचीन समाचार पत्रिका में भी कुछ छपने लगा था। एक बार ‘नवभारत’ के नागपुर संस्करण में उप संपादक की जगह निकली। मैंने न जाने किस मूड में या अपने आपको परखने के लिए अपना आवेदन भेज दिया। साथ में कुछ कतरनें लगा दी। फिर इस बात को भूल भी गया। क्योंकि, नागपुर जाकर पत्रकारिता करने का तो सवाल ही नहीं था। लेकिन, एक दिन दीक्षितजी ने संवाददाता के जरिए एक चिट्ठी भेजी। उसमें लिखा था ‘इंदौर आकर मिलो, कुछ बात करना है।’ बात सामान्य थी, लेकिन मेरे जहन में वो बात नहीं थी, जो होना थी और जिसने मेरे भविष्य का रुख बदल दिया। एक दिन मेडिकल स्टोर के काम से इंदौर गया तो दीक्षितजी से मिलने अखबार के पुराने मनोरमागंज वाले दफ्तर चला गया। वहाँ दीक्षितजी से जब मिला तो वे छूटते ही बोले कि यदि अखबार लाइन में आना है, तो इंदौर आ जाओ, नागपुर क्यों जाना चाहते हो। अब मुझे बात समझ आ गई कि बात वहाँ से यहाँ आ गई है। उन्होंने मेरा वो आवेदन दिखाया जो मैंने नागपुर भेजा था। उस पर लिखा था कि मुझे इंदौर में ज्वाइन करवाया जाए।

अब मेरे लिए धर्मसंकट की घड़ी थी। जमा जमाया मेडिकल स्टोर का काम-धाम बंद करके पत्रकारिता में आया जाए, या फिर पत्रकारिता को बतौर शौकिया ही अपनाया जाता रहे। इसी ऊहापोह में था कि परिवार का सहयोग मिला और मैंने मेडिकल स्टोर बंद करने जैसा साहसिक फैसला लिया। मुझे वो दिन याद है, जब मैंने ‘नवभारत’ में काम करना शुरू किया। वो दिन था 7 मार्च 1985 और उस दिन रंगपंचमी थी। कमल दीक्षितजी ने यहाँ काम के दौरान मुझे हर फील्ड में परखा। रिपोर्टिंग, आंचलिक पत्रकारिता, डेस्क पर काम से लगाकर ख़बरों का संपादन भी करवाया। मैं नहीं जान सका कि वे मुझमें क्या खोज रहे थे, पर उन्होंने मुझे काम करने के कई मौके दिए। सबसे बड़ा मौका था, बंबई में हुए ‘कांग्रेस शताब्दी समारोह’ को कवर करने का। ‘नवभारत’ पुराना अखबार होने से उसमें राजनीतिक विश्लेषकों की कमी नहीं थी। लेकिन, दीक्षितजी ने मुझसे कहा कि तुम बंबई जाओ और अच्छा काम करो। मुझे विश्वास है कि तुम ये अच्छी तरह से कर लोगे। मुझे दीक्षितजी के विश्वास पर खरा उतरने के लिए इस चुनौती को पूरा करना था और मैंने वो कर भी दिखाया। मुश्किलें बहुत आई, पर मैं पीछे नहीं हटा।

इसके बाद उन्होंने मुझसे झाबुआ की सूखा त्रासदी पर फील्ड रिपोर्टिंग करवाई, जो काफी चर्चित रही। आदिवासियों पर पुलिस के अत्याचार पर मैंने कई सनसनीखेज ख़बरें लिखी, जिस पर पर सरकार से कार्रवाई भी हुई। इससे अखबार की साख तो बढ़ी ही, मेरा आत्मविश्वास भी मजबूत हुआ। कहने का आशय यह कि कमल दीक्षितजी ने काम करने और कुछ भी करने के भरपूर मौके दिए। इसके बाद मैंने ‘नईदुनिया’ में कई साल काम किया और मुंबई ‘जनसत्ता’ में भी रहा। हर अखबार में मैंने कई चुनौतीपूर्ण काम किए, इसलिए कि मेरी बुनियाद मजबूत थी, जिसे दीक्षितजी ने गढ़ा था।

ये सिर्फ मेरी अपनी कहानी नहीं है। कमल दीक्षितजी के बारे में ऐसे संस्मरण कई पत्रकारों के पास हैं। उस दौर में ‘नवभारत’ पत्रकारिता की पाठशाला था, जहाँ से ‘दीक्षित’ होकर कई पत्रकार निकले और शिखर पर पहुंचे। लेकिन, अब उस पाठशाला पर हमेशा के लिए ताला डल गया। अब वहाँ पत्रकारिता की प्रतिभाओं को तराशने और खुले आकाश में मौका देने वाला कोई शिक्षक नहीं बचा। संभवतः कमल दीक्षितजी उस पाठशाला के अंतिम शिक्षक थे। मोबाइल फोन में उनका नंबर डिलीट करते हुए, दो पल को हाथ कांपे, पर ये तो करना ही था। क्योंकि, इस नंबर पर वो आवाज कभी नहीं गूंजेगी, जो मेरे चरण स्पर्श कहने पर मेरा नाम लेकर आशीर्वाद देती थी। बेहद दुखद, लेकिन नियति का सच यही है।(मध्‍यमत)
(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।)