भगवान सिंह

मैं उन लोगों का साथ देना चाहता हूं जो लोकतंत्र की रक्षा के लिए भाजपा को पराजित करना चाहते हैं;  परंतु उन लोगों के साथ नहीं हो सकता जो भाजपा को पराजित करने के लिए लोकतंत्र को नष्ट करना चाहते हैं। यह देश कई बातों में न्यारा है, पर इसका इतिहास भी कुछ मामलों में दूसरों से अलग है। यहीं ऐसे अदूरदर्शी पैदा होते रहे हैं जो यह सोच कर देश के शत्रुओं को आमंत्रित और उनकी सहायता करते रहे हैं कि वह कुछ नुकसान पहुँचा कर वापस चला जाएगा और फिर सत्ता उनके हाथ में आ जाएगी। चाहे वे बौद्ध मत के राजकीय संरक्षण से रुष्ट ब्राह्मण रहे हों, या जयचंद, राणा सांगा, ब्रिटिश सत्ता से मुक्ति के लिए फारस के शाह, हिटलर  की ओर उम्मीद से देखने वाले या चाइनाज चेयरमैन आमादेर माउत्सेतुंग के नारों से कोलकाता की दीवारों को रंगीन कर देने वाले नक्सल।

इस इतिहास को देखते हुए यह नहीं लगता कि जो लोग पाकिस्तान या चीन से छिपी और खुली साँठगाँठ रखने वाले   आतंकवादियों और शत्रुदेशों को अपने इरादों को सफल बनाने में सहायक के रूप में देखते हैं या उनका बचाव करते हैं वे केवल शगल के लिए ऐसा करते हैं। वे सचमुच ऐसी आपदाएं भीतर से पैदा कर और बाहर से आमंत्रित करके अपने ही देशवासियों की सुख-शान्ति भंग करना और अराजकता लाना चाहते हैं। यदि वे इस इरादे से नए और बेहतर विकल्प सुझाते, आकर्षक योजनाएँ बनाते, अपने दल और संगठन को मजबूत करते हुए अपनी शक्ति का विस्तार करते हुए सत्ता परिवर्तन के स्वप्न देखते तो ध्वंसात्मक कार्यक्रमों और देशद्रोही शक्तियों का साथ देने की आवश्यकता न होती।

सशक्त विपक्ष के अभाव में लोकतंत्र नाममात्र को लोकतंत्र रह जाता है। अशक्त और हताश विपक्षी दल ही देशद्रोही गतिविधियों से सत्ता को विफल करने का रास्ता चुनते और विकास में बाधक बनते हैं। राजनीतिक दल अपनी हताशा में ऐसा करें और अपनी नकारात्मक भूमिका के कारण अपना जनाधार लगातार खोते जाएँ, यह उनकी समस्या है, परन्तु बुद्धिजीवी भी उनके साथ खड़े हो जाएँ, उसी भाषा में बात करें, उसी क्षरण के शिकार हो जाएँ तो मानिये कि सर्वनाश की अन्त्याहुति संपन्न हो गई।

लेखन, चिंतन, शिक्षा, अमलातंत्र, न्यायतंत्र सभी का ऐसा राजनीतीकरण हुआ कि सबकी साख दांव पर लग गई, सभी भीतर से खोखले और बाहर से बड़बोले हो गए। लेखक अपने समाज से कट गया, वह बोलता अधिक है और शिकायत करता है कि लोग सुनते कम हैं, वह सुनाता पश्चिम को है  और उम्मीद करता है कि पूरब के लोगों की समझ में उसकी बात आए। अपनी महत्वाकांक्षा से बेसुध रचनाकार चाहता है पश्चिम के लोग उसकी प्रतिभा को पहचानें और उम्मीद करता है कि यूरोप के लोग उसे समझें और आदर दें। विश्वविजय की आकांक्षा में अपने घर से भी बेदखल हुए ‘यशस्वी’ रचनाकारों पर तरस खाया जा सकता है परंतु उनके साथ खड़ा नहीं हुआ जा सकता।

चिंतन का यह हाल कि उसकी पहचान करने वाले पारखी इस देश में नहीं। विदेशी उन्हें अपने उपयोग का समझ कर उनकी संस्तुति करेगा तो ही वे ध्यान देने योग्य होंगे। हमारे पास अपना पारखी तक नहीं है। शिक्षा की यह दशा कि बेकारी अपरंपार है,  परंतु प्राइमरी स्कूलों के लिए भी योग्य शिक्षक नहीं मिल रहे हैं। विश्वविद्यालयों में पुराने शिक्षकों का कार्यकाल इसलिए बढ़ाया जाता रहा कि योग्य अध्यापकों का अभाव है।

जैसे सेना को दलगत राजनीति से विमुख रहना चाहिए,  उसी तरह अमला तंत्र को भी राजनीतिक पक्षधरता से शून्य रहना चाहिए। ये दोनों लोकतंत्र की रक्षा,  और निर्वाह की अनिवार्य शर्ते हैं। इसी के बूते पर विरोधी विचारों वाले दलों का शासन आने पर, उसके निर्णयों के अनुसार अपना सर्वोत्तम योगदान दे सकते और इस परीक्षा से गुजर सकते हैं कि देशहित में किसकी नीति है, यही फौजी तानाशाही से सुरक्षा की भी गारंटी थी।

लोग आपातकाल के दौरान इंदिरा जी की कठोरता को देखते हैं,  परंतु इस बात की ओर उनका ध्यान नहीं जाता कि इन सभी संस्थाओं को नष्ट करने में उनकी अनन्य भूमिका थी।   मैंने जब सरकारी नौकरी पानी चाही थी तो मुझे नियुक्ति पत्र देने से पहले यह पता लगाया गया था मैं किसी अपराध में संलिप्त तो नहीं और अपराधों की कोटि में यह भी आता था कि मैं शासक दल सहित किसी राजनीतिक दल से जुड़ा हुआ तो नहीं हूँ। सोवियत प्रभाव बढ़ने के साथ ही लोग सेवा में रहते हुए भी अपने वामपंथी राजनीतिक विचारों को प्रकट करने लग गए थे और यह सिलसिला आगे लगातार चलता रहा और किसी को पता तक नहीं चला कि इस बीच क्या खोया और क्या पाया है।

यही वह  दौर है, जिसमें सभी ने अपनी साख खो दी और आज तक वापस अपनी पुरानी साख पर लौट न पाए।  पातकी केवल दक्षिणपंथी सहानुभूति रखने वाले बने रहे।  सभी का औपनिवेशीकरण हो गया और उसी केंद्र-नियंत्रित तंत्रों की विरासत मोदी सरकार को मिली।
(लेखक वैदिक साहित्य के अतिरिक्त भाषा, इतिहास व संस्कृति के अध्‍येता हैं। यह आलेख उनकी फेसबुक वॉल से साभार)
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