राकेश अचल 

समय बदलता है तो समाज बदलता है, समाज बदलता है तो समाज के मूल्य बदलते हैं। और इतनी तेजी से बदलते हैं कि उनके साथ अपने आपको बदलना कठिन हो जाता है। कलिकाल में मूल्यों का बदलाव सुपरसोनिक स्पीड पकड़ चुका है और हम हैं कि जहाँ पहले थे, वहीं आज भी खड़े हैं। हमसे बेहतर तो अपने मनसुख दादा हैं जो कम से कम समय के साथ तो चल रहे हैं। बहुत दिनों बाद मैंने मनसुख को आंदोलन के मूड में देखा। उनके हाथ में तख्ती थी। तख्ती पर मैडम कौर का फोटो था। फोटो के नीचे लिखा था, ‘हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है।’

प्राय: छुट्टी के दिन मैं मनसुख का सामना करने से डरता हूँ, ठीक उसी तरह जैसे हमारी सरकार सवालों का सामना करने से डरती है। डरना कापुरुष की निशानी नहीं है। डरना एहतियात है। जो नहीं डरता, वो मर जाता है। खैर! इस बार छुट्टी के दिन हमने मनसुख से बचने के बजाय उन्हें टोकने का फैसला लिया। खादी की भक्क सफेद कमीज और धोती पहने मनसुख के सर पर फेंटा भी था।

उन्हें देख हमें टिकैत साहब की याद आ गयी। फेंटा कमर में भी बांधा जाता है और सर पर भी। दोनों के बाँधने का एक ही मकसद होता है, और वो कि सामने वाले से टकराना है। मनसुख किससे टकराने वाले थे, ये जानने में हमारी खासी दिलचस्पी थी। इसलिए हमने मनसुख को टोका।

‘दद्दा राम-राम’

मनसुख की बांकी चाल में ब्रेक तो नहीं लगा लेकिन उन्होंने पलट कर हमारी तरफ देखा और प्रत्युत्तर में बोले -‘राम-राम बेटा,राम राम’

‘कहाँ भागे जा रहे हो सवेरे-सवेरे महाराज!’

‘लौटकर बताता हूँ, अभी जरा जल्दी में हूँ’, मनसुख ने हमारे सवाल का उड़ता सा उत्तर दिया, लेकिन हम कहाँ मानने वाले थे। फिर प्रश्न दाग दिया।

‘अरे, चाय-साय तो पीते जाओ!’

मनसुख की रफ्तार अचानक धीमी हो गयी, उन्हें चाय और साय पिलाने वाले बहुत भाते हैं। वे प्रधानमंत्री जी का सम्मान भी इसीलिए करते हैं क्योंकि वे बचपन में चाय बेचते थे। मनसुख ने अपने सर से फेंटा खोलते हुए मेज पर रखा और अपनी जूतियां उतार कर, बरामदे में पड़े तख्त पर पालथी मारकर बैठ गए। उनकी इस मुद्रा में बैठने का मतलब है कि वे अब जमेंगे, भागेंगे नहीं। आदमी की मुद्राओं को पहचानना बड़ा कठिन काम है। लेकिन हम अखबार वाले अभ्यास करते, करते इसमें पारंगत हो जाते हैं। बता सकते हैं कि किस मुद्रा के क्या निहितार्थ हैं?

‘कहाँ की तैयारी करके निकले हो सरकार?’ मैंने मनसुख से फिर अपना सवाल दोहराया। वे मुस्कराये, उनकी मुस्कराहट में भी रहस्य झाँक रहा था। अपनी भूरी मूछों पर ताव देते हुए बोले- ‘गांधी चौक पर किसानों का धरना है, सरकार के नए किसान विधेयक के खिलाफ, उसी में भाग लेने जा रहा हूँ’ मनसुख ने हमारी जिज्ञासा का समाधान किया।

‘धरना! और आप!!’

‘क्यों, क्या मैं धरने में भाग नहीं ले सकता, खांटी किसान हूँ भाई’ मनसुख ने प्रतिप्रश्न किया। शायद उन्हें मेरा सवाल रास नहीं आया था।

‘जरूर ले सकते हैं धरने में भाग, आपको तो धरना देने का जन्मसिद्ध हक है दादा!’, हमने मनसुख को मस्का मारते हुए कहा। मनसुख भी पुराने आदमी हैं, सो जानते हैं कि कब कौन उनकी खिल्ली उड़ा रहा है, और कब, कौन मस्का मार रहा है। मनसुख मुस्कराये। मेज पर रखी पानी की बोतल से पानी गटकते हुए उन्होंने हमने तिरछी नजरों से देखा। पानी पीने के बाद तुनकते हुए कहा- ‘मै अपना देखूं, तुम अपना देखो’

‘क्या अपना, तुम्हारा कर रहे हो महाराज!’ मैंने लगभग बिचकते हुए कहा। मनसुख ने आज तक इस तरह की बात नहीं की थी। वे संस्कारी आदमी हैं, वसुधैव कुटुंबकम के सिद्धांत से बंधे हुए हैं। अपने-पराये की बात तो वे सोच भी नहीं सकते। मुझे उलझन में पड़ा देख मनसुख मुस्कराये, बोले-

‘पंडित! किस दुनिया में रहते हो? आजकल का यही फार्मूला है। ‘मै अपना देखूं, तुम अपना देखो’ उन्होंने फिर दोहराया। फिर तफ्सील से बोले- ‘देखिये ये बदलते दौर का नया सामाजिक फार्मूला है, जो इस पर नहीं चलेगा, मारा जाएगा। अब देखिये न किसान विधेयक के विरोध में अकाली दल की हरसिमरत कौर साहिबा ने अपना मंत्री पद छोड़ दिया, क्योंकि इस मुद्दे पर उन्हें अपनी सियासत देखना थी। प्रधान मंत्री जी ने उन्हें एक बार भी नहीं समझाया, या रोका, क्योंकि वे जानते हैं कि हरसिमरत को अपना देखना है। नहीं देखेगी तो परेशानी में पड़ जाएगी। ‘मनसुख ने लम्बी व्याख्या की। मैंने उनके आख्यान पर अपनी पलकें झपकाईं, जैसे मेरी कुछ समझ न आया हो। मनसुख मेरी इस मुद्रा को पहचानते हैं सो फिर बोल पड़े-

‘देख भाई! इस मुद्दे पर विरोध तो होना ही था सो प्रधानमंत्री जी ने अपने गठबंधन के भीतर से ही विरोध की आजादी दे दी। अकाली दल ने सिर्फ इस्तीफा दिया है, सरकार से समर्थन वापस नहीं लिया है। इस तरह सरकार का काम भी चल गया और अकालीदल का भी’ उंगली काटकर शहीद हो गयीं कौर मैडम’

मनसुख का वाक्य लंबा था लेकिन स्पष्ट था। मैंने विस्मय से अपनी आँखों को चौड़ा किया। विस्मय में यदि आप आँखें चौड़ी न करके दिखाएँ तो सामने वाले को यकीन ही नहीं होता कि उसने कोई विस्मयकारी बात कही भी है। सामने वाले को विस्मय में डालना भी एक कला है। इस कला में अनेक लोग पारंगत हैं। वे अपनी बातें भी आँखें चौड़ी करके ही कहते हैं। वैसे सरकार का किसान विधेयक भी कम विस्मयकारी नहीं है। इस विधेयक को पंजाब और हरियाणा का किसान सबसे पहले समझ गया, यूपी और मध्य्प्रदेश के किसान को ये जरा देर में समझ में आएगा। महाराष्ट्र का किसान तो इसे समझ ही नहीं पायेगा क्योंकि वहां का विपक्ष अभी फिल्मी सितारों की थाली में उलझे हुए हैं।

बहरहाल मनसुख इस विस्मयकारी घटना से एकदम सजग हो गए थे। कहने लगे- ‘ये क़ानून तो सरकार को वापस लेना ही पडेगा पंडित!’

‘और अगर न लिया तो क्या होगा?’ मैंने प्रतिप्रश्न दागा।

‘ईंट से ईंट बजा दी जाएगी सरकार की’ मनसुख ने भी सधा सा प्रहार किया।

‘क्या सरकार गिर जाएगी, इस मुद्दे पर?’ मैंने फिर पूछा

‘ना! सरकार तो नहीं गिरेगी, हाँ कुछ लोगों के भाव जरूर गिर जायेंगे, कुछ के चढ़ भी सकते हैं’ मनसुख ने अपना अनुभव प्रकट किया। मैं मनसुख से उलझता, इससे पहले ही चाय आ गयी। उन्होंने कप से बसी में चाय उड़ेली और दो, तीन फूंक मारकर उसे ठंडा कर सुड़क लिया। दो बार में पूरा कप खाली हो गया। कप-बसी को एक तरफ रखते हुए मनसुख बोले-

‘अभी जल्दी में हूँ, अपुन इस मुद्दे पर फिर कभी तफ्सील से बातें करेंगे, धरने के लिए देर हो रही है।‘ मनसुख ने हमारी और देखे बिना अपनी रवानगी डाल दी। मैंने भी सोचा, चलो अच्छा हुआ जो अब समाज अपना-अपना देखने में उलझ गया है। यानि ‘मै अपना देखूं,तुम अपना देखो’

मैं डिज्नी के लिए ये जिंगल लिखने वाले का मन से आभार प्रकट करना चाहता हूँ, क्योंकि उसने समाज में हो रही तब्दीली को बहुत बारीकी से पकड़ कर रेखांकित किया है। आप देखिये उसका ये जिंगल कितनी जल्द लोगों की जुबान पर चढ़ गया है। ठीक इसी तरह जैसे संसद में सरकार का हर झूठ भक्तों की जुबान पर चढ़ जाता है। भक्त मान लेते हैं कि  लॉकडाउन के समय जिंदगी बचाने के लिए अपने घरों को लौटते हुए लोगों की मौत का आंकड़ा सरकार के पास नहीं है। वे मान लेते हैं कि जिन कोरोना वारियर्स के ऊपर सरकार ने हैलीकाप्टर से पुष्प वर्षा कराई थी उनकी कोरोना से मौत का कोई आंकड़ा सरकार के पास नहीं है।

अब जमाना यही है कि- ‘मैं अपना देखूं, तुम अपना देखो…’