मरहम नहीं लगा सकते तो जख्‍मों पर नम‍क तो मत रगडि़ए

दो दिन पहले मुझे वाट्सएप पर एक मजेदार कमेंट मिला। कमेंट कुछ यूं था-

मार्टिन लूथर किंग ने कहा-

“अगर तुम उड़ नहीं सकते तो, दौड़ो !

अगर तुम दौड़ नहीं सकते तो, चलो !

अगर तुम चल नहीं सकते तो, …. रेंगो !

पर आगे बढ़ते रहो !”

तभी एक इन्दोरिये ने गुटका थूकते हुऐ कहा- वो सब तो ठीक है गेलिए…. पर जाना कां हे।

यह जोक मुझे इसलिए पसंद आया क्‍योंकि यह मोदी सरकार के एक ताजा ताजा बने मंत्री की बात पर फिट बैठता है। लोग नौकरशाह से राजनेता बनते हैं और काफी एडि़यां घिसने के बाद मंत्री बन पाते हैं। लेकिन ये पट्ठा नौकारशाही से रिटायर हुआ और मोदी जी की मेहरबानी से सीधे मंत्री बन गया। यह मंत्री है के. जे. अल्फोंस जिसे केंद्र सरकार में पर्यटन विभाग का स्‍वतंत्र प्रभार वाला राज्‍य मंत्री बनाया गया है।

ये अल्‍फोंस महाशय भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) की 1979 बैच के केरल कैडर के अधिकारी रहे और 2006 में इन्‍होंने जब नौकरी छोड़ी तो ये दिल्‍ली विकास प्राधिकरण के आयुक्‍त थे। इन्‍हीं अल्‍फोंस महोदय ने शनिवार को पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों का पक्ष लेते हुए एक क्रांतिकारी बयान दिया। उनका कहना था कि जिनके पास कार और बाइक है, वे भूखे नहीं मर रहे हैं और पेट्रोल डीजल की बढ़ी हुई कीमतों का भुगतान करने में सक्षम हैं।

अपने बयान को तर्कसंगत ठहराने के लिए अल्‍फोंस ने आगे जोड़ा- पेट्रोलियम उत्पादों से मिलने वाला पैसा गरीबों के कल्याण के लिए निवेश किया जाएगा। हम यहां (सरकार में) गरीबों के कल्याण, हर गांव में बिजली व्यवस्था को सुनिश्चित कराने, मकान व शौचालय बनाने के लिए हैं। इन कामों के लिए काफी अधिक पैसा चाहिए। इसलिए हम उन लोगों पर टैक्‍स लगाने जा रहे हैं जो इसका भुगतान कर सकते हैं।

अल्फोंस ने कहा, ‘’पेट्रोल कौन खरीदता है, जिसके पास कार, बाइक होगी। निश्चित तौर पर वह भूखा तो नहीं होगा। जो इसका (कार या बाइक खरीदने का) भुगतान कर सकता है उसे पेट्रोल डीजल की कीमतों का भुगतान भी करना ही होगा।‘’ अपने बयान को राजनीतिक रंग देते हुए वे बोले- ‘’यूपीए के कार्यकाल में जो भी पैसा सरकार को मिला, मंत्रियों ने खा लिया, चुरा लिया। सत्ताधारी पार्टी के लोग पचा गए।‘’

मोदी जी की नजरों में चढ़े ये अल्‍फोंस महोदय राजनीतिक रूप से लेफ्ट से राइट हुए हैं। मुझे पता नहीं कि यदि ये मोदी मंत्रिमंडल में न लिए जाते और लेफ्ट साइड में ही रहे होते तो पेट्रोल डीजल के बढ़े हुए दामों पर इनकी क्‍या प्रतिक्रिया होती। लेकिन उनका बयान राजनीति में भी नौकरशाही के गिरगिटी स्‍वभाव का ही परिचायक है।

दरअसल इस सरकार में भी वो बुराइयां लगातार देखने में आ रही हैं जो पिछली यूपीए सरकार में थीं। वहां भी खेले खाए लोग थे और उन्‍हें आम आदमी की परेशानी या जिल्‍लत भरी जिंदगी से कोई लेना देना नहीं था। वे अपनी ही मौज मस्‍ती में डूबे रहते थे। अल्‍फोंस का यह बयान भी उसी असंवेदनशील मानसिकता का प्रतीक है जो ऊपर बैठे लोगों के स्‍वभाव का सहज अंग बनती जा रही है।

खुद अल्‍फोंस ने पूरी जिंदगी सरकारी सुविधाओं का उपभोग किया। उन्‍हें सरकार की ओर से तमाम सारी सुविधाएं गाड़ी-घोड़ा, बंगला, नौकर-चाकर सब कुछ मिलते रहे होंगे। रिटायर होने के बाद भी सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार उनकी पेंशन एक लाख रुपए प्रतिमाह से अधिक बनती है। यह भी तय है कि सरकार ने यदि उन्‍हें मंत्री बनाया है तो उन्‍हें संसद के किसी सदन का सदस्‍य भी बनाया ही जाएगा जिसमें ज्‍यादातर संभावना उनके राज्‍यसभा छह सदस्‍य बनने की है।

यानी आने वाले छह सालों तक ये अल्‍फोंस महाशय सांसद के नाते तमाम सारी मुफ्त सुविधाओं का उपभोग करेंगे। तो जिसका ज्‍यादातर खर्च हमेशा सरकार उठाती आई हो और आगे भी सरकार को ही उठाना हो, तो ऐसे आदमी को क्‍या फर्क पड़ता है कि पेट्रोल 80 रुपए लीटर मिले या 800 रुपए लीटर। होता रहे पेट्रोल महंगा, अपने बाप का क्‍या जाता है।

लेकिन जो जनता इन बढ़े हुए दामों को और बढ़ती महंगाई को भुगत रही है, जरा उसकी जगह खुद को रखकर देखिए। आपने तो जबान हिलाते हुए बड़ी आसानी से कह दिया कि जिसके पास कार या बाइक है वह कोई भूखा नहीं मर रहा, उसे पेट्रोल डीजल के दाम चुकाना ही होंगे। लेकिन चार दिन के मंत्रीजी! जरा किसी दिन वे आंकड़े मंगवाकर भी देखिए कि कितने लोगों ने अपनी रोजी रोटी के लिए ये बाइक या गाडि़यां कर्ज लेकर खरीदी हैं और वे कितनी मुश्किल से इसकी मासिक किस्‍त निकाल पा रहे हैं।

आप तो वही बात कर रहे हैं कि चल नहीं सकते तो रेंगिये… यह कोई बात हुई भला! आखिर कोई मं‍त्री इस तरह का पत्‍थरदिल बयान कैसे दे सकता है? और क्‍या हुआ है भाजपा को, उसकी संवेदनशीलता को? क्‍या यह वही पार्टी है जिसने यूपीए सरकार के समय योजना आयोग द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दिए गए उस हलफनामे पर जमीन आसमान एक कर दिया था जिसमें कहा गया था कि गांव में रहने वाला आदमी यदि प्रतिदिन 26 रुपए से अधिक और शहर में रहने वाला 32 रुपए से अधिक खर्च करता है तो वह गरीब नहीं है।

आज आपने बाइक वालों के बारे में यह बात कही है, कल को आप कहेंगे जो आदमी सांस लेता है तो वह स्‍वस्‍थ और जीवित ही है, उसे अपने जिंदा रहने का कर्ज तो सरकार को चुकाना ही होगा। यह सरकार उसे जिंदा रहने लायक सांस जो उपलब्‍ध करा रही है। ऐसा लगता है कि इस सरकार के मंत्री भी गर्राने लगे हैं। उन्‍हें न तो जमीनी हकीकत से कुछ लेना देना बचा है और न ही लोगों के रोजमर्रा के दुखदर्द और कठिनाइयों से।

यहां मुझे अपने प्रिय कवि कबीर याद आ रहे हैं। उनका एक दोहा इस सरकार को भी कभी नहीं भूलना चाहिए, कबीर ने कहा है-

दुर्बल को न सताइये, जाकी मोटी हाय

मरी खाल की सांस से, लोह भसम हो जाय

जनता के धैर्य की इतनी परीक्षा मत लीजिए हुजूर, उसके जख्‍म पर मरहम नहीं लगा सकते तो कम से कम नमक तो मत रगडि़ए, कहीं बाद में पछताना न पड़े…

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