अजय बोकिल

क्या तोक्यो ओलिंपिक भारतीय हॉकी के सुनहरे दिनों के लौटने का संदेश लेकर आया है? न सिर्फ पुरुष बल्कि महिला हॉकी खिलाडि़यों का सेमीफाइनल में पहुंचना यही साबित करता है कि भारतीय हॉकी फीनिक्स पक्षी की तरह अपनी स्वर्ण भस्म से फिर जिंदा हो रही है। खासकर महिला हॉकी के क्वार्टर फाइनल के यादगार मुकाबले में भारत की बेटियों ने धुरंधर ऑस्ट्रेलिया को हराने का कारनामा जिस जज्बे के साथ कर दिखाया, उससे लगा कि ये शेरनियां किसी और मिट्टी की बनी हैं। कुछ बेहतर कर दिखाने की भारत की पुरुष और महिला हॉकी टीमों की यह जुगलबंदी पंडित रविशंकर के सितार और उस्ताद बिस्मिल्ला खान की शहनाई की माफिक है।

भारत की दोनों हॉकी टीमें मेडल लेकर लौटें या न भी लौटें, लेकिन इन दोनों टीमों के खेल और जज्बे ने देश को जो संदेश दिया है, वो यही है कि जिस हॉकी को हम चालीस साल से डूबत खाते के रूप में देखने लगे थे, उसके बारे में हमे अपनी सोच अब बदल लेना चाहिए। इसलिए भी कि बीते चार दशकों से बाजारवाद की सीढ़ी पर चढ़कर क्रिकेट मानो हमारी रग-रग में समा गया है, जबकि खेलों की असल दुनिया तो यहां से शुरू होती है। हॉकी को तो ‘गरीबों का खेल’ समझा जाने लगा था। वरना चार दशक पहले तक देश में हॉकी क्रिकेट से ज्यादा लोकप्रिय थी और ओलिंपिक की पदक तालिका में भारत की लाज रखने का जिम्मा भी वही निभाती आ रही थी।

पहली बार क्रिकेट का विश्वकप जीतने के बाद तो हम तमाम दूसरे खेलों (जिनमें ज्यादा ताकत, कौशल और बेहद कड़ी प्रतिस्पर्द्धा है) को हम बिसरा बैठे थे। शायद इसलिए भी कि क्रिकेट हमारे मानस और जीवन शैली को ज्यादा सूट करता है। जबकि क्रिकेट और टेनिस से इतर तमाम खेल अभी भी पैसे से ज्यादा मनुष्य की जीतने की अदम्य आकांक्षा, हाड़तोड़ मेहनत से संचालित और नियंत्रित होते हैं। ओलिंपिक इसी मानवीय इच्छाशक्ति का यशोगान होता है।

यूं तो पुरुष हॉकी टीम का 49 साल बाद ओलिंपिक के सेमीफाइनल में पहुंचना भी बड़ी उपलब्धि है। लेकिन ओलिंपिक्‍स में भारतीय वीमेन हॉकी की उम्र तो 41 साल की है। उसमें भी ओलिंपिक में हमारी महिला हॉकी टीम तीसरी बार ही भाग ले रही है। हालांकि भारतीय महिला हॉकी टीम ने पहली बार मास्को ओलिंपिक में हिस्सा‍ लिया था और चौथे स्‍थान पर रही थी। तब गोल्ड मेडल जिम्बाब्वे की महिला हॉकी टीम ने जीता था। लेकिन वो महिला हॉकी का शुरुआती दौर था। इस बार भारतीय महिला हॉकी टीम अगर फाइनल तक पहुंचती है तो महिला हॉकी का इतिहास एक नई बुलंदी को छूएगा।

बेशक हॉकी का वास्तविक जश्न मनाने की घडि़यां अभी दूर हैं, लेकिन यह समय अपने सुनहरे अतीत पर निगाहें डालने का तो है ही। भारत की पुरुष हॉकी टीम ने ओलिंपिक्‍स में ग्रास कोर्ट पर 1928 से अपना विजय अभियान शुरू किया। मेजर ध्यानचंद बरसों तक उस विजय अभियान का चेहरा बने रहे। अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय खेल को सम्मान दिलाने का महती श्रेय उन्हीं को है। यह बात अलग है कि उन्हें भारत रत्न देने के बारे में किसी ने नहीं सोचा।

जब भारतीय टीम ओलिंपिक में हॉकी के गोल्ड मेडल अपने नाम कर रही थी, उस वक्त में भारत की आजादी का संकल्प वैश्विक खेल मंच पर केवल हॉकी की वैश्विक जीत के जरिए ही उद्घोषित हो रहा था। यह समीकरण बन गया था कि हॉकी का स्वर्णपदक यानी भारत। यह स्वर्णिम सिलसिला 1959 तक चला। उसके बाद भारतीय हॉकी का मिजान नरम गरम रहा। 1980 में  मास्को ओलिंपिक में भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने आखिरी गोल्ड मेडल जीता। उसके बाद हॉकी तो दूर (2008 के बीजिंग ओलिंपिक को छोड़ दें) तो ओलिंपिक स्टेडियम में स्वर्ण विजेता के रूप में भारत का राष्ट्रगान एक बार भी नहीं बजा।

उधर एस्ट्रो टर्फ की टफ हॉकी ने भारत में हॉकी को पीछे ठेल दिया। ओलिंपिक को छोड़ दूसरी अंतरराष्ट्रीय स्पर्द्‍धाओं में मिली सफलताओं पर ही हम संतोष करने लगे, जबकि ओलिंपिक का कोहिनूर हमसे बहुत दूर जा चुका था। भारत में इसे गुजरे जमाने का खेल बना दिया गया। लेकिन वो सही नहीं था। 21 वीं सदी के इस छठे ओलिंपिक ने इसे सिद्ध कर दिया है। हॉकी टीम अब जीत की जिद के साथ खेलने लगी है।

बहरहाल सबसे शानदार रूपातंरण भारतीय महिला हॉकी टीम का है। कोरोना काल के दर्शकविहीन तोक्यो ओलिंपिक में अपने ग्रुप के तीन मैच लगातार हारने के बाद उदार खेल प्रेमियों ने भी मान लिया था कि यह टीम तफरीह के लिए ज्यादा गई लगती है। खुद हॉकी टीम की लड़कियां भी हताशा में डूब गई थीं। कहीं कोई जीत का तारा नहीं दिख रहा। लेकिन टीम के मुख्य हॉकी कोच सोर्ड मारिने की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने जामवंत की तरह टीम को एक ‍सकारात्मक फिल्म दिखाकर उसकी सही ताकत का एहसास कराया।

लड़कियों ने भी निराशा का चोला उतार फेंका और शेरनी बनकर मैदान में भिड़ने लगीं। कोच सोर्ड मारिने का यह वाक्य उल्लेखनीय है कि ‘अगर आकाश का लक्ष्य रखोगे तो पहाड़ पर गिरोगे और पहाड़ का लक्ष्य रखोगे तो मैदान में गिरोगे।‘ लड़कियों ने आकाश का लक्ष्य रखा और मैदान मार लिया। अब नजर आकाश की बुलंदी पर है।  यकीनन दोनो हॉकी टीमों के इस मुकाम तक पहुंचने के पीछे खुद कोच और खिलाडि़यों की अथक मेहनत, भारतीय खेल प्र‍ाधिकरण (साई) की भूमिका और सरकारों का प्रोत्साहन भी है।

मैदान से बाहर एक और चर्चा ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की भी हो रही है। नवीन अकेले मुख्यमंत्री हैं, जिनकी सरकार मुश्किल दिनों में भी भारतीय हॉकी टीम को प्रायोजित करने का खर्च उठाती आ रही है। वरना विजेता खिलाडि़यों के साथ श्रेय शेयर करने में तो कई सरकारें आगे आती दिखेंगी। लेकिन कामयाबी के इस अध्याय के पहले विवाद न हो तो हिंदुस्तान ही क्या।

कम ही लोगों को पता होगा कि भारतीय पुरुष टीम के मुख्य कोच ग्राहम रीड और महिला टीम के मुख्य कोच सोर्ड मारिने की तनख्वाह को लेकर भी लोगों ने आपत्तियां ली थीं। कहा गया कि इन विदेशी कोचों को किस बात के इतने पैसे दिए जा रहे हैं? जबकि भारतीय कोचों को कम तनख्वाह पर रखा जाता है। बता दें कि साई ने ग्राहम रीड को 11 लाख रुपये प्रति माह व मारिने को साढ़े 7 लाख रुपये प्रति माह के अनुबंध पर ‍नियुक्त किया है। रीड ऑस्ट्रेलिया के हैं और मारिने हालैंड के। बीते तीन सालों में इन दो कोचों ने जो मेहनत की है, उसका नतीजा सामने ही है।

भारतीय हॉकी की फिर तेज होती लौ के मौके पर दो लोगों को स्मरणांजलि बनती है। जब ये टीमें जीत की तरफ बढ़ रही थीं, तब भारतीय रेडियो कमेंट्री के आदर्श पुरुष रहे जसदेव सिंह की याद आती रही। वो आज यदि कमेंट्री कर रहे होते तो कैसे करते? हॉकी टीमों की सफलता का यह रस उनकी वाणी से कैसे टपकता? जसदेव स्वर और वाणी का सुंदर, अनोखा संगम थे। गेंद की रफ्तार के हिसाब से हॉकी की कमेंट्री करना उनकी बेमिसाल खूबी थी। जिस जमाने में टीवी नहीं था, वो हॉकी प्रेमियों को उनके कानों से लाइव मैच दिखाते थे।

दूसरे हैं हॉकी के आंकड़ों के संग्राहक बी.जी.जोशी। जोशीजी को इस साल कोरोना ने हमसे छीन लिया। हॉकी की सांख्यिकी का उनके पास ऐसा अद्भुत संग्रह था कि कई विदेशी हॉकी विशेषज्ञ भी उनसे जानकारी मांगते थे। वो होते तो यकीनन हॉकी टीमों की उस उपलब्‍धि पर इतरा रहे होते और आंकड़ों की दुनिया से कुछ नया खोज कर ला रहे होते। अच्छा लगा जब सोनी स्पोर्ट्स के हिंदी कमेंटेटरों ने एक मैच के दौरान बीजी जोशी को याद कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।

बदलती हॉकी साथ-साथ आज सोशल मीडिया ने भी काफी कुछ बदल दिया है। एक जमाना था, जब भोपाल में किसी भी अंतरराष्ट्रीय हॉकी मैच में खेलने वाली टीमें ‘भोपाली कमेंट्स’ का प्रसाद अपने साथ लेकर जरूर जाती थीं। अब लोग सोशल मीडिया पर अपनी टीमों की जीत के जज्बे से एकाकार होने लगे हैं। इसका अंदाज अलग है। इन के मैसेजेस में चु‍टकियां भी हैं और फनी कमेंट्स भी। मशहूर फिल्म ‘चक दे इंडिया’ में महिला टीम में जोश भरने वाले कोच कबीर खान यानी ‍अभिनेता शाहरुख ने भारतीय महिला टीम की कामयाबी से खुश होकर अपने ट्वीट में हॉकी कोच मारिने की डी में गेंद यह कहकर सरकाई कि ‘लौटते वक्त थोड़ा सोना भी लेते आना’! मारिने ने भी जवाबी गोल दागा- यकीनन…एक ‘असली कोच’! (मध्‍यमत)
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