राकेश अचल

शीर्षक और विषय लीक से हटकर है, लेकिन बात पुरानी ही है।  कल 15 अगस्त को देश अपनी आजादी की 73 वीं वर्षगांठ मनाएगा लेकिन ऐसे वातावरण में, जो आजादी के पहले भी कभी नहीं था। कल स्वतांत्रता दिवस मनाने के लिए न पहले जैसी आजादी होगी और न उत्साह, एक तरह से कल हम एक रस्म अदायगी करेंगे और ऐसे ही कष्टदायक समय में हमें एक बार फिर पुरजोर तरीके से कहना पडेगा- ‘इंकलाब-जिंदाबाद’।

आपने कभी सोचा कि क्या बात है जो भारत को 73 साल बाद भी इंकलाब की जरूरत है? आपको सोचना चाहिए! यदि आप सोचना बंद कर देंगे तो आजादी का जश्न आने वाले दिनों में और ज्यादा औपचारिक होता जाएगा। उत्सवधर्मिता हमारे स्वभाव का अभिन्न अंग है, इसे सीमित किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है, किन्तु इस मजबूरी को हम एक महामारी की ढाल से रोकने की कोशिश कर रहे हैं। हमें छिपना नहीं,लड़ना चाहिए और फिर से एक बार इंकलाब-जिंदाबाद का नारा बुलंद करना चाहिए।

इंकलाब का शाब्दिक अर्थ क्रांति है और जिंदाबाद का अर्थ चिरजीवी होना। हम क्रांति को अमर क्यों बनाना चाहते हैं, क्योंकि हम दासता के खिलाफ हैं। तब भी जब 91 साल पहले शहीद भगत सिंह ने गुलाम भारत की असेम्‍बली में ये नारा बुलंद किया था और आज भी इस नारे को बुलंद करने की आवश्यकता है। आज हमें दूसरे मुद्दों को लेकर इंकलाब की जरूरत है। ये मुद्दे आजादी के पहले हमारे सामने नहीं थे। नए दौर के नए मुद्दों को इंकलाब की जरूरत है अन्यथा देश 73 साल पीछे चला जाएगा। संकीर्णता, वैमनस्य, घृणा और हिंसा के इस माहौल में इंकलाब होना चाहिए, अन्यथा स्वतंत्रता  दिवस से ठीक पहले बेंगलूरु फिर जलेगा।

आपके मन में ये सवाल अवश्य आता होगा कि 73 साल में हमें जिस मुकाम पर होना चाहिए था, उस मुकाम पर हम क्यों नहीं पहुंचे? क्या एक ‘नेहरू’ नाम का भूत ही इसके लिए जिम्मेदार है? क्या इस भूत ने आजाद भारत को आधुनिक भारत बनाने के लिए कुछ किया ही नहीं? क्या भारत को आधुनिक बनाने का काम चार-छह साल पहले ही शुरू हुआ है? आजाद भारत को शायद यही समझाया जा रहा है। देश और अधिक आजादी न मांगे इसलिए देश की युवा आबादी को कुंद कर दिया गया है। देश की युवा आजादी कहीं फिर से बेरोजगारी के खिलाफ इंकलाब का नारा बुलंद न कर दे इसलिए उसे एक नए किस्म के राष्ट्रवाद की चाट खिलाई जा रही है।

आजाद भारत में इंकलाब की जरूरत इसलिए भी महसूस की जा रही है क्योंकि अब हमारे टीवी चैनल विकास पर बहस नहीं बल्कि सियासत पर दंगल करा रहे हैं। शरीर के प्रत्येक अंग में जहर भरा जा रहा है और दवा के रूप में दी जा रही है भक्ति की पुड़िया। भक्ति भाव से बिना सवाल-जवाब के खाइये और आगे बढ़ जाइये। भक्तिभाव से ही देश को नयी शताब्दी में विश्वगुरु बनाये जाने की ये कोशिश आने वाले दिनों में कितनी भारी पड़ेगी, ये विचार करने की जरूरत है।

देश के प्रतिभाशाली और बहुमुखी सोच वाले प्रधानमंत्री जी को इस बात के लिए बधाई दी जाना चाहिए कि उन्होंने देश में गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री के रूप में काम करने के अपने से पहले के सभी कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए। ये भंजन की प्रवृत्ति ही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। अब उन्हें निर्माण की तरफ बढ़ना है और उन्होंने इस दिशा में कदम भी बढ़ाना शुरू कर दिए हैं। पिछले दिनों ही उन्होंने अयोध्या में एक पूजाघर के निर्माण के लिए भूमिपूजन किया है। देश की आजादी की 73 वीं वर्षगांठ से ठीक दस दिन पहले उन्होंने देशवासियों को ये एक उपहार दिया है। अब उन्हें बेपटरी होती अर्थव्यवस्था और जनता के विश्वास की बहाली के लिए काम करना होगा। क्योंकि बीते आधे दशक में ये दोनों चीजें ही सबसे ज्यादा कमजोर हुई हैं।

हमारी पीढ़ी ने इस आजाद देश को बनाने संवारने में जिन 16 महापुरुषों को काम करते देखा है उनमें माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी भी एक हैं। उन्हें भी पंडित जवाहरलाल नेहरू, श्रीमती इंदिरा गाँधी और श्रीमान अटल बिहारी वाजपेयी की तरह एक से अधिक बार काम करने का अवसर मिला है, लेकिन वे पंडित जवाहरलाल नेहरू की तरह 16 साल 286 दिन काम कर पाएंगे, इसमें संदेह है। वे नेहरू, इंदिरा या अटल बिहारी की तरह भी देश को समरसता के साथ आगे ले जा पाएंगे इसमें भी लोगों को संदेह है। लेकिन मैं आश्वस्त हूँ कि उन्होंने अपने मन में जैसा भारत बनाने का संकल्प ले रखा है, वैसा भारत बनाने में वे कोई कसर नहीं छोड़ेंगे, लेकिन इसके लिए उन्हें भी लाल किले से इंकलाब-जिंदाबाद का नारा बुलंद करना पड़ेगा।

इंकलाब की जरूरत आदमी की सबसे बड़ी जरूरत है, बिना इंकलाब के सब कुछ ठहर जाने की आशंका बनी रहती है। ठहरे पानी में काई जमते सबने देखी होगी। आज जरूरत इस बात की है कि आजाद देश में किसी के मन में काई न जमे। किसी को संताप न हो, कोई महामारी में असहाय न दिखाई दे। सत्ता का खेल देश पर किसी भी सूरत में भारी न पड़े क्योंकि आज देश में चारों तरफ सबसे बड़ा कारोबार कुरसी का ही हो रहा है। जितनी खरीद-फरोख्त आजादी के बीते 67  साल में नहीं हुई उतनी पिछले छह साल में हुई। हमें इसके खिलाफ भी इंकलाब की जरूरत है। जन-प्रतिनिधियों के घोड़ों की तरह बिकने से देश का लोकतंत्र कमजोर होता है।

मैंने जब से होश सम्हाला है मैं हर साल स्वतंत्रता दिवस समारोहों का अभिन्न हिस्सा रहा हूँ। एक दर्शक के रूप में, एक कार्यकर्ता के रूप में, लेकिन यह पहला मौक़ा होगा कि मेरा ये कीर्तिमान टूट जाएगा क्योंकि कोरोना महामारी की वजह से स्वतंत्रता दिवस पर सार्वजनिक समारोह हो ही नहीं रहा। सब कुछ सांकेतिक है। देश ने घोर आतंकवाद के साये में भी स्वतंत्रता दिवस के समारोहों को सांकेतिक नहीं होने दिया था, लेकिन आज ऐसा हो रहा है।

सब असहाय हैं, किसी से कुछ कह नहीं सकते। हमें इस विवशता के खिलाफ भी इंकलाब की जरूरत है। तो आइये पूरे उत्साह से फिर दोहराएं ‘इंकलाब-जिंदाबाद’, हमारी स्वतंत्रता अमर रहे। जय हिन्द, जय भारत, जय इण्डिया। (सावधान! अब  भारत ‘एक देश, एक क़ानून’ और ‘एक नाम’, ‘एक धर्म’  की ओर आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है।)