रवि भोई

आईपीएस जीपी सिंह के किस्से-कहानियां इन दिनों छत्तीसगढ़ का हॉट इश्यू बन गया है। उनके निराले खेलों की खूब चर्चा हो रही है। कहा जा रहा है कि जीपी और सरकार की लड़ाई अभी लंबी खिंचेगी और परत-दर-परत कई मामले खुलेंगे। जीपी सिंह बचाव के लिए हाईकोर्ट की शरण में गए हैं, तो सरकार उनका हर दांव फेल करने में जुट गई है। कहते हैं जीपी सिंह को दो दशक पहले वरिष्ठों का वरदहस्त न मिलता तो उनके हौसले बुलंद न होते। जगदलपुर एसपी रहते जीपी सिंह के काम के तरीके पर काफी बवाल मचा था। तब न तो उनकी अपने आईजी से पटी थी और न ही कलेक्टर से। उनके साथ आईजी रहे अफसर ने तत्कालीन डीजीपी से जीपी की खूब शिकायत की थी पर उसे अनसुना कर दिया गया था। वरिष्ठों की कृपा से अच्छी पोस्टिंग पाने और मुसीबतों से निकल जाने वाले जीपी के बारे में कहा जा रहा है “जिस थाली में खाया, उसे ही छेद कर दिया।” अब देखते हैं जीपी की किस्मत भारी पड़ती है या सरकार की रणनीति।

बेवजह की उम्मीदें
केंद्रीय मंत्रिमंडल विस्तार पर छत्तीसगढ़ के लोग टकटकी लगाए हुए थे, पर निराशा हाथ लगी। दिल्ली की नजर में छत्तीसगढ़ बहुत छोटा है और यहां विधानसभा चुनाव ढाई साल बाद होने वाले हैं, फिर तोल-मोल वाली बात भी नहीं थी। ऐसे में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व बढ़ाने का कोई दबाव नहीं था। छत्तीसगढ़ के कोटे से रेणुका सिंह मंत्री हैं। आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व करतीं हैं, ऐसे में रेणुका की जगह किसी ट्राइबल सांसद को ही मंत्री बनाना पड़ता, पर छत्तीसगढ़ में हैवीवेट आदिवासी नेता हाईकमान को नजर नहीं आ रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से लेकर सरोज पाण्डे, अरुण साव, विजय बघेल का नाम हवा में तैरता रहा। कहा जा रहा है कि डॉ. रमन सिंह को मंत्री बनाने पर उन्हें किसी दूसरे राज्य से राज्यसभा में भेजना पड़ता, फिर राजनांदगांव विधानसभा का उपचुनाव सिर पर मंडराता, जो भाजपा को खतरे से खाली नजर नहीं आ रहा था। इन सबके अलावा डॉ. रमन सिंह अभी छत्तीसगढ़ भाजपा में संरक्षक की भूमिका निभा रहे हैं, उनकी जगह लेने वाला दूसरा नेता हाईकमान को दिख नहीं रहा है।

पड़ोसी बने रमेश बैस
रायपुर के सात बार के सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री रमेश बैस त्रिपुरा की जगह अब झारखंड के राज्यपाल बन गए हैं। कहते हैं बैस जी की इच्छा मध्यप्रदेश या महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य में जाने की थी।  झारखंड, छत्तीसगढ़ का पडोसी राज्य है। दोनों राज्यों में रोटी-बेटी का भी रिश्ता है और दोनों आदिवासी बहुल भी हैं। कई तरह की राजनीतिक समानताएं भी हैं। रमेश बैस के पड़ोस में आने पर छत्तीसगढ़ में भाजपा के भीतर नए समीकरण का आकलन किया जाने लगा है। रमेश बैस को राज्य का बड़ा ओबीसी चेहरा माना जाता रहा है। छत्तीसगढ़ में इन दिनों ओबीसी पॉलिटिक्स कुलांचे मार रही है, ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह, रमेश बैस को झारखंड में रखकर किस तरह यहां इस्तेमाल करते हैं, उस पर सबकी नजर है।

पीडब्ल्यूडी में हरियाली
कहते हैं सूखे पड़े लोक निर्माण विभाग में जल्द ही हरियाली आने वाली है। सरकार छत्तीसगढ़ सड़क और अधोसंरचना विकास निगम के मार्फ़त बैंकों से तीन-चार हजार करोड़ रुपये का कर्ज लेकर पुल-पुलियों और सड़कों के निर्माण और सुधार में तेजी लाएगी। कर्ज लेने की प्रक्रिया पूरी हो गई है। बरसात के सीजन में टेंडर देने का काम निपट जाएगा। उबड़-खाबड़ सड़कें चिकनी-चुपड़ी तो हो ही जाएंगी। काम चलेगा तो ठेकेदारों की कमाई होगी और अफसरों के भी पौ बारह होंगे। कहा जाता है कि फंड की कमी के चलते पिछले ढाई साल में कई काम बंद हो गए थे। ढाई साल बाद चुनाव होने हैं, ऐसे में सड़कों का चमकना जरुरी है। अब देखते हैं लोक निर्माण विभाग कितनी तेजी से दौड़ता है? सारा दारोमदार विभाग के प्रभारी ईएनसी विजय भतपहरी पर है, जो स्वयं चीफ इंजीनियर की बाधा को अभी पार नहीं कर पाए हैं।

मुरुगन बनेंगे पीसीसीएफ
जाते-जाते पीसीसीएफ बने जेएसीएस राव के रिटायरमेंट के बाद अब 1987 बैच के आईएफएस के. मुरुगन और बी.वी. उमादेवी कतार में हैं। मुरुगन से उमादेवी सीनियर हैं, लेकिन उमादेवी के भारत सरकार में प्रतिनियुक्ति में होने से मुरुगन छत्तीसगढ़ में पीसीसीएफ बन जाएंगे। उमादेवी को प्रोफार्मा पदोन्नति दे दी जाएगी। आईएफएस उमादेवी केंद्रीय वाणिज्य सचिव बीवीआर सुब्रमण्यमन की पत्नी हैं।  इस कारण मानकर चला जा रहा है कि वे छत्तीसगढ़ नहीं लौटेंगी। अभी डीपीसी की तारीख़ तय नहीं हुई है, पर  कहा जा रहा है कि दोनों अधिकारी इस महीने पदोन्नत हो जाएंगे।

डीजीपी की बात बन गया मुद्दा
खुले आम जुआ खिलाने पर कुछ जिलों के नए-नवेले पुलिस अधीक्षकों को समीक्षा बैठक में डीजीपी साहब की नसीहत मिल गई। कहते हैं डीजीपी साहब के सख्त तेवर पर कुछ एसपी सकते में आ गए। अब नए हों या पुराने बॉस की तो सुननी पड़ेगी ही। समीक्षा बैठक में आईजी-एसपी को डीजीपी साहब द्वारा कही गई बात (“जिलों में तंबू लगाकर जुआ हो रहा है और आप समझते हो डीजीपी को पता नहीं है, तो बच्चे हो आप”) को अब भाजपा ने मुद्दा बना लिया है।

रेणु बनेंगी राजस्व मंडल अध्यक्ष?
चर्चा है कि अपर मुख्य सचिव रेणु पिल्लै को राजस्व मंडल के अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। रेणु पिल्लै भाजपा शासन में राजस्व मंडल की सदस्य रह चुकी हैं। राजस्व मंडल के वर्तमान अध्यक्ष और 1987 बैच के आईएएस अफसर चितरंजन खेतान इस महीने रिटायर हो जाएंगे। राजस्व मंडल के अध्यक्ष का पद मुख्य सचिव के स्तर का है। वर्तमान में मुख्य सचिव अमिताभ जैन के अलावा रेणु पिल्लै और सुब्रत साहू एसीएस हैं। सुब्रत साहू गृह, जलसंसाधन और आवास-पर्यावरण के प्रभारी होने के अलावा मुख्यमंत्री के सचिव भी हैं। रेणु पिल्लै के पास पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग के साथ महानिदेशक प्रशासन का दायित्व है। उन्हें कुछ महीने पहले स्वास्थ्य से हटाकर पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में पदस्थ किया गया है, उसके पहले तक सचिव प्रसन्ना आर. स्वतंत्र रूप से विभाग का काम देख रहे थे।
(-लेखक छत्‍तीसगढ़ के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं)