अजय बोकिल

देश में ब्राह्मणवाद और ब्राह्मण एक अंतराल के बाद फिर निशाने पर हैं। बीते कुछ समय से आ रहे बयानों में ब्राह्मणों को दुष्चरित्र, सत्ता और धन लोलुप तथा हिंदू समाज के शोषक के रूप में चित्रित करने की कोशिश की जा रही है। जवाहरलाल नेहरू विवि की कुलपति शांतिश्री धुलिपुडी पंडित ने तो यहां तक कह दिया कि हिंदुओं के देवी देवता ब्राह्मण नहीं थे, उन्हें तो दलित या आदिवासी होना चाहिए। इधर मध्यप्रदेश में एक भाजपा नेता ने ब्राह्मणों को दान दक्षिणा बटोरने वाली और महिलाओं पर कुदृष्टि रखने वाली जमात बता दिया।

उसके बाद भाजपा ने उसे पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। उधर गुजरात में एक भाजपा विधायक बिल्कीस बानो से सामूहिक दुष्कर्म मामले में आजीवन कारावास भुगत रहे दोषियों को छोड़े जाने का यह कहकर समर्थन किया कि उनमें से कई ब्राह्मण हैं, इसलिए वो पापी नहीं हो सकते।

इसके पहले राजद नेता तेजस्वी यादव और कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू भी ब्राह्मणों पर गाहे बगाहे हमले करते रहे हैं। इसके पीछे सोच शायद यह है कि सामाजिक न्याय का रथ ब्राह्मणों को गरियाए बिना आगे नहीं बढ़ सकता। बावजूद इसके कि बहुसंख्यकवाद के इस दौर में ब्राह्मण कमसंख्यावाद के कारण ही हाशिए पर ठेले जा रहे हैं। सबसे हैरानी की बात यह है कि ब्राह्मण शब्द और ब्राह्मणवाद की व्याख्या आजकल हर कोई अपने हिसाब से कर रहा है। यह सही है कि सनातन धर्म की चातुर्वर्ण्य व्यवस्था में ब्राह्मणों का स्थान सर्वोच्च माना गया है (यह तय भी ब्राह्मणों ने ही किया है)।

यास्क मुनि के निरुक्त में ब्राह्मण शब्द की व्याख्या में कहा गया है- ‘ब्रह्म जानाति ब्राह्मणा:’ यानी जो ब्रह्म को जाने वही ब्राह्मण है। इस कसौटी पर आज उंगली पर गिनने लायक ब्राह्मण ही खरे उतरेंगे। फिर भी सदियों से धर्मपताका के वाहक के रूप में ब्राह्मणों ने हिंदू धर्म का प्रबंधन अपने तरीके से किया और व्यापक धर्मांतरण से उसे बचाया। हालांकि इसमें कई गंभीर दोष थे और आज भी हैं।

अब जबकि ‘गर्व से खुद को हिंदू कहने’ का समय आ गया है तब ब्राह्मणों पर हमले किसी सुनियोजित रणनीति का हिस्सा ज्यादा लगते हैं। खासकर तब जब ब्राह्मण के हाथ राजनीतिक सत्ता लगभग फिसल चुकी है। हाल में जेएनयू की कुलपति शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित ने कहा कि मानवशास्त्रीय और वैज्ञानिक दृष्टि से देवताओं की उत्पत्ति को देखें तो हमारे देवता ब्राह्मण नहीं थे।

उन्हें अनुसूचित जाति या जनजाति का होना चाहिए। शांति श्री केन्द्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा आयोजित बीआर अंबेडकर लेक्चर सीरीज में बोल रही थीं। शांतिश्री ने कहा कि भगवान शिव अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के होने चाहिए, क्योंकि वो श्मशान में सांप के साथ बैठते हैं। उन्होंने बहुत कम कपड़े भी पहने हैं। मुझे नहीं लगता कि ब्राह्मण कब्रिस्तान में बैठ सकते हैं। इसलिए देवता मानवशास्त्रीय रूप से उच्च जाति से नहीं आते हैं। इसमें लक्ष्मी, शक्ति आदि सभी देवता शामिल हैं। जगन्नाथ आदिवासी हैं। इसके बाद भी हम अभी भी इस भेदभाव करते हैं, जो बहुत ही अमानवीय है।

शांतिश्री यहीं पर नहीं रूकीं। उन्होंने यह भी कहा कि मनुस्मृति में हर महिला को शूद्र कहा गया है। कोई भी महिला यह दावा नहीं कर सकती कि वो ब्राह्मण या कुछ और है। मेरा मानना है कि शादी से ही आपको पति या पिता की जाति मिलती है। शांतिश्री स्वयं ओबीसी हैं, लेकिन उनकी मां तेलुगू ब्राह्मण थीं। शांतिश्री ने जाति उन्मूलन की पैरवी की। बेशक जाति उन्मूलन होना चाहिए, लेकिन जातियों की पहचान कायम रखकर और उसे राजनीतिक सौदेबाजी का आधार बनाकर यह कैसे संभव है?

ब्राह्मणों के खिलाफ एक और विवादित बयान मध्यप्रदेश के भाजपा नेता प्रीतम लोधी ने दिया। उन्होंने शिवपुरी जिले के बदरवास में रानी अवंतीबाई लोधी जयंती पर आयोजित एक समारोह में कहा ‘ये ब्राह्मण आपको 9 दिन रोजाना 7-8 घंटे पागल बनाते हैं। ये सबसे ज्यादा दान की बात करते है। कहते हैं कि, अगर तुम दान दोगे तो भगवान तुम्हें देगा। इनकी बातों में आकर महिलाएं अपने घरों से घी, शक्कर, गेहूं, चावल चुरा-चुराकर इनके चरणों में अर्पित करती हैं। जबकि महिलाओं को यह सामग्री अपने बच्चों को खिलाना चाहिए।

प्रीतम ने आगे कहा कि दान दक्षिणा लेने के बाद ये ब्राह्मण रफूचक्कर हो जाते हैं और आपको उल्लू बनाने के 25 से 50 हजार रुपए भी ले लेते हैं।’ यही नहीं प्रीतम ने यह भी कहा कि कुछ ब्राह्मण पुजारी महिलाओं को घूरते हैं और प्रवचन के दौरान युवतियों को आगे की पंक्तियों में बिठाते हैं।’ यह वीडियो वायरल होते ही बवाल मच गया। कई ब्राह्मण संगठनों ने प्रीतम को पार्टी से निकालने की मांग की। शिवपुरी जिले के कई थानों में उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गई। परोक्ष रूप से इसे प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वी.डी.शर्मा पर भी हमला माना गया।

हालांकि, बवाल मचने के बाद प्रीतम ने पार्टी से लिखित माफी भी मांगी, लेकिन तब तक तीर कमान से छूट चुका था। इस माफी का कोई असर नहीं हुआ और पार्टी प्रदेश अध्यक्ष वी.डी.शर्मा ने निर्देश पर महासचिव भगवानदास सबनानी ने प्रीतम को दल से निष्कासित कर दिया। हालांकि, निष्कासन के बाद भी अपने तेवर दिखाते हुए प्रीतम ने फेसबुक पर खुद के बारे में पोस्ट डाली कि जो हारी हुई बाजी को जो पलट दे उसे बाजीगर कहते हैं और याद रखना मेरे भाइयों टाइगर अभी जिंदा है।

इशारों को समझें तो प्रीतम को बाहर कर पार्टी ने लोधी समाज से ही आने वाली पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती को भी संदेश दे दिया है कि वो खामोश ही रहें तो बेहतर है। उमा ने मप्र में शराबबंदी की मांग को लेकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह सरकार के खिलाफ एकतरफा मुहिम छेड़ी हुई है और प्रीतम लोधी की बहू उमा भारती की बड़ी बहन की बेटी है। प्रीतम को पार्टी से निकालना इसलिए भी अहम है क्योंकि राज्य में ओबीसी की 50 फीसदी आबादी में लोधियों की संख्या काफी है, जबकि ब्राह्मण महज 6 फीसदी ही हैं।

हालांकि प्रीतम ने जो कहा, वह पूरी तरह गलत भी नहीं है, लेकिन सभी ब्राह्मणों को एक तराजू में तौलना भी ठीक नहीं है। ब्राह्मणों के समर्थन में एक नकारात्मक किस्म की आवाज उस गुजरात से उठी, जो भाजपा के हिंदुत्व की प्रयोगशाला बन चुका है। गुजरात में बीजेपी विधायक सी.के.राउलजी ने बिल्कीस बानो दुष्कर्म केस में आजीवन कारावास भुगत रहे दोषियों को छोड़े जाने का समर्थन करते हुए कहा था कि “दोषी ब्राह्मण और संस्कारी थे। जेल में उनका व्यवहार अच्छा था।” राउलजी उस समिति में शामिल थे, जिसने 11 दोषियों की सजा माफ करने का फैसला किया था। राउलजी के बयान से यह ध्वनित होता है कि दोषी चूंकि संस्कारी ब्राह्मण थे, इसलिए निर्दोष हैं। यह सोच भी गलत है।

उधर बिहार में नीतीश कुमार के साथ फिर से गलबहियां करने वाले राजद नेता और अब उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने भी ब्राह्मणों के खिलाफ मोर्चा खोला था। उनकी पार्टी राजद ने एक ब्राह्मण पत्रकार को निशाना बनाते हुए ट्वीट किया था कि ‘मोदी सरकार में एक दर्जन ब्राह्मण मंत्री हैं, लेकिन ब्राह्मण पत्रकार चालाकी कर यह नहीं बताएंगे। इसके पहले उनके पिता और लालू प्रसाद यादव ने 2015 के विधानसभा चुनाव में प्रचार के दौरान बिहार में यादवों से आह्वान किया था कि बिहार में अगड़ी जाति और पिछड़ी जाति का ‘महाभारत’  है। यादवों को ब्राह्मणों के खिलाफ एकजुट रहने की जरूरत है।’

पंजाब की राजनीति में अब हाशिए पर जा चुके, लॉफ्टर शो में ठहाके लगाने वाले नवजोत सिंह सिद्धू ने भी इस साल के शुरू में ब्राह्मणों पर हमला किया था। उन्होंने अकाली नेता अनिल जोशी को ‘काला बामण’ बता दिया था। जिस पर राज्य के ब्राह्मण समुदाय में खासा रोष फैल गया था। बाद में सिद्धू ने ब्राह्मणों से माफी मांग ली थी।  चार साल पहले एक अमेरिकी महिला प्रोफेसर एमी वैक्स ने ब्राह्मण महिलाओं को लेकर ऐसी ही आपत्तिजनक टिप्पणी की थी, जिस पर काफी विवाद हुआ था।

एमी पेनसिल्वानिया यूनिवर्सिटी में कानून की प्रोफेसर हैं। उन्होंने टीवी टॉक शो में कहा कि समस्या यह है कि उन्हें (ब्राह्मण महिलाएं) सिखाया जाता है कि वे हर किसी से बेहतर हैं क्योंकि वे ब्राह्मण हैं और फिर भी उनका देश गंदा है…। एमी की इस नस्लवादी टिप्पणी की काफी आलोचना हुई थी।

वैसे इन आरोपों को लेकर प्रतिवार भी हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने पिछले माह सपा अध्यक्ष अखिलेख यादव पर हमला करते हुए कहा था कि मैं हमेशा ब्राह्मणों के साथ हूं। ब्राह्मणों ने राष्ट्र निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाई है। सभी ब्राह्मण भाई एक-दूसरे को मजबूती दें। मैं राजनीतिक ब्राह्मणों को विश्वास दिलाता हूं कि उनका भविष्य बेहतर है। पाठक ने कहा कि ब्राह्मणों ने देश की संस्कृति और विरासत को झुकने नहीं दिया। एक मुगल शासक 10 मन जनेऊ हर दिन तौलता था, फिर भी ब्राह्मण आज दिशा दे रहा है।

गहराई से देखें तो ब्राह्मण अब राजनीतिक रूप से किनारे पर ही हैं। धनसत्ता तो उनके पास पहले भी कभी नहीं रही। सिर्फ मप्र की बात करें तो इस प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मणों के वर्चस्व का युग मंडल आंदोलन के साथ ही समाप्त हो गया। दरअसल, अब ज्यादातर ब्राह्मण नेता दूसरी पंक्ति में हैं और ‘जो मिल गया, उसी को मुकद्दर’ मानकर खुश हैं। कुछ हद तक उनका सामाजिक महत्व बरकरार है।  प्रतिशत के हिसाब से देश में उनकी सबसे ज्यादा संख्या उत्तराखंड 25 प्रतिशत, हिमाचल प्रदेश 18 प्रतिशत, राजस्थान 15.5 प्रतिशत तथा उत्तर प्रदेश में 14 प्रतिशत हैं। बाकी राज्यों में वो 3 से लेकर 7 फीसदी तक हैं।

राजनीति में सत्ता के प्रभुत्व की बात करें तो देश के 28 राज्यों में से केवल दो में ब्राह्मण मुख्यमंत्री हैं (पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और असम में हिमंत बिस्वा सरमा) और ये दोनोंं भी ब्राह्मणों की राजनीति नहीं करते। उसी तरह देश में वर्तमान में कुल राज्यपालों में से केवल दो ब्राह्मण हैं और संयोग से दोनों ही मिश्रा हैं (कलराज मिश्रा और ब्रिगेडियर बी.डी.मिश्रा)। दो ब्राह्मण उप मुख्यमंत्री बजेश पाठक और देवेन्द्र फडणवीस हैं। अलबत्ता बाकी कई क्षेत्रों में ब्राह्मणों का प्रतिनिधित्व उनकी संख्या के अनुपात में कहीं ज्यादा है।

इस देश में आजादी के पहले देश के कई हिस्सों में ब्राह्मणों के वर्चस्व के खिलाफ आंदोलन चले। लेकिन आजादी के बाद भी ब्राह्मणों का राजनीतिक वर्चस्व कायम रहा। उसके बाद मंडल आंदोलन और भारत में हिंदुओं की जातीय आधार पर नई गोलबंदी ने, जिसे सामाजिक न्याय कहा गया, राजनीतिक समीकरण बदल दिए।

ऐसे में ब्राह्मणों पर हमले का क्या अर्थ है? क्या गैर ब्राह्मणों को अभी ब्राह्मणों से खतरा है या फिर वो ब्राह्मणवाद को एक शाश्वत विचार के रूप में देखते हैं, जो कभी मर नहीं सकता और समयानुसार रूप बदल कर सामने आता है। अथवा यह केवल एक मानसिक भय है जो अतीत के अनुभवों से उपजा है? यहां दिक्कत यह है कि ब्राह्मणों के पृष्ठभूमि में जाने के बाद ऐसी कोई वैकल्पिक जातीय शक्ति अभी नहीं उभरी है, जो हिंदू समाज को एक रख सके। क्योंकि ब्राह्मण को हटाने वाले तत्व भी अंतत: ब्राह्मण ही बनना चाहते है। वैसे भी हिंदू धर्म कई अन्य धर्मों की तरह सुसंगठित नहीं है।

हिंदू धर्म समय के साथ आत्मसुधार की बुनियादी चेतना, विराट पाचन शक्ति और अडिग आस्था के सहारे ही हजारों साल से टिका हुआ है। वह किसी एक किताब, अवतार पुरुष या अकाट्य धार्मिक दिशा निर्देशों के भरोसे नहीं चल रहा। इसीलिए वो सनातन है। हो सकता है कि ब्राह्मणों को गाली देते रहने से गैर ब्राह्मण और खासकर पिछड़ी और अनुसूचित जातियों में एकजुटता का बोध जागता हो, लेकिन राजनीति और समाज से ब्राह्मणों को पूरी तरह बेदखल करने के लिए भी ब्राह्मणों के समान दृष्टि, मेधा और प्रतिभा के सम्मान की मानसिकता विकसित करनी होगी, तभी ब्राह्मणों का प्रतिस्थापन स्थायी सिद्ध हो सकेगा।

संख्या बल से राजनीतिक हित सध सकते हैं, सामाजिक नहीं। कुछ लोगों का तो यहां तक मानना है कि आज देश में ब्राह्मणों को गाली देना किसी जमाने में जर्मनी में यहूदियों को हर दोष के लिए कोसते रहने जैसा है। तो क्या सनातन धर्म अब नए स्वरूप में उभर रहा है, जिसमें ब्राह्मण भले नगण्य हों, पर नए किस्म का प्रति ब्राह्मणवाद कायम रहेगा।
(लेखक की फेसबुक वॉल से साभार)
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(मध्यमत)
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