क्या ‘मजदूर प्रदेश’ बन गया है अपना मध्यप्रदेश?

अजय बोकिल

क्या मध्यप्रदेश देश का नंबर वन ‘मजदूर प्रदेश’ बन चुका है? सवाल सुन कर चौंकिए मत। क्योंकि सरकारी आंकड़े यही बयान कर रहे हैं। मध्यप्रदेश की कुल आबादी करीब 8 करोड़ (2011 की जनगणना के मुताबिक 7 करोड़ 25 लाख) है। हाल में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की घोषणा के बाद राज्य में 1 अप्रैल से असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के पंजीयन का अटल अभियान चल रहा है। पहले यह 14 अप्रैल तक था, अब इसकी तारीख बढ़ाकर ग्वालियर संभाग को छोड़कर शेष में 24 अप्रैल कर दी गई है।

इसी योजना की उच्चस्तरीय समीक्षा में खुलासा हुआ कि ऐसे पंजीयन के लिए अब तक 2 करोड़ आवदेन आ चुके हैं। यानी राज्य का हर चौथा आदमी या तो मजदूर है या बनने का ख्वाहिशमंद है। प्राप्त आवेदनों पर 2 मई को ग्राम सभाओं में वाचन होगा, लेकिन लगता है ‍कि इन मजदूरों को 12 सरकारी योजनाओं का लाभ देने का ऐलान इतना लुभावना है कि लोग धड़ल्ले से ‘मजदूर’ बनने के लिए तैयार हैं।

प्रदेश में मजदूरों का यह पंजीयन मध्यप्रदेश असंगठित शहरी एवं ग्रामीण कर्मकार कल्याण मण्डल के माध्यम से किया जा रहा है। इसके लिए बाकायदा पंजीयन शिविर लगाए जा रहे हैं। पंजीयन के लिए श्रमिक की आयु 18 से 60 वर्ष के बीच होना चाहिए। शर्त यह है कि आवेदक असंगठित श्रमिक हो, आयकर दाता न हो तथा उसके पास 2 हेक्टेयर से ज्यादा कृषि भूमि न हो। एक बार पंजीयन कराया तो पांच साल चलेगा।

रजिस्टर्ड श्रमिकों को सरकार कई फायदों से नवाजेगी। मसलन पंजीबद्ध असंगठित मजदूरों को 200 रूपए मासिक फ्लैट रेट पर बिजली, गर्भवतियों को पोषण आहार के लिए 4 हजार रुपए, प्रसव होने पर महिला के खाते में 12 हजार 500 रूपए जमा करना, घर के मुखिया श्रमिक की सामान्य मृत्यु पर परिवार को 2 लाख तथा दुर्घटना में मृत्यु पर 4 लाख रू. की सहायता।

हर भूमिहीन श्रमिक को भूखण्ड या मकान, स्वरोजगार के लिए ऋण, साइकिल-रिक्‍शा चलाने वालों को ई-लोडिंग रिक्‍शा का मालिक बनाने के लिए बैंक ऋण, साथ ही उन्हें 5 प्रतिशत ब्याज अनुदान के साथ 30 हजार की सबसिडी, श्रमिक को मृत्यु पर अंतिम संस्कार के लिए पंचायत व नगरीय निकाय से 5 हजार रुपए की नकद सहायता देना शामिल है।

इसके अलावा तेंदूपत्ता तोड़ने वाले मजदूरों को चरण पादुका योजना के तहत जूते चप्पल तथा पानी की कुप्पी देना, श्रमिक व उसके परिवार के सदस्यों की गम्भीर बीमारी का सरकार द्वारा मुफ्त इलाज, श्रमिक के बच्चों को कक्षा एक से पी.एचडी. तक निःशुल्क शिक्षा दिलाना, मजदूर को साइकिल व औजार खरीदने 5 हजार रूपए का नकद अनुदान और मजदूरों को मकान बनाने जमीन का पट्टा देना भी शामिल है। कुलमिलाकर इसमें ‘तथास्तु’ का भाव है। बस मजदूर इच्छा करे और सौगात हाजिर। यह पंजीयन कचरा व पन्नी बीनने वाले, कृषि मजदूर, घरेलू कामकाजी मजदूर, फेरी लगाकर दूध बेचने व कबाड़ खरीदने वाले, मछली पालने वाले, पत्थर तोड़ने वाले, ईंट बनाने वाले, दुकानों पर काम करने वाले, गोदाम मजदूर, परिवहन, हथकरघा, पावरलूम, रंगाई, छपाई, सिलाई, अगरबत्ती बनाने वाले, जूते बनाने वाले भी करा सकते हैं।

साथ ही ऑटो रिक्‍शा चालक, आटा, तेल, दाल मिलों में काम करने वाले मजदूर, लकड़ी का काम करने वाले, बर्तन बनाने वाले, कारीगर, लोहार, बढ़ाई, आतिशबाजी उद्योग में लगे सभी मजदूरों का पंजीयन भी किया जा सकता है। इसी के साथ प्रायवेट सुरक्षा में लगे कर्मचारियों, दरी व कारपेट बनाने वाले, आतिशबाजी व माचिस बनाने वाले सभी मजदूरों, कृषि मण्डियों में हम्माली करने वाले, तुलाई कराने वाले, बोरे सिलने वाले का पंजीयन भी कराया जा सकता है।

इस हितग्राही सूची का लुब्बो लुआब यह है कि केवल सरकारी व प्रायवेट नौकरी और निजी व्यवसाय करने वाले तथा खुद पंजीयन करने वालों को छोड़कर कोई भी खुद को असंगठित क्षेत्र का मजदूर मान सकता है। शिवराज सरकार इन सभी को 17 मई से जिलों में मजदूर सम्मेलन करवा कर सरकारी योजनाओं का लाभ देगी। मुख्यमंत्री का कहना है कि अभियान राज्य में मजदूरों को सुरक्षा और सम्मान देने के उद्देश्य से शुरू किया है।

लिहाजा सरकार इस बात से बेफिकर है कि योजना के तहत रजिस्टर्ड मजदूरों का आंकड़ा क्या है, कितना वाजिब है। उसे तो मजदूरों को फायदा दिलाने की चिंता है। ठीक वैसे ही ‍जैसे लंगर में यह नहीं देखा जाता कि कितने और कौन लोग जीमे। बेटी के ब्याह की तरह यह ‘सत्कार्य’ जितनी जल्दी हो, उतना अच्छा। इसके पीछे पवित्र मंशा यही है कि आठ माह बाद राज्य में विधानसभा चुनाव में फिर कमल खिले।

अब तक की ज्यादातर योजनाओं का जमीनी हश्र देखते हुए सरकार को अब असंगठित मजदूरों से ही उम्मीद ज्यादा है। क्योंकि किसानों की तकदीर बदलने के तमाम दावे अब खेत के पानी की तरह जमीन में रिस चुके हैं। सो शिवराज सरकार ने मजदूरों पर ही सियासी दांव खेला है। इस लिहाज से मजदूर पंजीयन को ‘गेम चेंजर’ माना जा रहा है। मुख्यमंत्री स्वयं कह भी चुके हैं कि मध्य प्रदेश का आधा बजट सरकार मजदूरों पर ही खर्च करेगी।

सरकार का मानना है कि लोग कम से कम इन घोषित योजनाओं का फायदा उठाने के लिए ही भाजपा को वोट देने पर मजबूर होंगे। यह बात दूसरी है कि अक्सर चुनाव के पहले सरकारें ‘लाइफ चेंजर’ के बजाए ‘गेम चेंजर’ टोटकों पर ज्यादा भरोसा करती हैं। पूर्व में कांग्रेस की दिग्विजय सरकार ने भी इसी उम्मीद में दलितों को चरनोई की जमीन बांटने का प्रदेशव्यापी अभियान छेड़ा था। लेकिन सरकार और पार्टी ने अपनी ही जमीन खो दी।

शिवराज सरकार तीसरे कार्यकाल के आखिरी दौर में मजदूरों की दशा बदलने निकली है तो चुनावी नतीजा सकारात्मक ही आना चाहिए, बशर्ते राज्य का हर चौथा आदमी सचमुच मजदूर हो। यूं मेहनत मजदूरी करना अच्छी बात है। क्योंकि इससे नोट और वोट दोनो का रास्ता खुलता है। डर केवल इतना है कि प्रदेश का यह ‘मजदूरकरण’ कहीं उस फर्जीवाड़े को पीछे न छोड़ दे जो नकली हीरे बेचने वाले नीरव मोदी और मेहुल चोकसी ने किया।

(सुबह सवेरे से साभार)

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