रवि भोई

विधानसभा में भाजपा का दांव उल्टा पड़ गया। परफार्मेंस और सरकार के खिलाफ आक्रामकता दिखाने के फेर में भाजपा के विधायक आसंदी से टकराकर अपना ही नुकसान करा बैठे और सरकार को बच निकलने का रास्ता मिल गया। इस सत्र में अनुभव और अहम के टकराव से बनी विस्फोटक स्थिति के चलते समय से पहले सत्रावसान से कई सवाल खड़े हो गए। आमतौर पर आसंदी से सदस्य सीधे नहीं भिड़ते, पर इस बार उलटा माहौल दिखा। विपक्ष विधानसभा अध्यक्ष को ही संसदीय ज्ञान का पाठ पढ़ाने के फेर में अपना नुकसान करा बैठा। केंद्र और संयुक्त मध्यप्रदेश में मंत्री रहे डॉ. चरणदास महंत अनुभवी और सुलझे हुए राजनेता तो हैं ही, उन्हें मीठी वाणी बोलने व सबको साथ लेकर चलने वाला नेता भी कहा जाता है। सदन के संचालन में आसंदी के साथ पक्ष और विपक्ष की भूमिका भी अहम होती है। सत्र अधिक दिन चलने से विपक्ष को ही फायदा होता है। 70 सदस्यों के साथ सरकार तो भारी है, पर संख्याबल में विपक्ष हल्का है। अध्यक्ष को साधकर ही विपक्ष सदन में मजबूत हो सकता था। विपक्ष की रणनीतिक चूक ने सरकार को हमले का मौका दे दिया। बजट सत्र की घटनाओं ने छत्तीसगढ़ विधानसभा की संसदीय परंपराओं पर दाग लगाया, वहीँ जनता के बीच भी अच्छा संदेश नहीं गया। विधानसभा तो प्रजातंत्र का मंदिर है और जनता सदस्यों से मर्यादा तथा अच्छे व्यवहार की अपेक्षा के साथ जनहित में बेहतर फैसले की उम्मीद करती है।

गृहमंत्री दरकिनार
किसी राज्य का गृह मंत्री पुलिस विभाग का पालक होता है। इस नाते पुलिस महकमे के हर निर्णय और कार्यक्रम में गृह मंत्री की अहम भूमिका होती है, लेकिन छत्तीसगढ़ में गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू को पुलिस के कार्यक्रमों में बुलाया ही नहीं जा रहा है। छत्तीसगढ़ पुलिस ने महिला दिवस के दिन आठ मार्च को दीनदयाल आडिटोरियम साइंस कालेज रायपुर में कार्यक्रम आयोजित कर जागरूकता अभियान ‘अभिव्यक्ति’ का शुभारंभ किया। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल थे। विशेष अतिथि छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष किरणमयी नायक थी। गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू को न तो कार्यक्रम में बुलाया गया और न ही कार्ड में उनका नाम दिया गया। कहते हैं उपेक्षा से गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू काफी नाराज हैं और उन्होंने पुलिस महानिदेशक डीएम अवस्थी से बात करना बंद कर दिया है। गृहमंत्री और पुलिस महानिदेशक के बीच खटास को लेकर चर्चा का माहौल गर्म है। अब देखते हैं मुख्यमंत्री इसका संज्ञान लेते हैं या फिर ऐसे ही चलता रहेगा।

अफसरों की चुनाव ड्यूटी पर उंगली
देखा जाता है कि कुछ अफसर चुनाव ड्यूटी को गर्व के साथ स्वीकारते हैं, तो कुछ तनाव वाला मानकर निरस्त कराने की जुगत में रहते हैं। लेकिन इस बार जिस तरह अफसरों के नाम जोड़ने और काटने पड़े, उससे सवाल उठ रहा है कि क्या अफसरों की चुनाव ड्यूटी लगाने में भी भाई-भतीजावाद होता है या फिर सामान्य-प्रशासन विभाग बिना जांचे परखे ही अफसरों की सूची चुनाव आयोग को भेज देता है। आयोग ने पांच राज्यों के चुनाव में पर्यवेक्षक बनाने के लिए अफसरों के नाम छत्तीसगढ़ सरकार से मांगे थे। कई अफसरों ने पारिवारिक और अन्य कारणों का हवाला देकर चुनाव ड्यूटी से मुक्ति पा ली, जिसके चलते सरकार को दोबारा आयोग को नाम भेजने पड़े। बताया जाता है आपाधापी में हाल ही में बहाल आईएएस जनक पाठक का नाम भी इलेक्शन ड्यूटी के लिए भेज दिया गया, बाद में उनका नाम सूची से हटाना पड़ा। इलेक्शन ड्यूटी के लिए अफसरों के नामों में कई बार हेरफेर करना पड़ा। चुनाव ड्यूटी से नाम कटने से एक अफसर दुखी बताए जाते हैं।

महिला बाल विकास विभाग में तड़पन
जैसे बिना पानी के मछली तड़पती है, ठीक वैसा ही आजकल महिला बाल विकास विभाग के कुछ अधिकारी और कर्मचारी तड़प रहे हैं। कहते हैं सख्त और काम को महत्व देने वाली महिला बाल विकास और समाज कल्याण विभाग की सचिव शहला निगार ने विभाग को कसने का काम शुरू कर दिया है। चर्चा है कि नई सचिव पुराने सिस्टम को बदलने की जुगत में है। यह विभाग के अधिकांश लोगों को नहीं भा रहा है। खासकर विभाग में सालों से जमे कुछ पुरुष अधिकारी अपना ही राज चलाना चाहते हैं। वैसे भी महिला बाल विकास विभाग में खरीदी का खेल चर्चा में रहता है। बच्चों और महिलाओं के उत्थान के लिए भारत सरकार भी दिल खोलकर सहयोग करती है। बच्चों और महिलाओं की दशा सुधारने के साथ विभाग के पुराने खिलाडी अपनी बदहाली दूर करने का नुस्खा भी जानते हैं। शहला निगार को तीन महीने पहले दिसंबर में ही महिला बाल विकास की सचिव के तौर पर पदस्थ किया गया है। महिला बाल विकास विभाग की संचालक दिव्या मिश्रा हैं। याने महिला बाल विकास विभाग की कमान महिलाओं के हाथों में है। अब देखते हैं आगे क्या होता है?

पुत्र मोह में मंत्री-विधायक
राजनीति में परिवारवाद के खात्मे का नेतागण चाहे जितना राग अलापें, लेकिन उससे वे मुक्त नहीं हो पाते। भाजपा और कांग्रेस दोनों में यही हाल है। वैसे तो छत्तीसगढ़ में कई नेताओं के पुत्र राजनीति में हैं और उन्हें पार्टी तथा सरकारी पद मिले हुए हैं, उनकी देखा-देखी और भी कुछ मंत्री-विधायक उन्हीं की राह पर चलने को आतुर हैं। राज्य के एक मंत्री ने अपने पुत्र को जिला पंचायत में पदाधिकारी बना दिया, तो एक मंत्री ने अपने पुत्र को पार्टी में पद दिलवा दिया। एक नेता अपनी जगह अपने बेटे को चुनाव मैदान में उतारना चाहते हैं। कहते हैं कुछ मंत्री और विधायक के पुत्र, पिता के काम में हाथ बंटाते-बंटाते विभागों में दखलंदाजी की सीमा तक पहुँच गए हैं। नेता पुत्रों के प्रवेश से कांग्रेस में खलबली मच गई है। कांग्रेसी कहने लगे हैं- पुत्रों को ही मौका मिलना है तो फिर नए नेतृत्व को बढ़ावा कैसे मिलेगा? देखते हैं कांग्रेसियों का पुत्र मोह आने वाले दिनों में क्या गुल खिलाता है।

भाजपा नेता पर आईटी की तिरछी नजर
कहते हैं महासमुंद जिले के एक भाजपा नेता को आयकर विभाग ने तिरछी नजर से देखना शुरू कर दिया है। चर्चा है कि आईटी विभाग नेताजी के करीब 30 करोड़ रुपए की बेनामी संपत्ति को अटैच करने की कार्रवाई करने जा रही है। नेताजी को भाजपा के राज्य स्तर के दो बड़े नेताओं का करीबी कहा जाता है। हालांकि पार्टी के गुटीय समीकरण में दोनों नेता अलग-अलग ध्रुव के माने जाते हैं। ब्लाक से प्रदेश स्तर की राजनीति तक पहुंचने वाले नेताजी की भाजपा सरकार रहते जिले में तूती बोलती थी। एनएच-53 के निर्माण के वक्त जमीन अधिग्रहण के दौरान भी नेताजी चर्चा में आए थे।

डॉ. आनंद छाबड़ा के लिए दिल्ली के रास्ते खुले
2001 बैच के आईपीएस अधिकारी डॉ. आनंद छाबड़ा भारत सरकार में इंपैनल हो गए हैं। डॉ. आनंद छाबड़ा वर्तमान में राज्य के इंटेलीजेंस प्रमुख के साथ रायपुर रेंज के आईजी हैं। केन्द्र की एप्वाइंटमेंट्स कमेटी आफ द कैबिनेट (एसीसी) ने देश के अलग-अलग राज्यों के 1996 से 2001 बैच के आईजी या फिर आईजी के समकक्ष 22 आईपीएस अफसरों को इंपैनल किया है। इनमें छत्तीसगढ़ कैडर से अकेले डॉ. आनंद छाबड़ा हैं। भारत सरकार में इंपैनल हो जाने के बाद केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जा सकते हैं। वर्तमान में छत्तीसगढ़ कैडर के स्वागत दास, रवि सिन्हा, राजेश मिश्रा, जयदीप सिंह, अमित कुमार, बद्रीनारायण मीणा, अंकित गर्ग, अमरेश मिश्रा, ध्रुव गुप्ता, रामगोपाल गर्ग और अमित कांबले केंद्र सरकार में प्रतिनियुक्ति में हैं। छत्तीसगढ़ कैडर के आईपीएस अफसर टी. जे. लांगकुमेर प्रतिनियुक्ति पर नागालैंड के डीजीपी हैं।

न पूछो निगम-मंडल की बात
जात न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान। मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥ कबीर का यह दोहा आजकल निगम-मंडल में पद पाने वाले कांग्रेसियों पर फिट बैठ रहा है। निगम-मंडल में बचे पद बांटने के लिए नेताओं की कई बार बैठक हो चुकी है। बैठक के बाद सूची जारी होने की हवा बहती है और शांत हो जाती है। अब असम चुनाव के बाद निगम-मंडल में बचे पद बांटने की चर्चा चल रही है, लेकिन पद की चाहत रखने वालों से पूछो तो कहते हैं, इस बारे में मत पूछो। पद में क्या रखा है, पार्टी में तो काम कर रहे हैं। दिल बहलाने के लिए ग़ालिब, ख्याल अच्छा है।