राकेश अचल

दुनिया के सबसे अधिक ताकतवर माने जाने वाले अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडन ने जिन परिस्थितियों में देश सेवा की शपथ ली है वे एकदम विषम हैं। जो को अमेरिका के किसी भी अन्य राष्ट्रपति के मुकाबले ज्यादा घायल अमेरिका मिला है। आज का अमेरिका अतीत के अमेरिका से भिन्न, खिन्न और क्षुधित अमेरिका है। इस समय अमेरिका के मित्रों की संख्या कम और शत्रुओं की संख्या अधिक है।

उम्रदराज नए राष्ट्रपति ने तमाम आशंकाओं के बीच देश की कमान सम्हाली है, उनके सामने एक ऐसा अमेरिका है जिसमें घृणा और असहिष्णुता ने नए सिरे से सर उठाया है। जिस रंगभेद को समाप्त करने के लिए मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने शहादत दी थी वो ही रंगभेद एक बार फिर अमेरिका के लिए नासूर बन चुका है। निवर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने चार साल के कार्यकाल में योजनाबद्ध तरीके से राजसत्ता में बने रहने के लिए इस घृणा और असहिष्णुता को बढ़ावा दिया। गनीमत है कि अमेरिका की जनता ने इस बीमारी को समय रहते पहचान लिया और डोनाल्ड ट्रम्प को दोबारा सत्ता की कमान नहीं सौंपी। ट्रम्प ने जनादेश को धता बताते हुए देश की संसद पर भी चढ़ाई करने की नाकाम कोशिश की।

मैंने जो बाइडन को शपथ ग्रहण के बाद बोलते सुना, वे कह रहे थे कि लोकतंत्र की जीत हुई है। बाइडन ने अमेरिका के 46 वें राष्ट्रपति के रूप में अपने पहले उद्बोधन में कहा, कि- ‘‘आज का दिन अमेरिका का है। यह लोकतंत्र का दिन है। यह इतिहास और आशा का दिन है।’’ बाइडन ने कहा, ‘‘आज हम एक उम्मीदवार की जीत का नहीं, बल्कि एक उद्देश्य की, लोकतंत्र के उद्देश्य की जीत का उत्सव मना रहे हैं।’’ देश के नए राष्ट्रपति ने कहा, ‘‘जनता की इच्छाओं को सुना और समझा गया है।’’ ‘‘श्वेतों को श्रेष्ठ मानने की मानसिकता, घरेलू आतंकवाद को हराएंगे। मैं चाहता हूं कि प्रत्येक अमेरिकी हमारी इस लड़ाई में शामिल हो।’’ जो के साथ सुश्री कमला हैरिस ने भी उपराष्ट्रपति पद की शपथ ली।

नए राष्ट्रपति ने आतंक के साये में शपथ ली। ये आतंक आयातित आतंक नहीं बल्कि उनके अपने देश में जन्मा आतंक था। शपथ ग्रहण समारोह के लिए कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गयी। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों को रोकने के लिए कैपिटल बिल्डिंग के आसपास हजारों सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए थे। डेमोक्रेटिक नेता बाइडन को प्रधान न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स ने कैपिटल बिल्डिंग के ‘वेस्ट फ्रंट’ में पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलायी। इस बार समारोह में कम लोगों को आमंत्रित किया गया था और नेशनल गार्ड के 25 हजार से अधिक जवान सुरक्षा में तैनात किये गए थे जो एक कीर्तिमान है।

जो के हाथों में अमेरिका का भविष्य कैसा होगा ये जानने से पहले जो बाइडन के बारे में जान लेना जरूरी है। जनता के नेता, सुधारक और दूसरों का दर्द समझने वाले व्यक्ति के रूप में प्रसिद्ध जो बाइडन एक जमाने में देश के सबसे युवा सीनेटरों में से एक थे और अपने दीर्घ अनुभव के साथ अमेरिकी इतिहास के सबसे बुजुर्ग राष्ट्रपति बनने तक का उनका सफर बेहद दिलचस्प रहा है। उनके पास लगभग पांच दशक का राजनीतिक अनुभव है। छह बार सीनेटर रहे डेमोक्रेटिक नेता बाइडन ने 78 वर्ष की उम्र में राष्ट्रपति चुनाव में रिपब्लिकन नेता डोनाल्ड ट्रंप को परास्त कर दिया। इससे पहले वह 1988 और 2008 में राष्ट्रपति पद की दौड़ में दो बार असफल भी रह चुके हैं, लेकिन असफलताएं कभी भी बाइडन को परास्त नहीं कर पाईं।

ऐसा माना जाता है कि डेलावेयर से ताल्लुक रखने वाले वरिष्ठ नेता बाइडन का बचपन से ही राष्ट्रपति बनने का सपना था, लेकिन तीसरे प्रयास में उनका सपना तब पूरा होता दिखा जब उन्होंने पिछले साल 29 फरवरी को साउथ कैरोलाइना से डेमोक्रेटिक पार्टी के प्राइमरी में जीत दर्ज कर कई दिग्गजों को पीछे छोड़ दिया और अमेरिका के राजनीतिक इतिहास में उनकी सबसे नाटकीय वापसी हुई। वॉशिंगटन में पांच दशक गुजार चुके बाइडन व्हाइट हाउस में दो बार पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के अधीन उपराष्ट्रपति रह चुके हैं। उन्होंने इस बार खुद को ट्रंप के विकल्प के रूप में मजबूती से रखा।

नए राष्ट्रपति के सामने अमेरिका की प्रभुता को सर्वोच्च बनाये रखने के साथ दुनिया की दूसरी महाशक्तियों से नए सिरे से रिश्ते गढ़ने और भारत तथा चीन से नए समीकरण स्थापित करने की चुनौती है। इस्लामिक देशों और पारम्परिक अदावतों के चलते अमेरिका की रीतिनीति की समीक्षा भी जो की प्राथमिकताओं में शामिल हो सकती है, लेकिन मैं यहां बात भारत की करना चाहता हूँ। भारत को बाइडन से बहुत उम्मीदें हैं, दुनिया के हर देश के लोग अमेरिका में जाकर बसना चाहते हैं। भारतियों में तो इसकी ललक कुछ ज्यादा ही है और ये सब अमेरिका के नागरिकता कानूनों पर निर्भर करता है।

बताया जा रहा है कि अब ‘यूएस सिटीजनशिप एक्ट ऑफ 2021’ में आव्रजन प्रणाली को उदार बनाया गया है। यह विधेयक परिवारों को साथ रखने, देश की अर्थव्यवस्था में प्रगति, मध्य अमेरिका से आव्रजन के असल कारण के समाधान और अभियोजन से भागे लोगों के लिए अमेरिका को सुरक्षित शरणस्थली बनाए रखने को प्राथमिकता देता है। यह विधेयक अमेरिका में रहने वाले और काम करने वाले लोगों को नागरिकता देने के लिए एक मसौदा पेश करता है। यह परिवारों को दूर करने वाले प्रावधानों को खत्म करने की बात करता है। इसके साथ ही इसमें रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड के लिए प्रति देश तय की गई सीमा को खत्म करने का भी प्रावधान है।

भारतीयों को उम्मीद है कि इस विधेयक के कानून बनने से भारतीय आईटी पेशेवरों को बड़ा फायदा होगा जिनमें से अधिकतर उच्च रूप से दक्ष हैं और जो एच-1बी वीजा पर अमेरिका आए थे। ये लोग मौजूदा आव्रजन प्रणाली से सर्वाधिक पीड़ित हैं, क्योंकि इसमें ग्रीन कार्ड या स्थायी कानूनी निवास के लिए प्रति देश सात प्रतिशत आवंटन की व्यवस्था है। लेकिन अमेरिका तो अमेरिका है उसके बारे में कोई भी धारणा न जल्दी बनाई जा सकती है और न बदली जा सकती है। अमेरिका के पास खाने और दिखाने के दांत हमेशा से अलग-अलग रहे हैं।

मैंने शुरू में ही कहा कि अमेरिका इस समय जख्मी हालत में है। एक मजबूत लोकतंत्र के जिस्म पर जाते-जाते डोनाल्ड ट्रम्प ने जो घाव दिए हैं उन्हें भरे बिना बाइडन बहुत ज्यादा ‘वाइड’ सोच भी नहीं सकते। दुनिया में लोकतंत्र की मजबूती और मानवाधिकारों की वकालत करने से पहले बाइडन को अपने देश में लोकतंत्र और मानव अधिकारों को नई ऊर्जा देना होगी। बाइडन की इच्छाशक्ति और अनुभव उनके काम आएंगे ये उम्मीद जरूर की जा सकती है। संयोग से बाइडन के राष्ट्रपति बनने के बाद का अमेरिका देखने मैं अगले हफ्ते खुद अमेरिका जा रहा हूँ। वहां से आपको ताजा हालात का तप्सरा करने की कोशिश करूंगा।