राकेश अचल 

मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अयोध्या में राम मंदिर भूमिपूजन के एक दिन पूर्व 4 अगस्त को प्रदेश में हनुमान चालीसा का पाठ करने का आव्हान कांग्रेस कार्यकर्ताओं से किया है। कमलनाथ के इस फैसले से कांग्रेसी भ्रमित और बाक़ी जनता चकित है। लेकिन जो कमलनाथ को जानते हैं उन्हें पता है कि कमलनाथ का फैसला चौंकाने वाला नहीं है। वे अपनी रामभक्ति का इस्तेमाल पहली बार सियासी लाभ के लिए कर रहे हैं।

कमलनाथ संजय गांधी की पीढ़ी के नेता हैं और अब बुढ़ा  चुके हैं, फिर भी वे अपने कन्धों से कोई जिम्मेदारी कम करने को तैयार नहीं हैं। वे प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष हैं, प्रतिपक्ष के नेता हैं, वे कांग्रेस के सब कुछ हैं। जब कांग्रेस की प्रदेश में सत्ता थी तब भी वे ही सब कुछ थे। उनके सब कुछ होने के कारण ही कांग्रेस के पास अब कुछ भी नहीं है और हनुमान चालीसा का पाठ करवा कर भी वे कुछ हासिल नहीं कर पाएंगे।

जानने वाले जानते हैं कि कमलनाथ के लिए किसी भी पार्टी की सत्ता हो परेशानी का सबब नहीं है। वे जितने कांग्रेस की सत्ता में प्रभावी थे उतने ही भाजपा की सत्ता में आज हैं और आज से पहले भी थे। वे सौजन्य में दक्ष हैं, व्यावहारिक हैं और निडर व्यापारी हैं। उन्हें भाजपा ने अपने जाल में उलझाने की कोशिश की थी लेकिन उनके साले साहब ही उलझ पाए, वे नहीं। भले ही इसके एवज में उन्हें अपनी सरकार गंवाना पड़ी। उनके ताजा निर्णय से कांग्रेस में भ्रम की स्थिति है लेकिन कमलनाथ को कोई भ्रम नहीं है और जहां तक मुमकिन होगा वे अपने निर्णय पर अमल भी करा लेंगे।

राम मंदिर के भूमि पूजन में प्रधानमंत्री जी की उपस्थिति को लेकर कांग्रेस का जो भी रुख रहा हो लेकिन कमलनाथ का रुख साफ़ है। वे न इसके खिलाफ हैं और न प्रदेश में अपनी पार्टी को इस निर्णय की खिलाफत करना देना चाहते हैं। ये पार्टी के फ़ायदे के लिए है या उनके अपने फ़ायदे के लिए यह बात केवल कमलनाथ और उनकी पार्टी का हाईकमान जानता है। भाजपा का हाईकमान भी जानता होगा, किन्तु इस बारे में मैं अधिकारपूर्वक कुछ नहीं कह सकता। मैं सिर्फ इतना कह सकता हूँ कि कमलनाथ ने फैसला लेने में देर कर दी। उनकी इस शतुर्मुर्गी मुद्रा का कांग्रेस को होने वाले विधानसभा चुनावों में कोई लाभ मिलने वाला नहीं है।

राम को लेकर भाजपा और कांग्रेस में बुनियादी भेद है।  भाजपा ने शुरू से राम और उनके मंदिर को अपने सियासी एजेंडे में शामिल करके रखा जबकि कांग्रेस इस मुद्दे पर कभी मुखर नहीं हुई। जबकि कांग्रेस की भूमिका इस मंदिर के निर्माण में रेखांकित की जाने वाली है। कांग्रेस सरकार के प्रधानमंत्री रहे पीवी नरसिम्हाराव हों या राजीव गांधी सबने राम मंदिर निर्माण की बाधाएं दूर करने में अहम भूमिका निभाई। लेकिन कभी इसका ढिंढोरा नहीं पीटा। कांग्रेस की यही गलती कांग्रेस को ले डूबी और अब गलती सुधारने का समय शेष नहीं है। कांग्रेस का जो नुकसान होना था वो तो हो चुका।

देश में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो राम मंदिर के निर्माण के खिलाफ हो, लेकिन बहुत से ऐसे लोग हैं जो इस मंदिर निर्माण के मुद्दे को राजनीतिक बनाकर उसका लाभ लेने के खिलाफ हैं। ऐसी खिलाफत करने वाले भी राम के ही भक्त हैं, उन्हें रावण का भक्त नहीं कहा जा सकता। भाजपा ने राम मंदर के मुद्दे को अपनाया, ज़िंदा रखा और आज उसके साकार होने पर उसका सारा श्रेय भी अपनी झोली में डाल लिया। आज राम मंदिर निर्माण ट्रस्ट भी भाजपा की झोली में हैं और राम भी।

लेकिन दुर्भाग्य है कि देश में और जहाँ राम मंदिर बनाया जाना है उस प्रदेश में भी, राम राज का कोई चिन्ह नहीं है। राम आज भी अपने राज की स्थापना के लिए बैचैन होंगे। मंदिर बनने से उन्हें शायद उतनी खुशी नहीं होगी जितना की राम राज की स्थापना न होने का दुःख होगा।

बात कमलनाथ की राम भक्ति की है। कमलनाथ की राम भक्ति को कांग्रेस की राम भक्ति समझने की गलती किसी को नहीं करना चाहिए। कमलनाथ केवल अपनी सुविधा, संतोष और सुरक्षा के लिए राम भक्त बने हुए हैं। राम भक्ति हो या अंधभक्ति चूंकि निजी आस्था का विषय है, इसलिए मैं इस मुद्दे पर कम ही बोलता/लिखता हूँ। मैं किसी की धार्मिक भावना को आहत करने से हमेशा बचता हूँ।

मैं बिना सर्टिफिकेट वाला पक्का और असली राम भक्त हूँ  लेकिन मैं कभी भी इस मुद्दे को प्राथमिकता में रखने के खिलाफ रहा हूँ। मेरी आज भी मान्यता है कि ये सारे काम सरकार के नहीं हैं। सरकारों को ऐसे सभी धार्मिक कार्यों से दूर रहना चाहिए।

राम मंदिर के भूमि पूजन कार्यक्रम में माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी के क्या संकेत देश में जायेंगे   इसकी परवाह न भाजपा को है और न खुद प्रधानमंत्री को। वे तो इस घटना से अभिभूत हैं। उनका मन सुख अकल्पनीय है लेकिन मैं मानता हूँ कि इसके पीछे केवल और केवल राजनीतिक दूरदृष्टि है। रामभक्ति नहीं। उनके और पूरी भाजपा के राम भक्त होने में मुझे कोई संदेह नहीं है और न मैं इसे गलत मानता हूँ किन्तु जिस तरह से भाजपा ने बीते चार दशक में राम के नाम का दोहन किया है वो दुर्भाग्यपूर्ण है।

देश में एक नहीं अनेक राम मंदिर हैं। दूसरे बड़े-बड़े मंदिर हैं जिनकी प्रतिष्ठा और आमदनी किसी अन्‍य मंदिर के मुकाबले कहीं ज्यादा है, लेकिन गनीमत ये है कि इनमें से किसी की भी राजनीति में कोई भागीदारी नहीं है। अयोध्या में राम मंदिर बनने के बाद देश की लंगड़ी अर्थव्यवस्था, लचर विदेश नीति और असुरक्षित सीमाएं यदि सुरक्षित होती हैं तो किसी को कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन यदि सूरते हाल में कोई तब्दीली नहीं आती तो जैसा दिखावा कमलनाथ कर रहे हैं वैसा ही दिखावा भाजपा का भी प्रमाणित हो जाएगा।

कोरोनाकाल में प्रधानमंत्री जी जिस तरीके से अपनी दाढ़ी बढ़ा रहे हैं उसे देखकर लगता है कि वे अब अवतारों में शामिल होकर ही मानेंगे और राम मंदिर इस दिशा में उनका पहला पड़ाव होगा।